करेंसी मार्केट में डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 96.28 के स्तर पर आ गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले हफ्ते रुपये में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह मई के बाद से सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट है जबकि मई में यह 96.96 के सबसे निचले स्तर पर गया था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में कारोबार करने वाले लोग कच्चे तेल के दाम और रिजर्व बैंक के कदमों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। इस पूरे उतार-चढ़ाव का असर यह होगा कि रुपये के गिरने से देश की कुछ बड़ी कंपनियों की कमाई पर सीधा असर पड़ेगा जिसमें कुछ का मुनाफा बढ़ेगा तो कुछ को बड़ा खर्च उठाना पड़ेगा।
रुपया कमजोर होने से देश की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को सीधा फायदा मिलता है। इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, एचसीएल टेक्नोलॉजीज और विप्रो जैसी कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा विदेशों से डॉलर में आता है। जब डॉलर मजबूत होता है और रुपया कमजोर होता है तो बाहर से आने वाला वही डॉलर भारत में एक्सचेंज होने पर ज्यादा रुपये में बदलता है। इससे इन कंपनियों का कुल रेवेन्यू और मुनाफा बढ़ जाता है। इन कंपनियों की सालाना रिपोर्ट और निवेशकों की बैठकों में जानकारी मिलती है कि डॉलर के मजबूत होने से इन आईटी कंपनियों को बड़ा आर्थिक लाभ होता है।
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फार्मा कंपनियों की कमाई बढ़ेगी
फार्मा सेक्टर के लिए भी कमजोर रुपया बहुत फायदेमंद साबित होता है। सन फार्मास्युटिकल्स, डॉक्टर रेड्डीज लेबोरेटरीज, सिप्ला और लुपिन जैसी बड़ी कंपनियां अमेरिका और दूसरे देशों में अपनी दवाएं बेचती हैं। इन कंपनियों को विदेश में दवा बेचने पर मिलने वाला पैसा डॉलर में होता है। जब रुपया गिरता है तो वही अमेरिकी डॉलर भारत में आकर रुपये में ज्यादा वैल्यू देता है जिससे इनकी पूरी कमाई बढ़ जाती है। कंपनियों की रिपोर्ट साफ कहती है कि विदेश में दवा बेचने से मिलने वाली कमाई पर रुपये के उतार-चढ़ाव का सीधा फायदा होता है
तेल कंपनियों पर बढ़ेगी लागत
कच्चा तेल विदेश से मंगाया जाता है और इसका भुगतान डॉलर में किया जाता है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड की तिमाही वित्तीय रिपोर्टों के मुताबिक, रुपया कमजोर होने पर तेल आयात करने की लागत काफी बढ़ जाती है। इन कंपनियों के आधिकारिक ब्योरों से यह साफ है कि डॉलर महंगा होने पर कच्चा तेल खरीदने के लिए इन्हें ज्यादा रुपये चुकाने पड़ते हैं जिससे इनके कामकाज पर भारी वित्तीय दबाव पड़ता है।
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एयरलाइंस की बढ़ेंगी मुश्किलें
विमान सेवा देने वाली कंपनियों को अपने विमान किराए पर लेने और ईंधन खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इंडिगो की तिमाही वित्तीय रिपोर्ट के मुताबिक, रुपया कमजोर होने पर डॉलर महंगा हो जाता है जिससे एयरलाइंस का रोजमर्रा का खर्च बहुत बढ़ जाता है। डॉलर के महंगा होने से इनका कामकाज चलाना काफी मुश्किल हो जाता है।
