उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले पुलिस अधीक्षक (SP) अनिल कुमार सिंह ने एक विवादित बयान दे दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने और राजनीतिक प्रतिक्रिया आने के बाद एसपी साहब ने अपनी सफाई दी और कहा कि मेरा उद्देश्य आपसी भाईचारा, सामाजिक सद्भाव और धार्मिक सौहार्द बनाने का था।
एसपी अनिल कुमार सिंह सावन में गोकशी से नाराज थे। गुरुवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, 'इस्लाम के अनुसार कोई भी ऐसा पशु जिसको काटने से किसी अन्य व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है, उसका मांस खाना हराम है। सच्चा मुसलमान जो है, कभी इस तरह का काम नहीं कर सकता है। जो लोग यह काम कर रहे हैं, या तो मुसलमान नहीं या तो बहुत हरा*# है। हरा*# का ही इलाज करना मेरा काम है।'
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दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक गुरुवार को पुलिस लाइन में गोकशी के खिलाफ अभियान के संबंध में एक बैठक बुलाई गई थी। बैठक के बाद एसपी अनिल कुमार सिंह मीडिया से बात की और इसी दौरान विवादित बयान दे डाला। उन्होंने कहा कि रामपुर के ज्यादातर लोग शांतिप्रिय और अमनपसंद है। मगर कुछ असामाजिक तत्व जिले का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं।
'मैंने सिर्फ सामाजिक सौहार्द की अपील की'
सोशल मीडिया पर पुलिस अधीक्षक का यह वीडियो खूब वायरल है। इस बीच रामपुर पुलिस ने सफाई जारी की। इसमें एसपी अनिल कुमार सिंह ने कहा, 'मेरे द्वारा मीडिया प्रतिनिधियों के गौकशी संबंधी प्रश्न के उत्तर में यह कहा गया था कि दारूल उलूम देवबंद द्वारा समय-समय पर यह कहा गया है कि जिन पशुओं के वध से किसी अन्य धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, ऐसे पशुओं का वध करना उचित नहीं है तथा इसे हराम बताया गया है। इसी संदर्भ में मैंने केवल एक सामाजिक एवं सौहार्दपूर्ण अपील की थी कि श्रावण माह के दौरान यदि किसी प्रकार की ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनसे अन्य समुदाय के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो ऐसे कार्यों से बचना चाहिए।'
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भावनाओं को आहत करने की मंशा नहीं थी: एसपी
आगे कहा गया, 'मेरा उद्देश्य केवल आपसी भाईचारे, सामाजिक सद्भाव एवं धार्मिक सौहार्द बनाए रखने का था। मेरे वक्तव्य का उद्देश्य किसी भी धर्म, समुदाय अथवा व्यक्त्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। बल्कि मेरा आशय केवल दारूल उलूम देवबंद द्वारा दिए गए संदेश का उल्लेख करते हुए सभी से आपसी सम्मान, शांति एवं सौहार्द बनाए रखने की अपील करना था। अगर मेरे वक्तव्य को किसी अन्य अर्थ में ग्रहण किया गया हो अथवा उससे किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो यह मेरी मंशा नहीं थी।'