जम्मू-कश्मीर में पूरे वंदे मातरम गीत बजने पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई, जबकि सीएम उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने पूरे वंदे मातरम का समर्थन किया। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल 'वंदे मातरम' का पूरा वर्जन उस मिली-जुली और विविधता वाली सोच के साथ मेल नहीं खाता, जिसकी कल्पना हमारे आजादी के दीवानों ने भारत के लिए की थी और जिसे उन्होंने आगे बढ़ाया था।
दरअसल, जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के शुरुआत में वंदे मातरम का पूरा वर्जन बजा। उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला खड़े होकर गीत का सम्मान किया। यही बात कांग्रेस को चुभ गई।
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कांग्रेस की आपत्ति पर बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। बीजेपी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस को 21वीं सदी की मुस्लिम लीग बताया। उन्होंने कहा कि अब स्पष्ट हो गया कि 'दिमागी नक्सलवादी' कांग्रेस अब 'मुस्लिम लीग कांग्रेस' में बदल गई है। उसने कट्टरपंथी ताकतों के सामने पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया है।
इससे पहले स्वतंत्रता दिवस पर भी कांग्रेस नेता
सोनिया गांधी
ने पूरे वंदे मातरम को गाने पर आपत्ति जताई थी। कांग्रेस सिर्फ दो छंदों का समर्थन करती है। साल 1937 में कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया था। इसमें वंदे मातरम के सिर्फ दो छंदों को गाने पर सहमति बनी थी। कांग्रेस का तर्क है कि उसने ऐसा सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए किया था।
अपनी शर्त नहीं थोप सकते: बशीर अहमद
कांग्रेस की आपत्ति पर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने प्रतिक्रिया दी। उसने कहा कि कांग्रेस गठबंधन के सहयोगियों पर अपनी शर्त नहीं थोप सकती है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के बशीर अहमद ने कहा कि एक गठबंधन सहयोगी के रूप में आप यह तय नहीं कर सकते कि गाना गाना है या कितना गाना है।
उधर, कांग्रेस नेता कपिल सिंह का कहना है कि उमर और फारूक अब्दुल्ला इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। गठबंधन सहयोगी होने के नाते उन्हें कांग्रेस के फैसले का सम्मान करना चाहिए, न कि नागपुर के निर्णय का।
केसी वेणुगोपाल को क्यों आपत्ति?
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर लिखा, 'वंदे मातरम' का पूरा वर्जन उस मिली-जुली और विविधता वाली सोच के साथ मेल नहीं खाता, जिसकी कल्पना हमारे आजादी के दीवानों ने भारत के लिए की थी और जिसे उन्होंने आगे बढ़ाया था।'
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आगे लिखा, 'हमारे लिए महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, आचार्य नरेंद्र देव, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और जेबी कृपलानी की सोच और फैसले सबसे अहम हैं। इस सोच को बनाने में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह की भी बड़ी भूमिका थी।'
वेणुगोपाल ने आगे कहा, 'हम सम्मान और विनम्रता के साथ अपने सहयोगियों से चाहेंगे कि वे हमारे आजादी के दीवानों की समझ और फैसले का सम्मान करें। हम चाहेंगे कि वे हमारे साथ मिलकर इस खूबसूरत और ऐतिहासिक गीत का वही वर्जन गाएं, जिसे उन नेताओं ने अपनाया था। उस वर्जन को सोच-समझकर चुना गया था ताकि इस गीत को सांप्रदायिक रंग न दिया जा सके। यह खतरा आज भी उतना ही असली है जितना उस समय था। उस वर्जन को अपनाकर ही हम अपने गणतंत्र की धर्मनिरपेक्ष और सबको साथ लेकर चलने वाली पहचान को बनाए रख सकते हैं।'