पहाड़ों की खूबसूरत तस्वीरें देखकर क्या आपके मन में भी कभी ये ख्याल आया है कि शहर की भागदौड़ छोड़कर हिमाचल के किसी गांव में बस जाएं? अगर हां तो दिल्ली के अजय शर्मा का अनुभव आपको एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। मनाली में करीब 70 दिन बिताने के बाद अजय को एहसास हुआ कि पहाड़ों में छुट्टियां बिताना और पहाड़ों में जिंदगी बिताना दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं।
खास बात यह है कि मनाली में उनका मासिक खर्च करीब 21 हजार रुपये ही था। इसके बावजूद वह वहां लंबे समय तक नहीं टिक पाए और वापस दिल्ली लौट आए। अजय ने अपने अनुभव सोशल मीडिया पर साझा किए हैं, जिसके बाद पहाड़ों में बसने के सपने और उसकी हकीकत को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
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पर्यटक नहीं, स्थानीय की तरह जीने की कोशिश
दिल्ली की तेज रफ्तार जिंदगी से ब्रेक लेने के इरादे से अजय ने इसी साल मई में मनाली के पास सियाल गांव का रुख किया। उनका मकसद सिर्फ घूमना नहीं था। वह यह अनुभव करना चाहते थे कि जिस मनाली को पर्यटक कुछ दिनों के लिए जन्नत की तरह देखते हैं, वहां एक आम व्यक्ति के तौर पर लंबे समय तक रहना कैसा होता है।
करीब 70 दिनों तक उन्होंने गांव में रहकर रोजमर्रा की जिंदगी जी। इस दौरान उन्होंने अपने अनुभवों को कैमरे में भी कैद किया और करीब 55 वीडियो बनाए। लेकिन शुरुआत में जो शांति और सुकून उन्हें आकर्षित कर रहा था, कुछ समय बाद वही खामोशी उन्हें अकेलेपन और ऊब का एहसास कराने लगी।
सिर्फ 21 हजार रुपये में चल रही थी जिंदगी
मनाली में रहने का खर्च देखकर शायद आपको लगे कि अजय वहां आसानी से लंबे समय तक रह सकते थे। उन्होंने पर्यटकों की तरह महंगे होटल या रेस्टोरेंट में रहने के बजाय स्थानीय जीवनशैली अपनाई।
500 रुपये रोजाना खाने का खर्च
उन्होंने एक बेडरूम का फ्लैट करीब 14 हजार रुपये महीने में किराये पर लिया। इस रकम में बिजली और वाई-फाई भी शामिल था। घर पर खाना बनाने के कारण उनका किराना खर्च करीब 3,500 रुपये महीना रहा।
उन्होंने स्थानीय जिम की सदस्यता ली, जिसका खर्च करीब 1,500 रुपये महीने था। एक दिन बाहर खाना खाने पर करीब 500 रुपये खर्च हुए। इस तरह उनका कुल मासिक खर्च लगभग 21 हजार रुपये रहा। यानी खर्च कम था, लेकिन समस्या पैसे की नहीं थी।
फिर क्यों छोड़ना पड़ा पहाड़?
अजय के अनुभव में सबसे बड़ी चुनौती कनेक्टिविटी और नेटवर्क रही। रिमोट वर्क करने वाले व्यक्ति के लिए इंटरनेट महज सुविधा नहीं, बल्कि काम की जरूरत है। दूरदराज के इलाके में नेटवर्क की परेशानी ने उनकी मुश्किल बढ़ाई।
इसके बाद मानसून ने हालात और चुनौतीपूर्ण कर दिए। बारिश के दौरान सड़क, बिजली और इंटरनेट से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। पहाड़ों में मौसम बदलने के साथ रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित होती रही।
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अकेलेपन ने भी बदला नजरिया
मनाली में अजय अकेले रह रहे थे। दिल्ली की तरह आसपास लगातार लोगों की मौजूदगी नहीं थी। खाना बनाना, सफाई करना और रोजमर्रा के तमाम काम खुद संभालने पड़ते थे।
शुरुआत में यही आत्मनिर्भरता उन्हें अच्छी लगी, लेकिन समय बीतने के साथ अकेलापन और एक जैसी दिनचर्या उन्हें खलने लगी। मानसून के दौरान खराब सड़कों और आवाजाही की मुश्किलों ने भी इस अनुभव को और कठिन बना दिया।
पहाड़ों का सुकून बनाम पहाड़ों की जिंदगी
अजय की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि उन्होंने पहाड़ों को पर्यटक की नजर से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले व्यक्ति की नजर से देखने की कोशिश की। कुछ दिनों की छुट्टी में पहाड़ों की बारिश रोमांटिक लग सकती है, शांत वादियां सुकून दे सकती हैं और सड़क किनारे चाय का एक कप यादगार बन सकता है, लेकिन जब यही मौसम रोजमर्रा के काम, इंटरनेट, आवाजाही और सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगे तो तस्वीर बदल सकती है।
करीब 70 दिन बाद अजय दिल्ली लौट आए। उनका अनुभव यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या हम पहाड़ों की खूबसूरती से प्यार करते हैं या वास्तव में पहाड़ों की जिंदगी जीने के लिए तैयार भी हैं? अजय का जवाब शायद यही है। पहाड़ घूमने और पहाड़ में बसने के बीच बहुत बड़ा फर्क है।