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14 साल बीते, गोमूत्र-गोबर से नहीं मिला कैंसर का इलाज; अब 3.5 करोड़ की तलाश

मध्य प्रदेश में 14 साल की रिसर्च के बाद भी पंचगव्य से कैंसर का इलाज नहीं मिला। अब सरकार यह जांच कर रही है कि 3.5 करोड़ की रकम कहां गई, क्योंकि प्रोजेक्ट में वित्तीय हेराफेरी की शिकायत मिली है।

Jabalpur News

नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय। ( Photo Credit: Social Media)

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मध्य प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितता का बड़ा मामला सामने आया है। करीब 14 साल पहले विश्वविद्यालय को एक शोध की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके तहत संस्थान को गौमूत्र, गोबर और दूध से बने पंचगव्य से कैंसर का इलाज तलाशना था। एक दशक से अधिक का समय बीत गया है। मगर नतीजा सिफर निकला। उल्टा वित्तीय अनियमितता के बाद सरकार अब इस बात की जांच कर रही है कि करोड़ों रुपये की यह रकम आखिर कहां गई है?

 

साल 2011 में मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय ने पंचगव्य से कैंसर का इलाज खोजने की परियोजना तैयार की। विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने मध्य प्रदेश सरकार से करीब 8 करोड़ रुपये की रकम मांगी। बदले में सरकार ने 3.5 करोड़ की धनराशि दी, ताकि शोध कार्य शुरू किया जा सके।  

 

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अधिक कीमत पर खरीदा बुनियादी सामान

आरोप है कि शोध के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया है। बाजार दर से अधिक कीमत पर बुनियादी सामान खरीदा गया। इसके अलावा गैर-जरूरी यात्राओं पर लाखों रुपये की रकम फूंकी गई। स्वीकृत अनुमान से इतर वाहनों की खरीद की गई और अब यह वाहन गायब हैं। वित्तीय अनियमितता की शिकायत मिलने के बाद जबलपुर संभागीय आयुक्त ने मामले की जांच का आदेश दिया। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोपों का खंडन किया और उसका कहना है कि खरीद प्रक्रिया में वित्तीय नियमों का पालन किया गया है। पंचगव्य परियोजना 2012 से पूरी पारदर्शिता और नियमों के मुताबिक संचालित हो रही है।

 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अतिरिक्त कलेक्टर की अगुवाई वाली टीम ने मामले की जांच करने के बाद रिपोर्ट जबलपुर के कलेक्टर को सौंप दी है।  रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ सामान की खरीद बाजार दरों से अधिक कीमत पर की गई। वहीं कुछ सामान ऐसा भी खरीदा गया, जिनका इस शोध से कोई नाता नहीं था।  

कहां-कहां खर्च की गई रकम?

रिपोर्ट में बताया कि 2011 से 2018 तक गोबर, गोमूत्र, भंडारण पात्र, कच्चा माल और मशीनरी समेत बुनियादी सामग्रियों पर करीब 1.92 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च की गई। जबकि बाजार में इन सामान की कीमत 15 से 20 लाख रुपये तक बनती है। स्वीकृति अनुमान से इतर करीब 7.5 लाख रुपये का एक वाहन भी खरीदा गया। जांच में यह भी सामने आया है कि मजदूरी पर 3.5 लाख, ईंधन और वाहन के रखरखाव में 7.5 लाख रुपये से अधिक की रकम उड़ा दी। संस्थान ने 15 लाख रुपये में फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खरीद की। इसके अलावा करीब 23 से 24 हवाई यात्राएं की गई। हालांकि इन यात्राओं का उद्देश्य क्या था, यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है।

 

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जांच अधिकारी ने क्या बताया?

अतिरिक्त कलेक्टर रघुवर मरावी ने बताया कि विश्वविद्यालय ने पंचगव्य प्रोजेक्ट के तहत 8 करोड़ रुपये की धनराशि मांगी थी। सरकार ने 3.5 करोड़ रुपये राशि दी थी। स्वीकृति अनुमान के अलग हवाई सफर और वाहन की खरीद पर रकम खर्च की गई। उन्होंने बताया, हमारी जांच में पता चला कि जिन वाहनों को कथित तौर पर खरीदा गया था, वे गायब थे।


यात्राओं का भी जिक्र नहीं था। प्रोजेक्ट के तहत किसानों को भी ट्रेनिंग दी जानी थी। मगर यह नहीं बताया गया कि प्रशिक्षण किस प्रकार दिया जाएगा? कलेक्टर से जांच का निर्देश मिला था। मामले की विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी गई है। 


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