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हर साल हजारों लाख का मुनाफा, फिर भी बिकी IMPCL, उत्तराखंड की नई चिंता क्या है?

सरकार ने अपनी आयुर्वेदिक दवा कंपनी IMPCL को बेचने का फैसला किया है। यह कंपनी आयुष मंत्रालय के अधीन है, आयुर्वेदिक और यूनानी दवाइयां बनाती है। अब इस पर हंगामा हो रहा है। पढ़ें रिपोर्ट।

IMPCL

IMPCLको अब स्काईमैप फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड ने खरीद लिया है। Photo Credit: IMPCL

केंद्र सरकार ने आयुष मंत्रालय के अधीन भारतीय औषधि फार्मास्यूटिकल निगम लिमिटेड (IMPCL) को बेच दिया है। स्काईमैप फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ इस कंपनी का सौदा, 121.01 करोड़ रुपये में किया गया है। सरकार ने अपने 100 फीसदी शेयर बेच दिए हैं, कंपनी का प्रबंधन और नियंत्रण अब स्काईमैप के पास है।

IMPCL की स्थापना साल 1978 में आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के उत्पादन और आपूर्ति के मकसद से की गई थी। साल 2017 में ही आयुष मंत्रालय ने तय किया था कि कंपनी को बेचा जाएगा। अब यह कंपनी, स्काईमैप की हो गई है। इसका सौदा, दो चरणों वाली खुली नीलामी प्रक्रिया के जरिए पूरी की गई।

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क्यों स्काईमैप को ही सरकार ने बेची कंपनी?

स्काईमैप फार्मास्यूटिकल्स ने इतनी महंगी बोली लगाई, जो तय कीमत से ज्यादा थी। इस पूरे सौदे में सड़क परिवहन मंत्री, वित्त मंत्री और आयुष राज्य मंत्री शामिल थे, उनकी मंजूरी से ही यह सौदा पूरा हो गया है। अब DIPAM और आयुष मंत्रालय के सचिवों को जल्द से जल्द इस सौदे को अंतिम रूप देने के निर्देश दिए गए हैं। 

क्या घाटे में चल रही थी कंपनी?

IMPCL घाटे वाली कंपनी नहीं है। कंपनी का प्रदर्शन साल-दर-साल बेहतर हुआ है। साल 2019-20 में कंपनी का मुनाफा सिर्फ 45 लाख रुपये था। साल 2020-21 और 2021-22 में कंपनी ने जबरदस्त उछाल दिखाया। 2021-22 में मुनाफा 3,376 लाख तक पहुंच गया, यानी करीब 75 गुना बढ़ोतरी देखी गई।

साल 2022-23 में गिरावट देखी गई, कुल मुनाफा 2,081 लाख के आसपास रहा। साल 2023-24 में और गिरावट आई, 1,281 लाख मुनाफा रहा। कंपनी ने दो साल पहले बहुत अच्छा मुनाफा कमाया था, लेकिन पिछले दो साल से उसका मुनाफा लगातार कम होता जा रहा है। 2023-24 में मुनाफा 2022-23 के मुकाबले करीब 38 फीसदी कम हो गया। 

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कंपनी के बिकने से सवाल क्या उठे हैं?

उत्तराखंड के कई संगठन, सत्ता और विपक्षी दलों के नेता इस सौदे का विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि सरकार नई कंपनी नहीं खोल रही है, मुनाफे वाली कंपनी ही लेकिन बेच दे रही है। उत्तराखंड क्रांति दल के नेता काशी सिंह ऐरी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद अजय भट्ट  ने भी भी इस फैसले की आलोचना की है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि उत्तराखंड पलायन के दर्द पहले से ही जूझ रहा है, एक कंपनी, जिसका उत्पाद देश-विदेश में बिक रहे थे, उसी को सरकार बंद कर रही है।

नेताओं को गुस्सा क्यों आया है?

काशी सिंह ऐरी, पू्र्व विधायक, उत्तराखंड क्रांति दल:-
बीजेपी सरकार फायदे में चल रही सरकारी कंपनियों को भी निजी हाथों में सौंप रही है । उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने वाली सरकारी कंपनी IMPCL को भी निजी कंपनी को बेच दिया गया है, जिससे वहां कार्यरत स्थानीय कर्मचारियों की नौकरियों पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

BJP के अपने ही फैसले पर उठा रहे सवाल

भारतीय जनता पार्टी के सांसद अजय भट्ट ने भी इस समझौते पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आयुष मंत्री को चिट्ठी लिखी, उन्होंने बताया कि देश के विकास के लिए क्यों IMPC जरूरी है, फिर भी सरकार ने उनकी नहीं सुनी। 1983 से अब तक, लगातार मुनाफे में रही कंपनी सरकार बेच रही है। उन्होंने चिंता जताई है कि कंपनी के बिकने से पहाड़ी इलाके में 500 से ज्यादा लोगों के रोजगार और पलायन का खतरा मंडराएगा। 

 

 

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ऐतराज किस बात पर है?

उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी ने दावा किया है कि यह सौदा, उत्तराखंड में पलायन बढ़ाने वाला है। उन्होंने कहा, 'केंद्र सरकार ने 26 मई 2026 को अल्मोड़ा स्थित IMPCL को मात्र 121 करोड़ रुपये में स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को बेच दिया। हैरानी की बात यह है कि जिस सरकारी कंपनी की नेटवर्थ लगभग 145 करोड़ रुपये बताई जा रही है, उसे उससे भी कम कीमत पर निजी हाथों में सौंप दिया गया।'

IMPCL में क्या बनता था, उत्तराखंड के लिए जरूरी क्यों?

काशी सिंह ऐरी ने कहा, 'IMPCL की स्थापना 12 जुलाई 1978 को वन विभाग की लगभग 40 एकड़ भूमि पर की गई थी। इस कंपनी के पास करीब 1200 प्रकार की औषधियां बनाने का लाइसेंस था। यह 575 प्रकार की आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाइयों का निर्माण कर देशभर के केंद्रीय अस्पतालों, रिसर्च संस्थानों और राज्य सरकारों के अस्पतालों को आपूर्ति कर रही थी।'

 

 


हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नरेद्र सिंह राव ने कहा, '1983 से मुनाफे में चल रही कंपनी IMPCL, कर्मचारियों के विरोध, बीजेपी के पूर्व केंद्रीय मंत्री की चेतावनी के बाद भी क्यों बेची गई। सवाल सिर्फ 121 करोड़ का नहीं है, सवाल सरकार की नीयत का है। जब कंपनी लाभ कमा रही थी तो उसे बेचने की जरूरत क्या थी? देश जानना चाहता है, घाटे वाली नहीं, मुनाफे वाली कंपनियां क्यों बेची जा रही हैं? जनता और सरकार की संपत्ति बेचकर सरकार नहीं चलती, सरकार दूरदृष्टि और जवाबदेही से चलती है। बीजेपी  को जवाब देना होगा कि यह निजीकरण क्यों? हजारों लोगो के रोजगार को ठोकर मार कर सरकार किसको फायदा दे रही है ? 

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इस फैसले का क्या असर होगा?

उत्तराखंड क्रांति दल के नेता काशी सिंह ऐरी ने बताया, 'यह केवल एक कंपनी की बिक्री का मामला नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के रोजगार, आयुर्वेदिक विरासत और सरकारी संपत्तियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। बीजेपी सरकार जनता को जवाब दे कि आखिर एक लाभ में चल रही सरकारी कंपनी को निजी कंपनी के हाथों क्यों बेचा गया? क्या सरकार का उद्देश्य सरकारी संस्थानों को मजबूत करना है या उन्हें धीरे-धीरे निजी कंपनियों के हवाले करना?

लोग गुस्से में क्यों हैं? 

IMPCL के 2022 से 2023 में अपने 45 साल पूरे होने पर सालाना रिपोर्ट प्रकाशित की थी। कंपनी से 500 से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। कंपनी के कुल 85 कर्मचारियों में से 81 फीसदी, लोग आसपास की पहाड़ियों के रहने वाले थे। प्रोडक्शन और अन्य कामों के लिए कंपनी ने आसपास के इलाकों से 325 मजदूरों को दैनिक मजदूरी पर भी काम पर रखा है। कंपनी कच्चा माल भी ज्यादातर स्थानीय स्तर पर खरीदती है। कुल करीब 500 उत्पादों में से कई चीजें लोकल मार्केट से ली जाती हैं। इस कंपनी से इलाके में लोगों की कमाई बढ़ रही थी, जीवन स्तर में सुधार हुआ था।

अब आगे क्या?

किशन शर्मा, अध्यक्ष, ठेका मजदूर कल्याण समिति:-
IMPCL इस पहाड़ी क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ है। इसे बेचना सैकड़ों मजदूरों और परिवारों के पेट पर लात मारने जैसा है। हम इस फैसले को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

IMPCL की बिक्री पर स्थानीय मजदूर भड़के हुए हैं। ठेका मजदूर कल्याण समिति ने इस फैसले की निंदा की है। अब समिति ने एलान किया है कि 1 जून 2026 को कारखाने के मुख्य गेट पर धरना दिया जाएगा। 

 


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