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2.42 लाख डिजिटल अरेस्ट केस के बीच WhatsApp यूजरनेम फीचर कितना सुरक्षित?

भारत सरकार ने व्हाट्सएप के यूजरनेम फीचर पर चिंता जताई है। आशंका है कि इससे साइबर अपराधियों को पहचान छिपाने में मदद मिलेगी और डिजिटल अरेस्ट जैसे ऑनलाइन ठगी के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT

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भारत में इन दिनों व्हाट्सएप के यूजरनेम फीचर को लेकर बहस तेज हो गई है। व्हाट्सएप इस फीचर को लॉन्च करने की तैयारी में था लेकिन उससे पहले भारत सरकार ने साइबर सुरक्षा को लेकर मेटा ( Meta ) को नोटिस भेज दिया और कई सवाल पूछे हैं। सरकार का साफ कहना है कि जब तक उसे इन सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं मिल जाते, तब तक इस फीचर को लॉन्च करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

 

सरकार का मानना है कि ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है ताकि लोग डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर फ्रॉड का शिकार न बनें। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2022 से 28 फरवरी 2025 तक डिजिटल अरेस्ट और उससे जुड़े साइबर अपराधों के 2,41,991 मामले (लगभग 2.42 लाख) दर्ज किए गए हैं। ऐसे में अब बड़ा सवाल यह है कि व्हाट्सएप का यूजरनेम फीचर यूजर्स के लिए कितना सुरक्षित साबित होगा।

 

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क्या है व्हाट्सएप यूजरनेम फीचर?

व्हाट्सएप की पैरेंट कंपनी मेटा का कहना है कि यूजरनेम फीचर का मकसद यूजर्स की प्राइवेसी को और मजबूत बनाना है। यानी अब किसी से चैट करने के लिए हर बार अपना मोबाइल नंबर बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कंपनी का दावा है कि इस फीचर को कड़ी सिक्योरिटी के साथ लॉन्च किया जाएगा।

 

वहीं, सरकार की चिंता कुछ और है। सरकार का कहना है कि अगर किसी को सरकारी संस्था, बैंक, सरकारी विभाग या किसी मशहूर शख्स से मिलता-जुलता यूजरनेम रखने की इजाजत मिल गई, तो ठग उसका गलत फायदा उठाकर लोगों को आसानी से अपना शिकार बना सकते हैं।

 

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देश में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामले

राज्यसभा में डिजिटल अरेस्ट और साइबर अपराधों को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह मंत्री ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। यह जवाब 12 मार्च 2025 को अतारांकित प्रश्न संख्या 1505 के तहत दिया गया था। गृह मंत्रालय के मुताबिक, साल 2022 में डिजिटल अरेस्ट और इससे जुड़े साइबर अपराधों के 39,925 मामले सामने आए थे लेकिन 2024 तक यह संख्या करीब तीन गुना बढ़कर 1,23,672 हो गई।

 

ठगी की रकम में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिला। साल 2022 में इन मामलों में 91.14 करोड़ रुपये की ठगी हुई थी, जबकि 2024 में यह रकम बढ़कर 1,935.51 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में 39,925, वर्ष 2023 में 60,676, वर्ष 2024 में 1,23,672 और 28 फरवरी 2025 तक 17,718 मामले दर्ज किए गए। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 से लेकर 28 फरवरी 2025 तक डिजिटल अरेस्ट और इससे जुड़े साइबर अपराधों में लोगों से कुल 2,575.89 करोड़ रुपये की ठगी की गई।

 

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कितना सुरक्षित है व्हाट्सएप का यूजरनेम फीचर?

डिजिटल अरेस्ट के ज्यादातर मामलों में ठगों ने व्हाट्सएप का इस्तेमाल किया है। वे खुद को पुलिस अधिकारी बताकर व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल करते हैं और लोगों को डराकर अपने जाल में फंसा लेते हैं। अब अगर ये ठग व्हाट्सएप के नए यूजरनेम फीचर का इस्तेमाल करके वीडियो कॉल करेंगे तो लोगों के लिए यह पहचानना और भी मुश्किल हो जाएगा कि सामने वाला सच में पुलिस अधिकारी है या फिर कोई ठग।

 

राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय ने बताया कि भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के जरिए कई स्तरों पर कार्रवाई की जा रही है। सरकार के मुताबिक, जवाब दिए जाने तक डिजिटल अरेस्ट से जुड़े 3,962 से ज्यादा स्काइपे आईडी (Skype ID) और 83,668 व्हाट्सएप अकाउंट की पहचान कर उन्हें ब्लॉक किया जा चुका था। इसके अलावा 7.81 लाख से ज्यादा सिम कार्ड और 2,08,469 आईएमईआई नंबर भी ब्लॉक किए गए हैं।

 

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आपको बता दें कि लोगों को साइबर ठगी से बचाने के लिए सरकार ने 1930 हेल्पलाइन, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान भी शुरू किए हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति ठगी का शिकार होने पर तुरंत शिकायत दर्ज करा सके।

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