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साइबर अपराध पर कैसे लगेगी लगाम? 350 केस, 6 इंस्पेक्टर और गाड़ी सिर्फ 1

लखनऊ साइबर थाने में 350 विवेचनाएं लंबित हैं। जिम्मेदारी सिर्फ 6 इंस्पेक्टरों पर है। न हवालात न पास में मालखाना है। पढ़ें रिपोर्ट।

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प्रतीकात्मक फोटो, Photo Credit: Social Media

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साइबर अपराध लगातार बढ़ रहा है, लेकिन अपराध पर अंकुश लगाने के लिए राजधानी में बनाए गए साइबर क्राइम थाने की व्यवस्था खुद संसाधनों की कमी से जूझ रही है। थाने में छह इंस्पेक्टर, करीब 350 लंबित विवेचनाएं और सिर्फ 1 सरकारी वाहन है। औसतन एक इंस्पेक्टर के जिम्मे करीब 58 मामलों की विवेचना है। यही नहीं, थाने में आरोपियों को रखने के लिए हवालात तक नहीं है, जबकि मालखाना भी करीब 10 किलोमीटर दूर पुराने परिसर में है। 

 

साइबर क्राइम थाने में फिलहाल छह इंस्पेक्टर तैनात हैं। जनवरी से अब तक 106 प्राथमिकी दर्ज हो चुकी हैं। पुराने और नए मामलों को मिलाकर करीब 350 विवेचनाएं लंबित हैं। यानी एक इंस्पेक्टर के हिस्से औसतन 58 मामलों की जांच है। थाने में 20 दारोगा भी विवेचना में सहयोग कर रहे हैं, लेकिन आईटी एक्ट से जुड़े मामलों की विवेचना इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी ही कर सकते हैं। ऐसे में साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच जांच का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

1 सरकारी गाड़ी के भरोसे पूरा थाना

साइबर अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को अक्सर दूसरे राज्यों तक जाना पड़ता है। इसके बावजूद थाने के पास केवल एक सरकारी वाहन है। बाहर दबिश के लिए अतिरिक्त वाहन की जरूरत पड़ने पर अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में समय लगता है और कई बार कार्रवाई प्रभावित होने की आशंका रहती है। 

 

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थाने में हवालात नहीं, मालखाना 10 किलोमीटर दूर

साइबर थाना पहले एसटीएफ की बिल्डिंग में संचालित होता था। बाद में इसकी जिम्मेदारी लखनऊ पुलिस को सौंप दी गई और कुछ महीने पहले इसे डालीगंज स्थित जेसीपी एलओ कार्यालय परिसर में स्थानांतरित किया गया। नए परिसर में हवालात और मालखाने की व्यवस्था नहीं हो सकी।थाने का मालखाना अब भी एसटीएफ की पुरानी बिल्डिंग में है, जो थाने से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वहां रखे माल की सुरक्षा के लिए अलग से पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगानी पड़ती है।

आरोपियों को रखने में भी परेशानी

गिरफ्तार किए गए आरोपियों को फिलहाल सिविल पुलिस के थानों की हवालात में रखना पड़ता है। संबंधित थानों के प्रभारी कई बार साइबर अपराध के आरोपियों को रखने में आनाकानी करते हैं। अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद दूसरे थाने में व्यवस्था करनी पड़ती है। इससे साइबर थाने की कार्रवाई में अतिरिक्त परेशानी पैदा होती है।

2016 में शुरू हुआ था पहला साइबर थाना

उत्तर प्रदेश में साइबर अपराध से निपटने के लिए वर्ष 2016 में लखनऊ और नोएडा में प्रदेश के पहले साइबर क्राइम थाने स्थापित किए गए थे। लखनऊ का थाना एसटीएफ की बिल्डिंग में बनाया गया था और इसकी निगरानी डीजी मुख्यालय स्तर से होती थी। समय के साथ साइबर अपराध के मामले तेजी से बढ़े, लेकिन उसी अनुपात में थाना स्तर पर संसाधन और मानवबल उपलब्ध नहीं हो सके। 

 

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व्यवस्था सुधारने का दावा

एडीसीपी क्राइम किरन यादव के मुताबिक साइबर क्राइम थाने को बेहतर बनाने के प्रयास जारी हैं। मालखाने के लिए जेसीपी क्राइम से अनुमति मिल गई है और जल्द व्यवस्था शुरू की जाएगी। उन्होंने कहा कि स्टाफ की कमी दूर करने की प्रक्रिया भी चल रही है।

 

हर केस की मॉनिटरिंग की जा रही है। सवाल यह है कि जब राजधानी के साइबर थाने में ही छह इंस्पेक्टरों पर 350 विवेचनाओं का बोझ हो, हवालात न हो और पूरा थाना एक सरकारी वाहन के भरोसे चल रहा हो तो बढ़ते साइबर अपराध के खिलाफ तेज और प्रभावी कार्रवाई कितनी आसान होगी?


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