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हत्यारे को 34 साल ढूंढती रही पुलिस, राशन कार्ड, आधार सब बनता रहा, अब हो गई मौत

34 साल पहले अपनी भाभी की हत्या करके फरार हुआ एक शख्स पुलिस की गिरफ्त में कभी नहीं आया। दूसरी तरफ, उसका राशन कार्ड भी बना, आधार भी बना और 7 साल पहले उसकी मौत भी हो गई।

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प्रतीकात्मक फोटो, Photo Credit: ChatGPT

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उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद से सामने आया एक मामला पुलिस, राजस्व विभाग और पूरे सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। साल 1991 में अपनी भाभी की हत्या कर फरार हुए आरोपी को पुलिस करीब 34 साल तक तलाशती रही जबकि उसकी मौत सात साल पहले, 16 जनवरी 2019 को ही हो चुकी थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि फरारी के दौरान आरोपी को वर्ष 2011 में सरकारी आवासीय भूमि का पट्टा भी आवंटित कर दिया गया। उसके आधार कार्ड, राशन कार्ड सहित तमाम सरकारी दस्तावेज बन गए लेकिन किसी भी विभाग को यह जानकारी नहीं हुई कि वह हत्या के मामले में वांछित आरोपी है। अब मामला सामने आने के बाद पुलिस व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।

 

फर्रुखाबाद के  कैथवा गांव का चौकीदार सोमनपाल वर्ष 1991 में अपनी भाभी सुखदेवी की गोली मारकर हत्या करने के बाद फरार हो गया था। घटना के बाद उसके खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया और 15 हजार रुपये का इनाम भी घोषित किया गया। शुरुआत में पुलिस ने उसकी तलाश की लेकिन समय बीतने के साथ जांच की रफ्तार धीमी पड़ गई और मामला फाइलों तक सिमटकर रह गया। इसी का नतीजा रहा कि एक इनामी आरोपी तीन दशक तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहा।

 

हत्या के बाद सोमनपाल दिल्ली भाग गया, जहां वह करीब 10 वर्षों तक रहा। बाद में वह फर्रुखाबाद के कायमगंज क्षेत्र के कुबेरपुर में आकर बस गया। यह स्थान उसी थाना क्षेत्र से महज दो किलोमीटर की दूरी पर था, जहां पुलिस उसकी तलाश का दावा कर रही थी। यहां उसने दूसरी शादी की और उसके परिवार में तीन बेटियां हुईं यानी जिस आरोपी को पुलिस प्रदेश भर में खोज रही थी, वह वर्षों तक सामान्य नागरिक की तरह परिवार के साथ जीवन बिताता रहा।

 

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2011 में मिला सरकारी पट्टा, आधार-राशन कार्ड भी बने

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि फरार रहने के बावजूद वर्ष 2011 में सोमनपाल के नाम सरकारी आवासीय भूमि का पट्टा आवंटित कर दिया गया। इसके बाद उसके आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य सरकारी दस्तावेज भी बन गए। परिवार का नाम सरकारी अभिलेखों में दर्ज हो गया और वह सरकारी योजनाओं का लाभ भी लेता रहा। यदि सरकारी रिकॉर्ड का पुलिस रिकॉर्ड से मिलान होता तो आरोपी की पहचान उसी समय हो सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

 

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि सोमनपाल की 16 जनवरी 2019 को कैंसर के कारण मृत्यु हो गई थी। उसका विधिवत मृत्यु प्रमाणपत्र भी जारी हो चुका था। इसके बावजूद पुलिस वर्ष 2026 तक उसे जीवित मानकर तलाश करती रही। यानी मृत्यु के पूरे सात साल बाद भी पुलिस रिकॉर्ड में आरोपी फरार ही दर्ज रहा। यह खुलासा होने के बाद विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

अदालत के बार-बार आदेश के बाद खुली पूरे सिस्टम की पोल

मामले में अदालत लगातार पुलिस से आरोपी की गिरफ्तारी को लेकर जवाब मांग रही थी। कई बार गिरफ्तारी के आदेश दिए गए, जिसके बाद पुलिस ने रिकॉर्ड की गहन जांच शुरू की। इसी जांच में पता चला कि आरोपी की वर्षों पहले मौत हो चुकी है। अब पुलिस मृत्यु प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत कर मुकदमे के विधिक निस्तारण की प्रक्रिया पूरी करेगी। यदि समय रहते रिकॉर्ड का सत्यापन किया गया होता तो यह तथ्य वर्षों पहले सामने आ सकता था।

 

मृतका सुखदेवी के मायके पक्ष की ओर से शुरुआती दौर में मुकदमे की प्रभावी पैरवी की गई थी। समय बीतने के साथ पैरवी कमजोर होती चली गई। कई गवाहों का निधन हो गया और मुकदमे की रफ्तार भी धीमी पड़ गई। इससे आरोपी की तलाश का मामला भी प्रशासनिक प्राथमिकता से बाहर होता चला गया। कानूनी जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक मुकदमे लंबित रहने से ऐसे मामलों में साक्ष्य और गवाह दोनों प्रभावित होते हैं।

 

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सवाल सिर्फ पुलिस पर नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र पर

यह मामला केवल पुलिस की लापरवाही नहीं माना जा रहा। सवाल यह भी है कि एक हत्या का आरोपी सरकारी रिकॉर्ड में सामान्य नागरिक कैसे बन गया? पंचायत, राजस्व विभाग, आवासीय पट्टा आवंटन, आधार पंजीकरण, राशन कार्ड और अन्य सरकारी प्रक्रियाओं के दौरान कहीं भी उसका आपराधिक रिकॉर्ड सामने क्यों नहीं आया? यदि विभागों के बीच डिजिटल समन्वय और सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी होता, तो एक इनामी आरोपी को तीन दशक तक खुलेआम रहने का मौका नहीं मिलता।

 

फर्रुखाबाद की पुलिस अधीक्षक आरती सिंह ने बताया, 'सोमनपाल की तलाश लंबे समय तक की गई थी। हाल में जानकारी मिली कि उसकी वर्ष 2019 में मृत्यु हो चुकी है। मृत्यु प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन कराया जा रहा है। सभी अभिलेखों की जांच के बाद नियमानुसार रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाएगी।'

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