भारत की दिग्गज केमिकल कंपनी टाटा केमिकल्स को केन्या छोड़ने के लिए आदेश दिया गया है। केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो अपने रुख पर अडिग हैंं और संवाद से भी बात नहीं बन पा रही है। टाटा केमिकल्स केन्या सरकार से नए सिरे से बातचीत का रास्ता तलाश रही है। सिर्फ टाटा केमिकल्स ही इकलौती कंपनी नहीं है, जिसे अफ्रीकी देशों में मुश्किलों का सामना करना पड़ा हो।
भारतीय कंपनियों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय मानकों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। ऐसे आरोप पहली बार नहीं लगे हैं, कई बार लग चुके हैं। भारतीय कफ सिरप कंपनियों को लेकर आलोचना होती रही है। कभी तय मानकों के अनुरूप काम न करने के आरोप लगते रहे हैं।
भारत दुनिया के लिए फार्मेसी का हब रहा है। दुनिया की करीब 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाइयां भारत में बनती हैं और 200 से ज्यादा देशों को ये दवाएं निर्यात की जाती हैं। पिछले कुछ सालों में अफ्रीकी देशों में भारतीय दवा कंपनियों की वजह से हुई बच्चों की मौतें और बैन दवाओं की तस्करी ने इस इंडस्ट्री की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
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2022 से अब तक क्या बदला?
2022 में गैंबिया में हरियाणा की मेडन फार्मास्युटिकल्स के कफ सिरप से जुड़ी 69 से 70 बच्चों की मौत का मामला सामने आया था। इसके बाद उज्बेकिस्तान में भी भारत में बनी कफ सिरप से 68 बच्चों की जान गई और 2023 में कैमरून में 12 बच्चों की मौत का कारण भारत में बनी लेकिन ब्रिटेन का लेबल लगी कफ सिरप बताई गई।
कफ सिरप कांड वाली बदनामी क्या है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की जांच में गैंबिया की मौतों से जुड़े कफ सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल जैसे औद्योगिक इस्तेमाल वाले जहरीले रसायन मिले थे। WHO ने बताया था कि यह मात्रा तय सीमा से 200 गुना से भी ज्यादा थी। हालांकि भारतीय नियामकों ने अपनी जांच में इन केमिकल की मौजूदगी से इनकार किया था, वहीं गैंबिया की संसदीय समिति ने मेडन फार्मास्युटिकल्स को जिम्मेदार ठहराया।
पिछले साल भारत में भी कोल्ड्रिफ, रेस्पिफ्रेश टीआर और रीलाइफ सिरप की वजह से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा समेत कई राज्यों में 24 बच्चों की मौत हुई थी। जांच में कोल्ड्रिफ में करीब 50 प्रतिशत तक डाइएथिलीन ग्लाइकॉल पाया गया था जो इंसानों के लिए जानलेवा माना जाता है।
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बैन ओपिओइड दवाओं की तस्करी भी बड़ी चुनौती
कफ सिरप के अलावा हाल के महीनों में एक नई समस्या सामने आई है, जिसमें भारतीय फार्मा कंपनियां टापेंटाडोल और कैरिसोप्रोडोल के मिश्रण वाली दर्द निवारक दवाएं पश्चिम अफ्रीकी देशों में भेज रही हैं। यह मिश्रण नशे की लत लगाने वाला और सांस रोकने वाला बताया जाता है, जिसे भारत ने फरवरी 2025 में बैन कर दिया था।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के बाद यह मामला सामने आया कि मुंबई की एवियो फार्मास्युटिकल्स और उसकी सहयोगी कंपनी वेस्टफिन इंटरनेशनल इन दवाओं की भारी मात्रा में तस्करी कर रही थीं। इसके बाद भारत के ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ने इस दवा के निर्माण और निर्यात की सभी अनुमतियां रद्द कर दीं और मुंबई के प्लांट पर छापेमारी कर सारा स्टॉक जब्त किया।
बैन के बावजूद खूब हो रही है तस्करी?
एक अन्य जांच के मुताबिक भारत के बैन लगाने के बाद भी 60 से ज्यादा भारतीय फार्मा सप्लायरों ने करीब 130 मिलियन डॉलर मूल्य की सिंथेटिक ओपिओइड गोलियां पश्चिम अफ्रीकी देशों को भेजीं। ज्यादातर मामलों में इन देशों ने इन दवाओं को मंजूरी भी नहीं दी थी। पीआरजी फार्मा का नाम सामने आया। इसके निदेशक मेडन फार्मास्युटिकल्स से भी जुड़े हैं।
बैन के बाद भी उन्होंने कथित तौर पर खेप भेजी और दावा किया कि इससे कोई नुकसान नहीं है। सिएरा लियोन में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम करने वाले शोधकर्ताओं के मुताबिक स्थानीय स्तर पर इन दवाओं को कुश नाम के एक नशीले पदार्थ में मिलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। कई देशों में नशे का गंभीर संकट पैदा हो गया है।
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गुणवत्ता को लेकर पहले से ही सवालों में है मेडिकल इंडस्ट्री
अफ्रीका में हुई इन घटनाओं से पहले भी भारतीय दवा कंपनियां गुणवत्ता को लेकर सवालों में घिरती रही हैं। अमेरिकी दवा नियामक FDA ने पिछले कुछ सालों में सन फार्मा, रैनबैक्सी और पॉलीड्रग लैबोरेटरीज समेत कई भारतीय प्लांट से आयात पर रोक लगाई है, जिनमें डेटा में गड़बड़ी और उत्पादन गुणवत्ता से जुड़ी खामियां पाई गई थीं। भारत सरकार ने भी घरेलू स्तर पर सैकड़ों कंपनियों का निरीक्षण कर कई के लाइसेंस निलंबित किए हैं और कुछ के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं।
