नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) ने 4 अगस्त 2026 को सभी राज्यों को पत्र भेजकर लीगल एड डिफेंस काउंसिल (LADC) की संविदा को जारी न रखने की अपील की है। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में नई संविदा सितंबर 2026 से लागू होने वाली थी। बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संविदा की मौजूदा अवधि खत्म होने पर इन्हें नहीं बढ़ाने की बात कही गई है। NALSA की मांग है कि जिला जज अब कानूनी मदद के मामले बार के सदस्यों दें और प्राथमिकता उन वकीलों को मिले जो कानून के पेशे में नए हैं या अभी हाल में ही करियर शुरू किया है।

नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी का यह फैसला पंजाब और हरियाणा के वकीलों के विरोध के बाद आया है। वकीलों का कहना है कि सरकारी खर्च पर रखे गए वकील आपराधिक मामलों का बड़ा हिस्सा ले रहे हैं।  जो वकील, सरकार का हिस्सा नहीं है, निजी स्तर पर वकालत कर रहे हैं, उनका काम घट गया है, उन्हें काम नहीं मिल रहा है। अब उत्तर प्रदेश के 85 LADC ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस फैसले को चुनौती दी है। याचिका 3 सितंबर 2026 को दाखिल हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है और सभी पक्षकारों को मंगलवार को नोटिस भी दिया है।

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क्या है LADC योजना और वकील क्यों नाराज हैं?

 नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने साल 2022 में लीगल एड डिफेंस काउंसिल योजना की शुरुआत की थी। मकसद था कि वकील इस संस्था के लिए काम करेंगे। वे निजी तौर पर अदालतों में प्रैक्टिस करने की जगह NLSA के लिए काम करेंगे। LADC अधिवक्ता, उन आरोपियों के मुकदमे लड़ते हैं जो वकील का खर्च नहीं उठा सकते। ये वकील निजी केस नहीं ले सकते। जमानत, रिमांड, ट्रायल और अपील के साथ जेलों का दौरा भी इनके काम में आता है।

पहले कैसे काम होता था?

LADC से पहले यह काम पैनल के वकील करते थे। पैनल के वकील अपनी निजी प्रैक्टिस भी करते थे। योजना के दस्तावेज में कहा गया है कि इससे उनके पास समय नहीं रहता था। वह अपने निजी क्लाइंट के भी मुकदमे देखते थे, उनकी पेशी और बहस के लिए जात थे, जिसकी वजह से सरकारी काम बाधित होता था। LADC को शुरू में 2 साल के लिए रखा जाता है। इसके बाद अच्छे प्रदर्शन पर हर साल कार्यकाल बढ़ता है। हर 6 महीने में उनके काम की समीक्षा होती है।

LADC का प्रदर्शन कैसा रहा है?

याचिका में केंद्रीय कानून मंत्रालय के मार्च 2026 के एक प्रेस नोट का जिक्र किया गया है। 31 दिसंबर 2025 तक 680 जिलों में LADC के दफ्तर चल रहे थे। इनमें 12,62,857 मामले सौंपे गए और 8,71,581 निपटाए गए। 2,76,476 विचाराधीन कैदियों को वकील मिला और 59,630 की रिहाई हुई। यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2025-26 में दिसंबर 2025 तक का है।

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बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा LADC के खिलाफ क्यों?

बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा ने 13 जुलाई 2026 को एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई थी। मीटिंग में योजना को तुरंत वापस लेने और इसकी समीक्षा की मांग की गई थी। बार काउंसिल के मुताबिक LADC, सरकार के पैसे से चलने वाला एक अलग डिफेंस सिस्टम बन गया है। 

जमानत, हत्या और NDPS जैसे मामलों का बड़ा हिस्सा अब LADC के पास है। युवा वकीलों को शुरुआती दौर में मिलने वाला रोज के क्रिमिनल केस घट गए हैं। कुछ वकीलों पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है। आय के हलफनामों की जांच ठीक से न होने से सक्षम लोगों के भी कानूनी मदद लेने की आशंका भी बनी हुई है।

नाराजगी की वजह क्या है?

बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा की बैठक में यह बात सामने आई कि पठानकोट में 8,380 आपराधिक मामलों में से 1,507 LADC के पास थे। यह करीब 18 प्रतिशत है। काउंसिल ने पुराने पैनल सिस्टम को फिर मजबूत करने और उसमें युवा वकीलों को बारी-बारी से मौका देने की मांग की है। अगर LADC काम करेंगे तो युवा वकीलों का कामकाज कैसे चलेगा, वे कानून के पेशे में कैसे बने रह सकेंगे।

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आंदोलन से क्या हासिल हुआ है?

जब बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा की बैठक बुलाई गई,तब पंजाब में वकीलों का राज्यव्यापी हड़ताल चल रहा था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में इस पर जनहित याचिका भी लगी। 20 जुलाई को हाईकोर्ट ने मामला आपसी सहमति से सुलझने की उम्मीद में टाल दिया। 27 जुलाई को हाई कोर्ट ने जिला विधिक सेवा के अधिकारियों को कई निर्देश दिए। इनमें जेल दौरे, LADC की नियुक्ति और पात्रता की जांच जैसी बातें थीं। 31 जुलाई को हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की आम सभा ने 3 अगस्त से काम पर लौटने का फैसला लिया। कई बार संघों की संयुक्त कार्य समिति ने आंदोलन जारी रखने की बात कही।

NALSA को बार-बार बैठकों से क्या हासिल हुआ?

3 अगस्त को NALSA ने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ के बार संघों के प्रतिनिधियों से बैठक की। अगले दिन एक पत्र जारी किया गया। पत्र में बार प्रतिनिधियों से योजना की कमियों पर ठोस सुझाव मांगे गए। कहा गया कि योजना की समीक्षा के लिए समिति पहले ही बन चुकी है। यह समिति 6 मार्च 2026 को बनी थी। इसमें हाईकोर्ट के मौजूदा जज और NALSA औ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के अधिकारी शामिल हैं।

यूपी की LADC याचिका क्या कह रही है?

उत्तर प्रदेश के LADC की याचिका में कहा गया है कि समीक्षा पूरी होने से पहले ही संविदा को दोबारा शुरू करने करने से रोक दिया गया। उनका कहना है कि पत्र में इस बात का कोई आकलन नहीं दिया गया है कि योजना कहां नाकाम रही। याचिका के मुताबिक पंजाब और हरियाणा के आंदोलन से उत्तर प्रदेश का कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि पुराने मामलों को आगे कौन देखेगा, इसकी कोई व्यवस्था नहीं बताई गई। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 39A का हवाला दिया गया है।

  • अनुच्छेद 14: कानून की नजर में सब बराबर हैं और किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा
  • अनुच्छेद 21: हर व्यक्ति को सम्मान और आजादी के साथ जीने का बुनियादी हक है
  • अनुच्छेद 39A: पैसे की कमी की वजह से किसी को न्याय पाने से वंचित न रहना पड़े, इसके लिए मुफ्त कानूनी मदद मिलेगी

याचिकाकर्ता क्या चाहते हैं?

LADC याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे स्थायी नौकरी या परमानेंट करने की मांग नहीं कर रहे। वे यह भी मानते हैं कि NALSA को योजना की समीक्षा और बदलाव का अधिकार है। उनकी आपत्ति फैसले के तरीके पर है। उन्होंने पत्र का वह हिस्सा रद्द करने की मांग की है जो उत्तर प्रदेश समेत बाकी राज्यों पर लागू होता है। योजना जारी रखने और अंतरिम रोक की भी मांग की है। याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में 31 दिसंबर 2024 तक 74 LADC दफ्तर थे। इनमें 303 डिफेंस काउंसिल और 85 अन्य कर्मचारी थे। अब इनके सामने आजीविका का संकट है।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है यह केस?

इसी मुद्दे पर एक और याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने 25 अगस्त को असम, मेघालय और नागालैंड के LADC की याचिका पर केंद्र और NALSA से जवाब मांगा था। इस फैसले के आलोचक भी हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका को दायर करने वाले एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड विशाल अरुण मिश्रा ने खबरगांव के साथ बातचीत में कहा, 'LADC का न होना, जेलों में विचाराधीन कैदियों की न्याय तक पहुंच रोकेगा। हर कैदी को वकील मिलना, उसका मौलिक और विधिक अधिकार है। अगर NALSA यह फैसला ले रही है तो इस फैसले की वजह से कई लोग न्याय के लिए तरस जाएंगे, गरीब तबके पर इसकी मार सबसे ज्यादा पड़ेगी।'

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याचिका में फंडिंग पर क्या कहा गया है?

NALSA के फैसले के खिलाफ दायर इस याचिका में फंडिंग का पहलू भी दर्ज है। NALSA के 1 अगस्त 2025 के सर्कुलर के मुताबिक केंद्र ने वित्त वर्ष 2025-26 तक योजना का पूरा खर्च उठाया। 2026-27 और 2027-28 में उसका हिस्सा 75 प्रतिशत तक आ जाएगा। 2028-29 और 2029-30 में 50 प्रतिशत और 2030-31 में 25 प्रतिशत रहेगा। इसके बाद पूरा खर्च राज्य सरकारें उठाएंगी। क्या NALSA सरकारी दबाव में ऐसे फैसले ले रही है, यह स्पष्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षकारों को इस संबंध में नोटिस भेजा है और उनसे जवाब मांगा है।