क्या है ADxFluor, कैसे अल्जाइमर को पहचानना बनेगा आसान? हर सवाल का जवाब
अल्जाइमर ऐसी बीमारी है, जिसकी वजह से धीरे-धीरे इंसान सब कुछ भूलने लगता है, याददाश्त कमजोर पड़ जाती है। सही वक्त पर बीमारी को पहचान कर पाना ही सही इलाज है।

अल्जाइमर। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT
अल्जाइमर एक ऐसी बीमारी है, जिसकी वजह से धीरे-धीरे इंसान की याददाश्त कमजोर पड़ने लगती है और वह सब कुछ भूलने लगता है। सही वक्त पर बीमारी की पहचान कर पाना ही इसके इलाज का सबसे अहम हिस्सा है। अल्जाइमर से प्रभावित मरीजों और इलाज करने वाले डॉक्टरों के लिए एक राहत की खबर सामने आई है।
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाले जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी स्मार्ट तकनीक और प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जिससे अल्जाइमर से पीड़ित मरीजों में बीमारी के गंभीर होने से पहले ही उसके शुरुआती दौर में पहचान करना बेहद आसान हो जाएगा।
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कैसे होता है अल्जाइमर का टेस्ट?
अल्जाइमर है या नहीं, यह पता लगाने के लिए डॉक्टर मुख्य रूप से अल्जाइमर डिजीज (AD) के सबसे अहम बायोमार्कर एमिलॉयड-बीटा (Amyloid-β) की जांच करते हैं। JNCASR के वैज्ञानिकों के शोध से तैयार यह नई तकनीक मरीजों को महंगी और जटिल जांचों से राहत दिला सकती है। इसमें एक विशेष मॉलिक्यूलर प्रोब (सेंसर) को स्मार्टफोन से जोड़कर बीमारी के शुरुआती लक्षणों और स्टेज की पहचान आसानी से की जा सकती है।
कैसे काम करती है नई तकनीक?
एमिलॉयड-बीटा के संपर्क में आते ही TZ-48 नाम का एक फ्लोरोसेंट मॉलिक्यूल (स्मार्ट प्रोब) खास फ्लोरोसेंस सिग्नल (चमक) देने लगता है। इस चमक की तीव्रता को एक स्मार्टफोन एप्लीकेशन के जरिए रिकॉर्ड और मापा जाता है। इससे दिमाग और शरीर के तरल पदार्थों में अल्जाइमर के प्रोटीन के जमाव का सटीक स्तर पता चल जाता है। बीमारी की स्क्रीनिंग और स्टेजिंग तुरंत हो जाती है। डॉक्टरों को पता चल जाता है कि बीमारी पहले, दूसरे या अंतिम स्टेज में है।
अल्जाइमर क्या है और कैसे होता है?
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, अल्जाइमर एक प्रोग्रेसिव न्यूरोडिजेनेरेटिव बीमारी है। यह बीमारी उम्र बढ़ने के साथ-साथ और खतरनाक होती जाती है। बीमारी की वजह से दिमाग की तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगती हैं, ठीक से काम करना बंद कर देती हैं और अंतिम तक खत्म हो जाती हैं। जैसे-जैसे बीमारी आगे बढ़ती है, याददाश्त और पहचाने की क्षमताएं इतनी प्रभावित हो जाती हैं कि मरीज के लिए दैनिक जीवन के सामान्य काम करना भी कठिन हो जाता है।
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एमिलॉयड-बीटा है क्या?
एमिलॉयड-बीटा एक पेप्टाइड है, यानी प्रोटीन का अंश। जब यह पेप्टाइड असामान्य रूप से मुड़ने लगता है और इकट्ठा होकर रेशों (fibrils) का रूप ले लेता है, तो यह दिमाग में प्लाक के तौर पर जम जाता है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझते हैं कि यह दिमाग में कचरे की तरह जम जाता है। इस जमाव की वजह सेन्यूरोटॉक्सिक प्रक्रियाएं शुरू होती हैं, जिससे न्यूरॉन्स का आपसी संपर्क टूट जाता है और दिमागी कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं।
अभी किस तरह से जांच होती है?
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन एजिंग-अल्जाइमर्स एसोसिएशन (NIA-AA) द्वारा तय फ्रेमवर्क के अनुसार एमिलॉयड-बीटा (Aβ), टाउ (Tau) प्रोटीन और न्यूरोडिजेनरेशन, अल्जाइमर के तीन मुख्य बायोमार्कर हैं। इनमें एमिलॉयड-बीटा सबसे शुरुआती और अल्जाइमर से विशेष रूप से जुड़ा हुआ बायोमार्कर है।
अब तक इसकी पहचान के लिए मुख्य रूप से PET स्कैन और MRI जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये तकनीकें बेहद महंगी हैं। इनके लिए महंगी मशीनें और विशेषज्ञता की जरूरत होती है। ये हर जगह मौजूद नहीं होती हैं। खून से जांच करने वाली तकनीक भी जटिल और खर्चीली है। एक सरल, सटीक, सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने वाली तकनीक की जरूरत एक अरसे से थी।
JNCASR की तकनीक कैसे काम करती है?
JNCASR के वैज्ञानिकों की एक टीम ने TZ-48 नाम का एक स्मार्ट फ्लोरोसेंस प्रोब विकसित किया है। यह प्रोब एमिलॉयड-बीटा के फाइब्रिल्स को पहचानता है, उससे जुड़ता है और, अपने फ्लोरोसेंस सिग्नल में बदलाव दिखाता है। यह सेंसर, आसानी से ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) को पार कर जाता है, जिससे यह ट्रांसजेनिक चूहों के दिमाग में मौजूद हानिकारक ए-बीटा प्लाक को सीधे और स्पष्ट रूप से पढ़ना आसान हो जाता है।
दिमाग की माइक्रोस्कोपिक इमेजिंग के अलावा, यह रीढ़ की हड्डी के तरल (CSF) और बल्ड सीरम में भी अल्जाइमर के प्रोटीन की सटीक पहचान कर स्वस्थ और बीमार चूहों के बीच का अंतर बता देता है। यह तकनीक इसमें मदद करती है कि बीमारी किस स्टेज पर है और नई दवाइयां दिमाग से इस जमाव को साफ करने में कितनी प्रभावी हो रही हैं।
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कैसे काम करता है 'ADxFluor' स्मार्टफोन प्लेटफॉर्म?
क्लिनिकल स्तर पर इसे आम लोगों तक पहुंचाने के लिए वैज्ञानिकों ने 'एडीएक्सफ्लोर' नाम का एक स्मार्टफोन-इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म तैयार किया है। मरीज के ब्लड सीरम सैंपल में जब TZ-48 प्रोब मिलाया जाता है तो एमिलॉयड-बीटा की मौजूदगी में इसमें चमक पैदा होती है। स्मार्टफोन का कैमरा और ऐप इस चमक को रिकॉर्ड करते हैं। बिना किसी गलती के यह ऐप बता देता है कि सैंपल में अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन की कितनी मात्रा है।
क्यों खास है यह खोज?
यह सिस्टम काफी किफायती है, इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है और इसका इस्तेमाल करना बेहद सरल है। इससे अल्जाइमर और दिमाग से जुड़ी दूसरी बीमारियों की जांच के लिए अगली पीढ़ी के स्मार्ट टूल्स तैयार करने में बड़ी मदद मिलेगी। यह रिसर्च प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका 'एसीएस केमिकल न्यूरोसाइंस' में प्रकाशित हुई है।
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