हम सब जानते हैं कि महिलाओं का योगदान देश के हर सेक्टर में तेजी से बढ़ रहा है। उसी तरह खेती में भी महिलाओं की भागीदारी काफी है लेकिन इनके श्रम को किसी तरह की पहचान नहीं मिलती। खेतों में पुरुषों के बराबर महिलाएं भी मेहनत करती है लेकिन आधी आबादी को इससे बाहर रखा जाता है। इसी सिलसिले में महिलाओं को पहचान दिलाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक नया कानून पारित किया है। इसके अंतर्गत महिलाओं को जमीन के मालिकाना हक के बिना भी औपचारिक रूप से 'किसान' का दर्जा देने का फैसला लिया गया है।
इस नई व्यवस्था के तहत महिलाओं को 'महिला किसान प्रमाणपत्र' जारी किया जाएगा। इससे जमीन के कागज न होते हुए भी महिला किसानों को बैंक लोन, फसल बीमा और सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली सब्सिडी का सीधा फायदा मिल सकेगा।
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क्यों पड़ी इस कानून की जरूरत?
देश में खेती-किसानी की तस्वीर बीते कुछ सालों में काफी बदली है। आपको यह जान कर हैरानी होगी कि आज देश के कुल खेती के काम में करीब 60 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है। पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे खेती का मुख्य जिम्मा महिलाओं पर आ गया है।
इतने बड़े पैमाने पर काम करने के बाद भी सिर्फ 15 % से कम महिलाओं के नाम पर जमीन के कागज मौजूद हैं। अब तक नियम था कि जिसके नाम पर जमीन होगी, सरकारी फायदा और बैंक लोन उसी को मिलेगा। इस वजह से खेती का काम पूरा करने के बाद भी महिलाएं कागजों पर किसान नहीं मानी जाती थीं।
क्या हैं नए कानून के मुख्य बिंदु?
राज्य में आए इस कानून से अब महिलाओं को किसान की पहचान साबित करने के लिए पति या पिता के नाम की जमीन के कागज दिखाने की मजबूरी नहीं होगी। इसके अंतर्गत ग्राम सभाओं और नगर पंचायतों के माध्यम से इन महिलाओं को यह पहचान दी जाएगी।
इस कानून में सबसे खास बात यह है कि राज्य में खेती से जुड़ी सभी महिलाओं के लिए 30 % की हिस्सेदारी तय की गई है। साथ ही ब्लॉक और जिला स्तर पर महिलाओं की सहायता के लिए स्पेशल ऑफिसर तैनात किए जाएंगे।
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कानून में समस्या क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में बड़ा कदम तो है लेकिन कुछ बुनियादी सवाल अब भी बने हुए हैं। सबसे बड़ी समस्या है कि यह प्रमाणपत्र महिला को क्रेडिट और सब्सिडी तो दिला सकता है लेकिन यह जमीन का कानूनी मालिकाना हक नहीं देता।
साथ ही इस पेपर के जरिए कोई भी महिला जमीन की बिक्री नहीं कर सकती है। किसी भी समस्या में या पारिवारिक विवाद में जमीन का असली मालिकाना हक महिलाओं के पास नहीं रहता। प्रमाणपत्र मालिक नहीं बनने देगा।
भविष्य की राह
उत्तराखंड जैसे राज्य ने पहले ही पत्नियों को पैतृक जमीन में बराबर का हक देने की पहल की है। जानकारों का कहना है कि महाराष्ट्र का यह प्रमाणपत्र तभी पूरी तरह सफल होगा, जब यह आगे चलकर जमीन पर महिलाओं के मालिकाना हक का जरिया बने।