दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति काफी बेहतर हुई है। यह केवल कहने के लिए नहीं, आंकड़े इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। इसी सिलसिले में ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के 'ग्लोबल सिटीज इंडेक्स 2026' ने आंकड़े जारी किए है। इसमें बताया गया है कि दुनिया के 100 सबसे तेजी से बढ़ते शहरों में से 55 शहर भारत के हैं। इस रिपोर्ट में खास बात यह है कि इसमें देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों के भी नाम शामिल है। यह रिपोर्ट बताती है कि देश की आर्थिक विकास की रफ्तार अब केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं बल्कि देश के छोटे शहर भी इसमें भागीदारी दर्ज करा रहे हैं।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे यंग लेबर फोर्स, मैन्यूफैक्चरिंग, बढ़ता कॉर्पोरेट नेटवर्क और गैर-मेट्रो शहरों में बनते यूनिवर्सिटी इस रफ्तार के मुख्य इंजन बन रहे हैं। साथ ही इस रिपोर्ट में जीवन की गुणवत्ता, बढ़ता वायु प्रदूषण, बुनियादी ढांचा और आय की असमानता पर चिंता जताई गई है।
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मेट्रो से आगे निकले टियर-2 और टियर-3 शहर
रिपोर्ट का सबसे खास पहलू विकास का 'विकेंद्रीकरण' है। आपको यह बताना जरूरी है कि आर्थिक विकास के मामले में दुनिया के शीर्ष 50 शहरों में 23 भारत के शहरों को जगह मिली हैं। गुजरात के सूरत और आंध्र प्रदेश का अमरावती तेजी से उभरते शहरों की ग्लोबल लिस्ट में सबसे ऊपर स्थान में शामिल है। इस लिस्ट में सबसे खास बात यह रही कि टियर-2 और टियर 3 शहरों का भी नाम शामिल है। शहरों में प्रयागराज, लखनऊ, रांची, तिरुचिरापल्ली और विशाखापत्तनम शामिल है जिन्होंने नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर रैंकिग में बढ़त हासिल की है।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि कैसे छोटे शहरों ने इस लिस्ट में अपनी जगह बनाई। देखा जाए तो इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं। पहला, टियर-2 और टियर-3 शहरों में युवाओं की एक बड़ी आबादी स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहा है। दूसरा, इन शहरों में मैन्यूफैक्चरिंग तेजी से बढ़ रहा है जो विकास में मदद कर रहा है। तीसरा और अंतिम कारण बड़ी कंपनियों के रिजनल ऑफिस और तेजी से बढ़ते यूनिवर्सिटी के विस्तार से इन शहरों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
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'जीवन की गुणवत्ता' और 'प्रदूषण'
तमाम अच्छी बातों के बीच इस रिपोर्ट में कुछ बातों पर विशेष चिंता जाहिर की गई है जो कि देश के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहा है। इस रिपोर्ट में जीवन की गुणवत्ता यानी क्वालिटी ऑफ लाइफ पर चिंता जाहिर की गई है। इसमें साफ कहा गया है कि खराब हवा, बुनियादी ढांचों की कमी और पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं भारतीय शहरों के ओवरऑल इंडेक्स स्कोर को कम कर रही हैं। साथ ही आय की असमानता पर भी सवाल किया गया है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद अमीर और गरीब के बीच अंतर बढ़ते जा रहा है जो कि शहरों के सतत विकास के लिए एक बड़ी रूकावट बन सकता है।
इस रिपोर्ट के आने के बाद हम यह कह सकते हैं कि भारत का अगला आर्थिक दौर टियर-2 और टियर-3 शहरों के दम पर लिखा जाएगा। हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि अगर इन शहरों को लंबे समय के लिए टिकाए रखना है तो आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण और जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार करना होगा। इन सभी समस्याओं से जल्द निपटने की जरूरत है जिससे रफ्तार में किसी तरह की रूकावट न हो।
