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उपहार अग्निकांड के 29 साल बाद भी नहीं सुधरी दिल्ली, ये 5 बड़ी लापरवाहियां जारी

दिल्ली के मालवीय नगर के होटल में आग लगने से 21 लोगों की मौत हुई, जबकि 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड के 29 साल बाद भी हालात नहीं बदले और लापरवाहियां लगातार दोहराई जा रही हैं।

representative image of fire accident scene

प्रतीकात्मक तस्वीर। (Chatgpt Generated Image)

दिल्ली में आग लगने की घटनाओं का इतिहास अक्सर सुरक्षा नियमों की अनदेखी और चेतावनियों को नजरअंदाज करने की कहानियों से भरा रहा है। 1997 के चर्चित उपहार सिनेमा अग्निकांड से लेकर हाल ही में मालवीय नगर के होटल में हुए अग्निकांड तक, लगभग हर बड़ी दुर्घटना की जांच में यही बातें सामने आई हैं कि सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन नहीं हुआ।

 

मीडिया रिपोर्ट में दिए गए दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 के पहले पांच महीनों में राजधानी में आग लगने की 10,103 घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 44 लोगों की मौत हो गई। जनवरी में 1,396 आग की घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 6 लोगों की जान गई। फरवरी में 1,096 घटनाओं में भी 6 लोगों की मौत हुई।

 

मार्च में हालात और खराब रहे। जहां 1,538 आग की घटनाओं में सबसे ज्यादा 15 लोगों की मौत हुई। अप्रैल में दमकल विभाग को 2,663 कॉल मिलीं और इस दौरान 5 लोगों की जान गई। वहीं मई में स्थिति और बढ़ गई, 3,410 आग से जुड़ी कॉल आईं और 12 लोगों की मौत हो गई।

 

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बड़ी लापरवाहियों के कारण दिल्ली के बड़े अग्निकांडों का इतिहास

  • आपातकालीन निकास द्वारों का बंद होना: साल 1997 के उपहार सिनेमा कांड में 59 मासूमों की मौत की मुख्य वजह आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एग्जिट) का बंद होना था। आज भी दिल्ली की अधिकांश व्यावसायिक और बहुमंजिला इमारतों में सुरक्षा के इस सबसे बुनियादी नियम की अनदेखी की जा रही है।
  • रिहायशी इलाकों में अवैध फैक्ट्रियों का संचालन: साल 2019 में अनाज मंडी के भीड़भाड़ वाले इलाके की एक अवैध फैक्ट्री में आग लगने से 43 मजदूरों की जान गई थी। इसके अलावा 2018 में बवाना की अवैध पटाखा फैक्ट्री में भी 17 लोग मारे गए थे। नियमों को ताक पर रखकर घनी आबादी के बीच फैक्ट्रियां चलाना आज भी जारी है।
  • व्यावसायिक इमारतों में अवैध निर्माण: साल 2019 में करोल बाग के एक होटल में अवैध रूप से बनी रसोई के कारण लगी आग में 17 मेहमानों की मौत हुई थी। अधिक मुनाफे के चक्कर में बिना नक्शा पास कराए या अवैध रूप से किए गए विस्तार आज भी बड़ी लापरवाही बने हुए हैं।
  • अग्निशमन सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाना: मई 2022 में मुंडका की एक व्यावसायिक इमारत में भीषण आग ने 27 लोगों की जान ले ली थी। यह हादसा इस बात का पुख्ता सबूत था कि इमारतों में फायर फाइटिंग सिस्टम और NOC नियमों का पालन सिर्फ कागजों तक सीमित है।
  • संवेदनशील संस्थानों में सुरक्षा ऑडिट की कमी: साल 2024 में विवेक विहार के एक शिशु देखभाल केंद्र (बेबी केयर सेंटर) में ऑक्सीजन सिलेंडर फटने से सात नवजात बच्चों की मौत हो गई थी। अस्पतालों, देखभाल केंद्रों और धार्मिक समागमों (जैसे 2011 का नंद नगरी हादसा, जहां 14 मौतें हुईं) में नियमित सुरक्षा ऑडिट न होना आज भी प्रशासन की सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है।

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अगर कुल मिलाकर देखा जाए तो दिल्ली जैसे बड़े शहरों में आग लगने की बड़ी वजहें अक्सर कुछ ही लापरवाहियां होती हैं। इनमें अवैध निर्माण, फायर NOC के नियमों की अनदेखी, इमरजेंसी एग्जिट का न होना, सुरक्षा उपकरणों की कमी और चेतावनियों को नजरअंदाज करना शामिल है।


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