3,488 किलोमीटर लंबा बॉर्डर, 9,000–18,700 की ऊंचाई और सर्दियों में तापमान माइनस 45°C. ITBP यानी इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के जवान इस कठिन हालात में ड्यूटी करते हैं। कई जगहों पर जवानों को समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर रहकर सीमा की निगरानी करनी पड़ती है। जवानों के सामने हर मौसम अलग चुनौती लेकर आता है। कभी तेज हवा तो कभी बर्फ की चादर। यहाँ मौसम कई बार दुश्मन देश से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है। ऊँचाई अधिक होने पर ऑक्सीजन की कमी के बीच गश्त करना और भी मुश्किल हो जाता है। ITBP के जवानों को सीमा सुरक्षा के साथ खुद के सेहत को भी सुरक्षित रखना पड़ता है।
ITBP की जिम्मेदारी भारत-चीन सीमा की निगरानी करना है। बांग्लादेश के बाद भारत सबसे लंबा बॉर्डर चीन के साथ शेयर करता है। ऐसे में अलग-अलग चौकियों की मदद से बॉर्डर की रक्षा की जाती है। इस सीमा पर कई चौकियां ऐसे इलाकों में हैं, जहां पहुंचना भी आसान नहीं है। बीजेपी नेता किरेन रिजिजू ने बताया था कि पूर्वोत्तर में भारत-चीन सीमा पर ITBP की कुछ चौकियां एक-दूसरे से 30–40 किलोमीटर दूर हैं। दुर्गम पहाड़ी रास्तों, खराब मौसम और सीमित सुविधाओं के बीच जवानों को अपनी ड्यूटी निभानी पड़ती है। सर्दियों में बर्फ की चादर से सड़क और खाई कुछ एक जैसे ही लगते हैं। ऐसे में सड़क का संपर्क टूट जाता है। सवाल है कि इन परिस्थितियों में जवानों की ड्यूटी कितनी चुनौतीपूर्ण होती है और उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
9 हजार से 18,800 फीट की ऊंचाई पर तैनाती
ITBP की कई सीमा चौकियां समुद्र तल से 9 हजार से लेकर 18,800 फीट तक की ऊंचाई पर स्थित हैं। इतनी ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का दबाव कम हो जाता है। इसका असर शरीर पर पड़ता है और सामान्य काम करने में भी ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है। जवानों को लंबे समय तक ऐसे माहौल में रहकर निगरानी करनी होती है। सर्दियों में इन इलाकों में तापमान शून्य से 45 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा सकता है। ऊंचाई पर सर्दी के साथ के सूरज भी खतरा लाता है।
राज्य सभा टीवी की एक डाक्यूमेंट्री में एक ITBP के एक फौजी डॉक्टर ने कहा, ‘आज हम चुमर गाँव में आएँ हैं जिसकी हाईट लगभग 15 हजार फिट है। यहाँ डायरेक्ट सुर्य की रौशनी, कॉस्मिक रेज और अल्ट्रा वॉयल्ट रेज बहुत ज़्यादा परसेंट में है। इससे डायरेक्ट स्किन और चेहरे पर बहुत ज़्यादा इफ़ेक्ट होता है।’
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ऑक्सीजन की कमी से सेहत पर पड़ता है असर
ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी के कारण सिरदर्द, थकान, चक्कर आना और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ज्यादा ऊंचाई पर अचानक पहुंचने से तबीयत बिगड़ने का खतरा भी रहता है। हालाँकि जवानों के पास इससे बचने के उपकरण मौजूद हैं। जब भी किसी जवान को ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है उस जवान को एक प्रेशरराइज़ शूट में डाल दिया जाता है। इसमें हवा पर दबाव कम होता है जिससे वह बेहतर महसूस करता है। इसलिए जवानों को ऊंचाई के अनुकूल खुद को ढालने के लिए समय दिया जाता है। इसके साथ ही उन्हें शारीरिक रूप से तैयार रहने और मुश्किल परिस्थितियों में काम करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है।
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बर्फबारी और खराब मौसम में भी ड्यूटी
सीमा पर तैनात जवानों के लिए खराब मौसम एक बड़ी चुनौती है। बर्फबारी और तेज हवाओं के कारण रास्ते बंद हो सकते हैं। कई बार चौकियों तक पहुंचना और जरूरी सामान पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। पहाड़ी इलाकों में हिमस्खलन और भूस्खलन का खतरा भी बना रहता है। ऐसे मौक़े पर घोड़ों का सहारा लेना पड़ता है। घोड़े रसद और सामान ले जाते हैं। इन परिस्थितियों में जवानों को और अधिक सतर्क रहना पड़ता है और सीमा की निगरानी जारी रखनी होती है।
पर्वतारोहण और स्कीइंग की भी ट्रेनिंग
ITBP के जवानों को पहाड़ी इलाकों में काम करने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें पर्वतारोहण, स्कीइंग और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में काम करने की तैयारी शामिल है। इसका मकसद जवानों को ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार करना है, जहां सामान्य तरीके से काम करना संभव नहीं होता। सीमा की सुरक्षा के अलावा ITBP के जवान प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत और बचाव अभियान में भी हिस्सा लेते हैं। ऐसे में किसी भी आम बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स से ITBP के जवानों को अधिक मेहनत और समर्पण दिखाना होता है।
