अवैध हिरासत मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने यूपी सरकार को 6 हफ्ते के अंदर पीड़ित को 2 लाख रुपये मुआवजा देने और विभागीय जांच पूरी होने के बाद यह धनराशि प्रयागराज के बारा के सहायक पुलिस आयुक्त से वसूल करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मंसूर अहमद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने कर्तव्यों में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और जुर्माना लगाने का निर्देश दिया।
याचिका के मुताबिक मामला 19 मार्च 2026 की रात का है। खीरी थाने के एसएचओ कृष्ण मोहन सिंह, सब इंस्पेक्टर उमेश सिंह, सिपाही अंकित सिंह और त्रिभुवन पांडेय याचिकाकर्ता मंसूर अहमद के घर पहुंचे। जबरन उन्हें थाने ले गए। परिजनों के मुताबिक उनके साथ मारपीट की गई और गिरफ्तार करने का कारण तक नहीं बताया गया।
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23 मार्च को परिवार ने अदालत में याचिका दाखिल की। जवाब में पुलिस ने शांति भंग का हवाला दिया और कहा कि इसी संबंध में जरूरी कार्रवाई की गई थी। इस मामले में निजी बॉन्ड न भरने की स्थिति में व्यक्ति को न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है, लेकिन अदालत ने पाया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने निजी बॉन्ड भरने से मना किया था।
हालांकि हाई कोर्ट ने आठ दिनों तक शख्स को अवैध हिरासत में रखने के मामले को गंभीरता से लिया। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने छह हफ्तो में पीड़ित को दो लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट ने रोजाना 25 हजार रुपये की दर से मुआवजे का निर्धारण किया है।
हाई कोर्ट ने 14 सितंबर तक आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश भी प्रयागराज के पुलिस आयुक्त को दिया है। यह भी कहा कि अगर रिपोर्ट पेश नहीं की गई तो पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत तौर पर पेश होना होगा।
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अपने आठ जून के आदेश में अदालत ने कहा कि पुलिस आयुक्त को मजिस्ट्रेट के अधिकार मिले हैं, जिसका गलत तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने गाजियाबाद के एक मामले का भी जिक्र किया और कहा, 'इस अदालत ने गाजियाबाद कमिश्नरेट से जुड़े एक मामले में भी इसी तरह की स्थिति देखी है, जहां चंद्रपाल सिंह बनाम राज्य सरकार के मामले में पुलिस आयुक्त ने अधिकारों का दुरुपयोग किया।'