जम्मू-कश्मीर के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की दो किताबों को लेकर बहस छिड़ गई है, जहां दो किताबों में जम्मू-कश्मीर को भारत के कब्जे वाला कश्मीर लिखा गया। इसी कंटेंट को लेकर स्कूल शिक्षा निदेशालय, कश्मीर ने किताबों की जांच कराने का आदेश दिया है, जिसकी रिपोर्ट 7 दिन के बाद जमा करनी होगी। किताबों की जांच को लेकर विपक्षी पार्टियों ने विरोध जताया है। साथ ही, प्रशासन के इस फैसले को इतिहास मिटाने की साजिश बताई है।
स्कूल शिक्षा निदेशालय के आदेश के बाद जम्मू-कश्मीर के सभी शिक्षा संस्थानों को अपने स्कूलों की किताबों की चेकिंग करनी होगी। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि किताबों में कोई भी ऐसा कंटेंट न हो, जिससे देशहित को नुकसान पहुंचे।
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विपक्षियों ने किया विरोध
विवादित किताबों की जांच को लेकर श्रीनगर के सांसद आगा रुहुल्ला मेहदी ने आलोचना की। आगा रुहुल्ला ने इस आदेश को लेकर कहा, 'लाइब्रेरी का मकसद है ज्ञान को संरक्षण करना, न कि राजनीतिक नैरेटिव को गढ़ना। किताबों को मिटाने से इतिहास नहीं मिटाया जा सकता।'
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक वहीद पारा ने रुहुल्ला मेहदी की आलोचना का समर्थन करते हुए कहा, 'किताबों की कंटेंट चेकिंग करवाने का आदेश इतिहास मिटाने की प्रक्रिया है।'
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किताबों को लेकर क्यों उठा विवाद?
जम्मू-कश्मीर की दो किताबों के कंटेंट को लेकर विवाद शुरू हुआ। इन किताबों के नाम 'पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जम्मू-कश्मीर' और 'ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर' हैं। इन किताबों में कुछ अलगाववादी नेताओं की सकारात्मक छवि बताई गई है।
सरकार को जैसे ही इन किताबों के बारे में पता चला, वैसे ही उपराज्यपाल ने शिक्षण संस्थानों में किताबों की चेकिंग का आदेश दिया। इस मामले को लेकर शिक्षा मंत्री सकीना इत्तू ने कहा कि ऐसे कंटेंट वाली किताबों की सप्लाई करने वाले आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कब होगी रिपोर्ट जमा?
जम्मू-कश्मीर के सभी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों को 15 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट अपने संस्थान के CEO को भेजनी होगी, जो 17 जुलाई को DSEK को रिपोर्ट सौंपेंगे। इस मामले को लेकर प्रशासन का कहना है कि यह जांच किसी स्कूल की लाइब्रेरी में ऐसी किताबों को हटाने के उद्देश्य से की जा रही है, जो छात्रों पर गलत असर डाल सकती हैं।