15 अगस्त 2025 को अफगानिस्तान में तालिबान शासन के पांच साल पूरे हो चुके हैं। देशभर में जश्न मनाया गया। कारों के काफिले के साथ रैलियां निकाली गईं। चौक-चौराहों पर तालिबान का झंडा फहराया गया। राजधानी काबुल में कई समारोह और जश्न का इंतजाम किया गया। लेकिन ताजिकिस्तान से सटे अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्वी प्रांत बदख्शान के हालात बिल्कुल अलग हैं। 

 

यहां पिछले पांच दिनों से जंग छिड़ी है। जंग का दायरा ताजिकिस्तान तक बढ़ चुका है। तालिबान की सेना और एक तालिबान कमांडर के लड़ाके आमने-सामने हैं। अफगानिस्तान का वाखान कॉरिडोर बदख्शान प्रांत में ही पड़ता है। इस प्रांत की सीमा पाकिस्तान, भारत और चीन के अलावा ताजिकिस्तान से लगती है। इस लिहाज से यह झड़प और भी अहम हो जाती है। 

 

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वाखान कॉरिडोर के कारण यह जंग और प्रांत दोनों बेहद अहम हो जाते हैं। तालिबान के साथ हालिया झड़प के बाद पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वाखान कॉरिडोर पर अपनी निगाह टिका रखी है। आइए समझते हैं कि अफगानिस्तान के अंदर ही नई जंग क्यों छिड़ी है, पाकिस्तान की निगाह क्यों टिकी और अब तक क्या-क्या हुआ?

कहां और किसके बीच हो रही जंग?

बदख्शान प्रांत के नुसे जिले में जंग तालिबान और उसके विद्रोही कमांडर जुमा खान फतेह के लड़ाकों के बीच चल रही है। फतेह के लड़ाकों ने शनिवार को ही तालिबान का एक हेलीकॉप्टर मार गिराया है। यह हेलीकॉप्टर गोला-बारूद ले जा रहा था। हालांकि तालिबान का कहना है कि हेलीकॉप्टर लैंडिंग के वक्त हादसाग्रस्त हुआ है। जुमा खान फतेह जाबुल के पूर्व उप-गवर्नर हैं। उनकी अगुवाई में पिछले पांच दिनों से जंग रुक-रुककर जारी है। 

क्यों बागी हुआ जुमा खान फतेह?

अफगानिस्तान के भीतर जुमा खान फतेह तालिबान का सबसे बड़ा विद्रोही कमांडर बनकर उभरा है। नुसे जिले से ताजिकिस्तान सीमा तक फैल चुकी जंग इसकी व्यापकता को बयां करती है। भारी गोलीबारी के बाद नुसे जिले में बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं। यही हाल ताजिकिस्तान में है।

 

जुमा खान फतेह का कहना है कि वह तालिबान के प्रति वफादार है। उसे अफगानिस्तान से कोई दिक्कत नहीं है। उसका कहना है कि चाहे मुझे फांसी ही क्यों न दे दी जाए। मैं अफगानिस्तान का हिस्सा था, हूं और रहूंगा। विवाद की जड़ तालिबान नहीं, बल्कि उसके खुफिया बल हैं। उसका टकराव तालिबान के खुफिया बलों से है। उसका आरोप है कि खुफिया बल जबरन लोगों के घरों में घुसते हैं, तलाशी लेते हैं और उन्हें अपमानित करते हैं। 

 

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कुछ दिन पहले ही फतेह ने काबुल की यात्रा की थी। यहां तालिबान के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जंग की वजह सोने की खान पर वर्चस्व स्थापित करने की है। तालिबान ने बातचीत के माध्यम से मामला सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन कोई हल नहीं निकला। तेज होती जंग के बीच तालिबान सैन्य डिवीजन के उप कमांडर मौलवी गुलाम की अगुवाई में अतिरिक्त बलों को भेजा गया है।

 

फतेह का दावा है कि पूरे अफगानिस्तान में उसके झंडे के नीचे 10 हजार लड़ाके हैं। इसी बात से तालिबान बेहद परेशान है। अभी जंग जहां हो रही है, वह इलाका पहाड़ी है। फतेह के लड़ाके ऊपर पहाड़ों पर तैनात हैं, जबकि तालिबान के लड़ाकों ने नीचे से मोर्चा संभाल रखा है।

ताजिकिस्तान में भी तबाही, तनाव बढ़ा

अफगानिस्तान सीमा पर भड़की जंग की चपेट में ताजिकिस्तान भी आ गया है। उसकी सीमा तक गोली और गोलों ने तबाही मचा रखी है। ताजिकिस्तान ने तालिबान को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया और कहा कि उसके एयरस्पेस का उल्लंघन किया जा रहा है। गोलीबारी में उसके यहां घरों को नुकसान पहुंचा है। एक 21 वर्षीय महिला की गोली लगने मौत भी हो गई। लड़ाई का नतीजा यह है कि ताजिकिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ गया है।

पाकिस्तान पर क्या आरोप?

बदख्शान प्रांत में तालिबान को सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यहां विद्रोही गुटों के साथ हो रही झड़पों को तालिबान ने खुद ही स्वीकार किया है। तालिबान का आरोप है कि प्रांत में पाकिस्तान विरोधी गुटों को समर्थन दे रहा है। 9 अगस्त को तालिबान अधिकारियों ने दावा किया था कि बदख्शान में 74 हल्के और भारी हथियारों को पकड़ा गया है। पाकिस्तान से इनकी तस्करी की गई थी। आरोप लगाया कि इन हथियारों का इस्तेमाल अस्थिरता फैलाने और विध्वंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने में किया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों का खंडन किया है।

पाकिस्तान का असली प्लान क्या?

वाखान कॉरिडोर पर पाकिस्तान की नजर है। वह इसे तालिबान पर दबाव के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता है। पिछले साल तालिबान के साथ संघर्ष के दौरान पाकिस्तानी मीडिया ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि पाकिस्तान की सेना ने वाखान कॉरिडोर पर कब्जा कर लिया है। हालांकि बाद में पाकिस्तान ने अपने आधिकारिक बयान में इसका खंडन किया। 

 

मगर हाल के घटनाक्रम से साफ है कि पाकिस्तान ने वाखान समेत बदख्शान प्रांत में तालिबान विरोधी गुटों का समर्थन किया। पिछले पांच साल में आज तालिबानी शासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बदख्शान में उभरी है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन से ही तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) हमला करता है। 

 

इस्लामाबाद तालिबान पर टीटीपी को संरक्षण देने का आरोप लगाता है। पाकिस्तान के सुरक्षा रणनीतिकारों का मानना है कि अगर बदख्शान में विद्रोहियों को समर्थन दिया गया और तालिबान को पीछे धकेलने में कामयाबी मिली तो पाकिस्तान में आतंकवाद की लहर में कमी आ सकती है।

क्या है वाखान कॉरिडोर और उसका महत्व?

वाखान कॉरिडोर 350 किमी लंबा और बेहद संकरा भूभाग है। इसकी चौड़ाई 20 से 60 किमी तक है। इसका कुल क्षेत्रफल 10,300 वर्ग किलोमीटर है। वाखान कॉरिडोर की लगभग 75 किमी लंबी सीमा चीन के शिनजियांग प्रांत से लगती है। उत्तर में ताजिकिस्तान है। दक्षिण में पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा और भारत का जम्मू-कश्मीर है। कुछ ही किलोमीटर में ताजिकिस्तान, चीन, पाकिस्तान और भारत की सीमा होने के कारण वाखान कॉरिडोर का अपना रणनीतिक महत्व है।