लखनऊ। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के सरकारी दावों के बीच डॉक्टरों की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। राजधानी की स्थिति यह है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों को 5 लाख प्रतिमाह तक का वेतन देने की व्यवस्था के बावजूद बड़ी संख्या में डॉक्टर सरकारी सेवा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय तक नहीं टिक रहे हैं।
प्रदेश में प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) संवर्ग के करीब 40 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। अब इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड का गठन किया है।
18,500 पदों में 7,500 से ज्यादा खाली
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग के लगभग 18,500 स्वीकृत पद हैं। इनमें से करीब 11 हजार पदों पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 7,500 से अधिक पद रिक्त हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का सबसे ज्यादा असर जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पड़ रहा है। सरकार ने करीब 2,500 विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती का प्रस्ताव भी तैयार किया है, जिसे भर्ती प्रक्रिया के लिए भेजा गया है।
5 लाख वेतन का ऑफर, फिर भी नहीं मिल रहे डॉक्टर
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत रिवर्स बिडिंग मॉडल लागू किया गया है। इसके तहत विशेषज्ञ डॉक्टरों को 5 लाख रुपये प्रतिमाह तक का मानदेय देने की व्यवस्था की गई। पिछले वर्ष इस योजना के तहत लगभग 170 विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की गई थी। इसके अलावा जनवरी 2026 में संविदा के आधार पर 710 डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया भी शुरू की गई। इसके बावजूद इसके खाली पदों की संख्या चिंताजनक बनी हुई है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं टिक रहे डॉक्टर
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार हर साल 200 से 250 विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और फर्स्ट रेफरल यूनिट में की जाती है। लेकिन इनमें से बड़ी संख्या कुछ समय बाद ही नौकरी छोड़ देते हैं या लंबे समय तक अनुपस्थित रहते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आवास, बच्चों की पढ़ाई, सुरक्षा और आधुनिक चिकित्सा संसाधनों की कमी उन्हें वहां लंबे समय तक काम करने से रोकती है।
कई जगहों पर आवश्यक उपकरण और विशेषज्ञ स्टाफ तक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्राइवेट अस्पतालों के बेहतर वेतन और सुविधाएं उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।
भर्ती में तेजी लाने के लिए नया बोर्ड
डॉक्टरों की भर्ती में होने वाली देरी को देखते हुए प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड का गठन किया है। यह बोर्ड एमडी-एमएस डिग्रीधारी विशेषज्ञ डॉक्टरों और मेडिकल शिक्षकों की सीधी भर्ती करेगा। साथ ही एमबीबीएस डॉक्टरों की पदोन्नति संबंधी प्रक्रियाओं को भी तेजी से पूरा करेगा।
सरकार का मानना है कि इससे भर्ती प्रक्रिया में लगने वाला समय कम होगा और खाली पदों को तेजी से भरा जा सकेगा।
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एक-दो साल में सुधार की उम्मीद
अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण अमित कुमार घोष के मुताबिक यूपी में डॉक्टरों की भर्ती कई स्तरों पर चल रही है। नए मेडिकल कॉलेजों से निकलने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी सरकारी सेवाओं से जोड़ा जा रहा है। अधिकारियों का दावा है कि अगले एक-दो सालों में बड़ी संख्या में रिक्त पद भर लिए जाएंगे, जिससे सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकेंगी।
सरकार भर्ती प्रक्रिया तेज करने और आकर्षक वेतन देने की कोशिश कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों के लिए बेहतर आवास, सुरक्षा और कार्य परिस्थितियां नहीं बनेंगी, तब तक क्या केवल भर्ती से डॉक्टरों की कमी दूर हो पाएगी? यही चुनौती फिलहाल प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी है।