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चंद्रा प्रोटेको पर 210 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी का आरोप, CBI की छापेमारी

चंद्रा प्रोटेको लिमिटेड पर पांच बैंकों के समूह को 210.13 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप है। CBI ने कंपनी और उसके तीन डायरेक्टरों के खिलाफ FIR दर्ज कर छापेमारी की है।

CBI की छापेमारी की AI Generated तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit- ChatGPT

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केंद्रीय जांच ब्यूरो ( CBI ) ने चंद्रा प्रोटेको लिमिटेड और उसके डायरेक्टरों रंजीत गुप्ता, अनिलेश गुप्ता और अपर्णा गुप्ता के खिलाफ FIR दर्ज की है। कंपनी और उसके तीन डायरेक्टरों पर 210.13 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी का आरोप लगाया जा रहा है। कंपनी पर आरोप है कि उसने छह अलग-अलग बैंकों के समूह से 541.46 करोड़ रुपये लिए और इसका इस्तेमाल बैंकों को बताए गए उद्देश्यों के हिसाब से नहीं किया। CBI यह जांच मुंबई स्थित इंडियन बैंक की स्ट्रेस्ड एसेट मैनेजमेंट शाखा की शिकायत पर कर रही है। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने प्रयागराज में कंपनी के डायरेक्टरों के ठिकानों पर छापेमारी की है।

 

CBI ने इन तीनों के अलावा कई अज्ञात सरकारी कर्मचारियों को भी आरोपी बनाया है। बैंकों ने कैश क्रेडिट, टर्म लोन और लेटर ऑफ क्रेडिट के जरिए कंपनी को पैसे दिए थे। लेकिन चंद्रा प्रोटेको लिमिटेड पर आरोप है कि उसने पैसे दूसरी कंपनियों में भेजकर, छिपे हुए बैंक खाते चलाकर और दूसरी कंपनियों के जरिए लेनदेन कर 210 करोड़ रुपये की बड़ी धोखाधड़ी की। कंपनी ने पैसे छह बैंकों से लिए थे लेकिन धोखाधड़ी में पांच बैंको का ही जिक्र है। 

छह बैंकों से लिए 541 करोड़

CBI ने बताया कि कंपनी ने इंडियन बैंक के नेतृत्व वाले छह बैंकों के समूह से कुल 541.46 करोड़ रुपये हासिल किए थे। कंपनी ने तीन अलग-अलग तरीकों से ये पैसे प्राप्त किए थे। पहला था कैश क्रेडिट। इसमें कंपनी को कारोबार चलाने और रोजमर्रा के खर्चों के लिए बैंक से कर्ज दिया जाता है। दूसरा था टर्म लोन। इसमें किसी खास काम या निवेश के लिए कर्ज दिया जाता है। तीसरा और अंतिम तरीका था लेटर ऑफ क्रेडिट। इसमें बैंक की गारंटी होती है, जिसके आधार पर कंपनी सामान खरीदने वाले विक्रेता को भुगतान का भरोसा देती है।

 

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इन तीन तरीकों से की धोखाधड़ी

CBI का आरोप है कि कंपनी ने बैंकों से मिले पैसों का इस्तेमाल पहले से बताए गए उद्देश्यों के अनुसार नहीं किया। कंपनी ने ऐसे बैंकों में भी खाते चलाए, जो कर्ज देने वाले बैंकों के समूह में शामिल नहीं थे। जांच एजेंसी के मुताबिक, कंपनी ने ऐसी दूसरी कंपनियों के जरिए भी लेटर ऑफ क्रेडिट का इस्तेमाल किया, जिनके डायरेक्टर आपस में जुड़े हुए थे या जो उसकी सहयोगी कंपनियां थीं। कंपनी पर यह भी आरोप है कि उसने बैंक से मिले पैसों का इस्तेमाल उस काम में नहीं किया, जिसके लिए कर्ज मंजूर हुआ था। इसके बजाय रकम को सहयोगी कंपनियों के जरिए दूसरी जगह भेज दिया गया। CBI फंड डायवर्जन और पैसों की हेराफेरी के आरोपों की जांच कर रही है।

 

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डायरेक्टरों के ठिकानों पर छापेमारी

मामला दर्ज करने के बाद CBI ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कंपनी के डायरेक्टरों से जुड़े कई ठिकानों पर तलाशी ली। इस दौरान जांच एजेंसी को संबंधित अवधि के लेजर और दूसरे अहम दस्तावेज मिले, जिन्हें जब्त कर लिया गया है। लेजर में कंपनी के वित्तीय लेन-देन का हिसाब होता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पैसा कहां से आया और किन लोगों या कंपनियों को भेजा गया।

सरकारी कर्मचारियों पर लटकी तलवार

CBI ने इस मामले में आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोपों के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी केस दर्ज किया है। अज्ञात सरकारी कर्मचारियों और निजी लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि बैंक से मिले पैसों का इस्तेमाल कहां हुआ, रकम किन कंपनियों के खातों में भेजी गई और इस पूरे मामले में किन लोगों की भूमिका थी। फिलहाल जांच जारी है। हालांकि अभी सिर्फ जांच चल रही है, कंपनी के डायरेक्टरों पर लगे आरोप साबित नहीं हुए हैं।

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