अनुच्छेद 371F को लेकर जब भी चर्चा होती है विवाद शुरू हो जाता है। खासकर सिक्किम के लोग के बीच इसे लेकर चिंता और असुरक्षा की भावना देखने को मिलती है। इस बहस को फिर से हवा मिल रही है जिसके कारण चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल कुछ दिन पहले दार्जिलिंग के विलय के बारे में खबरें आई थी। इसे लेकर सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग ने राज्य के दार्जिलिंग के साथ विलय की संभावना को खारिज कर दिया है। उन्होंने यह कहा है कि उनकी सरकार सिक्किम के संवेधानिक दर्जे की रक्षा करेगीं।
सिक्किम के लोग इस अनुच्छेद के तहत दार्जिलिंग के विलय का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि राजनीतिक समाधान के चक्कर में कहीं उनकी संवैधानिक ढाल और उनका अपना अस्तित्व प्रभावित न हो जाए।
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क्यों है '371F' से इतना लगाव?
अनुच्छेद 371F (k) के तहत सिक्किम को भारत में विलय से पहले सभी पुराने सिक्किमी कानूनों को सुरक्षा प्रदान की गई थी। इसके तहत लोगों को एक अलग दर्जा मिला हुआ है। यहां के लोग ही सिक्किम में खेती के लिए जमीन या प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं। अगर इसमें थोड़ा सा भी बदलाव हुआ तो बाहरी लोग वहां जमीन खरीदने लगेंगे जिससे वहां के लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे। इस अनुच्छेद के अंदर राज्य में विधानसभा में मूल जनजातियों भूटिया-लेप्चा और कुछ विशेष वर्गों के लिए सीटें रिजर्व की गई हैं। इसके कारण स्थानीय आबादी का दबाव बना रहता है।
आपको बता दें कि राज्य के मूल निवासियों को भारत के कड़े टैक्स कानून से राहत मिली हुई है। 26 अप्रैल 1975 को सिक्किम को भारत का 22 वां राज्य बनाया गया। इस अनुच्छेद के जरिए भारत सरकार ने यह वादा किया था कि राज्य की अनूठी पहचान को सुरक्षित रखा जाएगा। देश के अन्य राज्यों में जहां आसानी से बाहरी पूंजी का निवेश किया जा सकता है वहीं सिक्किम में पहाड़ और जमीन बेची नहीं जा सकती। 371F का पहला नियम ही यह सुनिश्चित करता है कि सिक्किम की जमीन का मालिकाना हक केवल वहां के मूल निवासियों के पास रहे।
विवाद का केंद्र कब बना?
कुछ समय पहले जब पुराने भारतीय व्यापारियों को आयकर में छूट देने और राज्य में कुछ केंद्रीय कानूनों के विस्तार को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने 'एसोसिएशन ऑफ ओल्ड सेटलर्स ऑफ सिक्किम' मामले में फैसला सुनाते हुए 1975 से पहले बसे भारतीय मूल के व्यापारियों को टैक्स से छूट का पात्र माना था। कोर्ट ने समानता के अधिकार (Article 14) के तहत सालों से वहां रह रहे व्यापारियों को राहत दी थी।
सितंबर 2026 में केंद्र सरकार को दार्जिलिंग समाधान के लिए प्रो. महेंद्र पी. लामा की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट पेश की गई है। इसके तहत दार्जिलिंग के 'पड़ोसी क्षेत्रों के साथ एकीकरण' का जिक्र चौथे रास्ते के रूप में सामने आया। हालांकि बाद में इस पर सफाई दी गई लेकिन सिक्किम के लोगों में यह मैसेज गया कि उन्हें दार्जिलिंग के साथ मिलाने की कोशिश की जा सकती है।
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दार्जिलिंग का दर्द
पिछले सौ सालों से दार्जिलिंग अपनी एक अलग पहचान यानी 'गोरखालैंड' के लिए संघर्ष कर रहा है। पश्चिम बंगाल का हिस्सा होते हुए भी दार्जिलिंग के लोगों को लगता है कि राज्य की सरकार उनसे भाषाई और सांस्कृतिक रूप से दूर है। इसलिए वे केंद्र सरकार से एक ऐसा स्थायी राजनीतिक समाधान मांग रहे हैं जो उन्हें बंगाल के प्रशासनिक प्रभुत्व से मुक्ति दिला सके।
दार्जिलिंग अपने अधिकारों की लड़ाई जीतना चाहता है लेकिन सिक्किम अपने अधिकारों को खोना नहीं चाहता। हर बार दार्जिलिंग के राजनीतिक समाधान की राह में सिक्किम का अनुच्छेद 371F सामने आ जाता है। इसके बाद दार्जिलिंग का सवाल वहीं खड़ा रह जाता है।