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पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है AI, भारत को भी होगा नुकसान, रिपोर्ट ने मचाई खलबली

दुनिया भर में AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है और भारत समेत दुनिया भर में डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। इन सेंटर को क्लाइमेट चेंज और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Chatgpt

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहा है। AI को चलाने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं और भारत भी इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार और निजी कंपनियां इस सेक्टर में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। इस बीच क्रॉस डिपेंडेंसी इनिशिएटिव (XDI) की एक रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि AI को ताकत देने वाले ये डेटा सेंटर आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।

 

रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां जलवायु परिवर्तन का असर डेटा सेंटरों पर सबसे अधिक पड़ने की आशंका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, सोशल मीडिया, ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं के संचालन के लिए लगातार चलने वाले डेटा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इन सेंटरों को संचालित करने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत होती है। यदि इनकी संख्या इसी गति से बढ़ती रही तो ऊर्जा और जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा, जिससे पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है।

 

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भारत में तेजी से बढ़ रहा डेटा सेंटर नेटवर्क

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं IT मंत्रालय के अनुसार, भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जिसके 2025 तक करीब 1,500 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार ने AI कंप्यूट कैपेसिटी फ्रेमवर्क के तहत 14 सेवा प्रदाताओं के माध्यम से 38,231 GPU उपलब्ध कराए हैं। वहीं ऊर्जा मंत्रालय का अनुमान है कि 2031-32 तक डेटा सेंटरों की बिजली मांग बढ़कर 13.56 गीगावाट हो जाएगी। इस बढ़ती मांग को देखते हुए बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार भी किया जा रहा है।

भीषण गर्मी और जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा खतरा

क्रॉस डिपेंडेंसी इनिशिएटिव (XDI) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बनने वाले 41 डेटा सेंटरों का अध्ययन किया गया। इनमें से पांच डेटा सेंटर अभी से ही हाई-रिस्क कैटेगरी में आ चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 से 2100 के बीच भारत के डेटा सेंटरों को जलवायु से जुड़े नुकसान का औसत खतरा 269 फीसदी तक बढ़ सकता है।

 

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रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य, जो तेजी से डेटा सेंटर हब के रूप में उभर रहे हैं, आने वाले समय में भीषण गर्मी की वजह से परिचालन संबंधी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। बढ़ते तापमान से सर्वरों की क्षमता प्रभावित हो सकती है, कूलिंग सिस्टम पर ज्यादा दबाव पड़ सकता है और बिजली की खपत भी काफी बढ़ सकती है।

बिजली के साथ पानी पर भी बढ़ेगा दबाव

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डेटा सेंटर सिर्फ बिजली ही नहीं, बल्कि ठंडा रखने वाले सिस्टम (कूलिंग सिस्टम) के लिए भी बहुत ज्यादा पानी इस्तेमाल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक, 2030 तक AI डेटा सेंटरों का पानी का इस्तेमाल बढ़कर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है। वहीं नीति आयोग की रिपोर्ट पहले ही यह चेतावनी दे चुकी है कि 2030 तक भारत में पानी की मांग और उसकी उपलब्धता के बीच करीब 50 अरब घन मीटर का बड़ा अंतर हो सकता है।

 

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ऐसे में जैसे-जैसे AI और डेटा सेंटर बढ़ते जाएंगे, वैसे-वैसे बिजली और पानी दोनों के सही और संतुलित इस्तेमाल पर ध्यान देना बहुत जरूरी होगा, ताकि डिजिटल विकास भी चलता रहे और पर्यावरण पर भी ज्यादा दबाव न पड़े।

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