देश में त्योहारों, छुट्टियों या किसी आपात स्थिति के दौरान हवाई टिकटों की कीमतें अचानक आसमान छूने लगती हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका में दावा किया गया कि कुछ मुख्य रूटों पर सामान्य दिनों के मुकाबले हवाई किराया दो से सात गुना (लगभग 700%) तक बढ़ गया है। हालांकि, कोर्ट ने इस पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया लेकिन इस मामले ने एक बार फिर देश में हवाई किराये के सरकारी नियंत्रण और डायनामिक प्राइसिंग की बहस को गर्म कर दिया है।

 

भारत में मार्च 1994 से 'एयर कॉर्पोरेशंस एक्ट' रद्द होने के बाद से एयरलाइंस को अपना किराया खुद तय करने की पूरी छूट है। कंपनियां 'डायनामिक प्राइसिंग' मॉडल पर काम करती हैं। इसका मतलब है जैसे-जैसे सीटें भरती हैं या यात्रा की तारीख करीब आती है टिकट महंगे होते चले जाते हैं। इसी के साथ जब यह किराया आम लोगों की पहुंच से बाहर होने लगता है, तब यह सवाल उठता है कि क्या सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए?

 

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सरकार पहले भी लगा चुकी है लगाम

यह कहना गलत होगा कि भारत सरकार के पास हवाई किराये पर नियंत्रण रखने का कोई अनुभव नहीं है। आपात स्थिति में सरकार ने पहले भी सख्त कदम उठाए हैं। अभी कोरोना काल (मई 2020 से अगस्त 2022) में कोविड महामारी के दौरान सरकार ने घरेलू उड़ानों की दूरी और समय के हिसाब से न्यूनतम और अधिकतम किराये की सीमा तय कर दी थी। न्यूनतम सीमा इसलिए रखी गई ताकि आर्थिक मंदी में एयरलाइंस खुद को नुकसान से बचा सकें और अधिकतम सीमा यात्रियों को लूट से बचाने के लिए थी।

 

इंडिगो संकट (दिसंबर 2025 – मार्च 2026) को हम कैसे भूल सकते हैं। दिसंबर 2025 में जब इंडिगो की उड़ानें बड़े पैमाने पर रद्द हुईं और यात्रियों पर आर्थिक दबाव बढ़ा तो सिविल एविएशन मंत्रालय ने तुरंत 6 दिसंबर 2025 को अस्थायी अधिकतम किराया सीमा लागू किया। इस सीमा को स्थिति सामान्य होने पर 23 मार्च 2026 को हटाया गया। ये दोनों उदाहरण साबित करते हैं कि संकट के समय सरकार के पास दखल देने का पूरा अधिकार है।

1 जनवरी 2027 से लागू होंगे नए नियम

भारत सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 को 'भारतीय वायुयान नियम, 2026' अधिसूचित किए हैं जो 1 जनवरी 2027 से पूरी तरह लागू होंगे। इसके नियम 192 के तहत:

  • एयरलाइंस को बेस फेयर, टैक्स, कैंसिलेशन चार्ज और अन्य शुल्कों की पूरी जानकारी बुकिंग के समय साफ-साफ देनी होगी।
  • कंपनियों को अपना किराया संरचना DGCA के पास जमा करना होगा। 
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को यदि लगता है कि कोई असाधारण स्थिति बनी है तो वह जनहित में एयरलाइंस को किराये से जुड़े लिखित निर्देश जारी कर सकती है।

दुनिया के बाकी देशों में क्या है व्यवस्था?

विदेशों में भी एयरलाइंस को किराया तय करने की आजादी है लेकिन वहां पारदर्शिता और उपभोक्ता अधिकारों पर बहुत सख्त नियम हैं। जैसे अमेरिका में 1978 के 'एयरलाइन डिरेगुलेशन एक्ट' के तहत वहां भी बाजार ही किराया तय करता है। लेकिन 'यूएस डिपार्टमेंट ऑफ ट्रांसपोर्टेशन' यह ध्यान रखता है कि एयरलाइंस किसी तरह का भ्रामक विज्ञापन न दें या एकाधिकार बनाकर लोगों को न ठगें।

 

यूरोपीय संघ (EU) में नियम 1008/2008 के तहत कंपनियों को किराया तय करने की छूट है। साथ ही बुकिंग के समय कुल अंतिम कीमत, अनिवार्य टैक्स, बैगेज चार्ज और एयरपोर्ट शुल्क छिपाना गैरकानूनी है। ब्रिटेन में वहां की 'सिविल एविएशन अथॉरिटी' (CAA) के पास उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और भ्रामक जानकारी देने वाली कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई करने के व्यापक अधिकार हैं।

भारत में अभी कैसे होती है निगरानी?

फिलहाल DGCA की टैरिफ मॉनिटरिंग यूनिट (TMU) देश के 78 मुख्य रूटों पर किरायों की रैंडम जांच करती है। हालांकि, इसका काम केवल यह देखना होता है कि एयरलाइन अपनी तय और घोषित किराया सीमा के भीतर ही टिकट बेच रही है या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को एक ऐसे स्वतंत्र 'एविएशन रेगुलेटर' की जरूरत है जो सुरक्षा देखने वाली संस्था और प्रतिस्पर्धा देखने वाली संस्था (CCI) से अलग होकर केवल यात्रियों के आर्थिक हितों और किराये में पारदर्शिता पर नजर रख सके।

 

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हवाई किराये पर स्थायी तौर पर कैप लगाने के फायदे और नुकसान दोनों हैं। फायदे के तौर पर देखे तो त्योहारों या संकट के समय यात्रियों की जेब पर डाका नहीं पड़ेगा। मरीजों, छात्रों और अचानक यात्रा करने वालों को बड़ी राहत मिलेगी। अगर नुकसान देखे तो यदि सरकार बहुत कम किराया तय कर देगी तो एयरलाइंस के लिए महंगे एविएशन फ्यूल और परिचालन खर्चों के बीच उड़ानें चलाना नुकसान का सौदा बन जाएगा। इससे कई रूटों पर उड़ानें बंद भी हो सकती हैं।

 

समाधान पूरे साल किराया बांधने में नहीं बल्कि एक संतुलित नीति में है। जहां सामान्य दिनों में बाजार को किराया तय करने दिया जाए लेकिन त्योहारों, प्राकृतिक आपदाओं या उड़ानों में गड़बड़ी के समय सरकार तुरंत हस्तक्षेप कर अधिकतम सीमा तय करें।