मिजोरम सरकार ने राज्य की कृषि-इकोनॉमी को एक नई दिशा देने का फैसला किया है। इसके तहत स्थानीय फलों से 'फ्रूट बीयर' बनाई जाएगी। इस पॉलिसी को हरी झंडी मिल चुकी है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि किसानों को अपने फलों का बेहतर मार्केट मिलेगा। साथ ही उन्हें उनकी उपज के लिए सही और प्रॉफिटेबल प्राइसेज भी मिल सकेंगी। मुख्यमंत्री लालदुहोमा की अध्यक्षता में हाल ही में एक मीटिंग हुई थी। इस मीटिंग में मिजोरम लिकर प्रोहिबिशन अमेंडमेंट एक्ट 2025 के तहत 11 आवेदन को अप्रूवल दे दिया गया है। सरकार के पास टोटल 99 आवेदन आए थे। इनमें से 96 आवेदन फ्रूट बीयर के लिए थे और 3 आवेदन वाइनरी से जुड़े थे। फिलहाल 11 प्रपोजल पास हुए हैं। इसके अलावा 13 दूसरे प्रपोजल्स की टेक्निकल और लीगल इन्वेस्टिगेशन अभी चल रही है।

 

इस प्रोजेक्ट के लिए टोटल 99 आवेदन मिले थे। इनमें से 11 को लाइसेंस मिल चुका है और 13 दूसरी आवेदन की जांच अभी जारी है। इस पूरी प्रोसेस की मॉनिटरिंग के लिए एक कमेटी बनाई गई है। इस मल्टी-डिपार्टमेंटल सेलेक्शन कमेटी में कई डिपार्टमेंट्स के ऑफिसर्स शामिल हैं। इसमें कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज डिपार्टमेंट, एक्साइज एंड नारकोटिक्स डिपार्टमेंट, हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट और फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट के ऑफिसर्स शामिल हैं। इनके साथ ही मिजोरम यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स भी इस कमेटी का हिस्सा हैं। सरकार इसके लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर तैयार कर रही है। साथ ही वर्क को बेहतर बनाने के लिए प्रोड्यूसर्स के बीच आपसी दौरे को भी प्रमोट किया जा रहा है।

 

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किसानों को मिलने वाले फायदे

  • फलों की मांग बढ़ेगी: बीयर बनाने के लिए स्थानीय फलों की जरूरत होगी। इससे अनानास, पैशन फ्रूट, केला, अदरक, अमरूद और कटहल जैसे फलों की खरीद बाजार में बहुत बढ़ जाएगी।
  • बिचौलियों से छुटकारा: जब स्थानीय कारखाने सीधे किसानों से फल खरीदेंगे तो बिचौलियों पर किसानों की निर्भरता खत्म हो जाएगी। इससे किसानों को सीधा और नया खरीदार मिल जाएगा।
  • बेहतर और सही दाम: सरकार का मुख्य उद्देश्य यह पक्का करना है कि किसानों को उनकी मेहनत का पूरा फल मिले। बाजार में उन्हें उनकी उपज के लिए सही और अच्छे दाम मिल सकें।
  • बर्बादी पर रोक: कई बार ताजे फल समय पर आम बाजार में नहीं बिक पाते और खराब हो जाते हैं। ऐसे फलों को अब फैक्ट्रियों में इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे फसल कटाई के बाद होने वाली बर्बादी कम होगी।
  • मूल्य बढ़ाने का फायदा: किसान सिर्फ कच्चे फल बेचने तक सीमित नहीं रहेंगे। वे एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे जहां फलों से ज्यादा कीमत वाला तैयार सामान बनाया जाएगा।
  • रोजगार के नए मौके: इस उद्योग के शुरू होने से फल साफ़ करने, पैकिंग करने, गाड़ियों से ढोने और कारखाने के काम में बढ़ोतरी होगी। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे।

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मिजोरम का यूनिक मॉडल

भारत के दूसरे राज्यों में भी पुराने समय से स्थानीय फलों और चीजों से पेय पदार्थ बनाने का चलन रहा है। उदाहरण के लिए, गोवा में काजू और नारियल से फेनी बनाई जाती है। हिमाचल प्रदेश में सेब और खुबानी से स्थानीय ड्रिंक तैयार किए जाते हैं। कर्नाटक के कोडागु इलाके में अदरक और फलों से वाइन बनाई जाती है। इसके अलावा बेंगलुरु, पुणे और दिल्ली जैसे शहरों में छोटे कारखाने जामुन, कोकम और आम जैसे फलों से खास तरह की बीयर बनाने के प्रयोग कर रहे हैं। हालांकि, मिजोरम का यह मॉडल इन सबसे बिल्कुल अलग है। यह पूरी तरह से सरकार के नियमों और नियंत्रण के दायरे में काम करता है। इसमें किसानों को सबसे पहले रखा गया है ताकि खाने-पीने की चीजों को तैयार करने का एक व्यवस्थित और सही तंत्र बनाया जा सके।