भारत में सौर ऊर्जा का विस्तार बीते एक दशक में बेहद तेजी से हुआ है। इसके साथ एक गंभीर चुनौती भी उभर रही है। वह यह कि सोलर पैनलों से निकलने वाले कचरे का क्या होगा? सरकार का अनुमान है कि 2030 तक मौजूदा और आने वाली सौर परियोजनाओं से करीब 600 किलो-टन कचरा जमा हो सकता है। 2047 तक इस्तेमाल के बाद बेकार हो चुके सौर पैनलों के कचरे से निपटने के लिए लगभग 299 रीसाइक्लिंग सुविधाओं की जरूरत होगी। ये सेंटर लगाए कहां जाएंगे, सरकार अब तक कोई जगह नहीं तय कर पाई है। 

 

बता दें कि साल 2014 में देश की सौर क्षमता लगभग 3 गीगावाट थी, जो अब जून 2026 तक बढ़कर 162.15 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है। सीधे तौर पर कहें तो बीते 10 साल में पचास गुना से भी ज्यादा की वृद्धि हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है, अगर आगे चलकर इस कचरे को ठीक तरह से रीसाइकिल नहीं किया गया, तो इसमें मौजूद सीसा-कैडमियम जैसी जहरीली धातुएं मिट्टी-पानी को दूषित कर पर्यावरण और सेहत, दोनों के लिए खतरा बन सकती हैं। पर्यावरणविद भी इसी बात को लेकर चिंता जता रहे हैं।

299 रीसाइक्लिंग प्लांट की जगह तय नहीं

मंत्रालय के साथ मिलकर ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) ने अनुमान लगाया है कि 2030 तक भारत में मौजूदा और प्रस्तावित सौर परियोजनाओं से करीब 600 किलो-टन कचरा जमा हो सकता है। 2047 तक इस्तेमाल के बाद बेकार हो चुके सौर पैनलों से सही तरीके से निपटने के लिए लगभग 299 रीसाइक्लिंग सुविधाओं की जरूरत होगी। इनमें से हर एक की सालाना क्षमता 3,600 टन होगी।  

 

लेकिन सरकार ने अभी तक यह नहीं सोचा या फाइनल नहीं किया है कि सौर पैनल के कचरे को रीसाइकिल करने वाले सेंटर देश में कहां-कहां बनाए जाएंगे। इसके लिए अभी तक कोई जमीन, कोई शहर, कोई राज्य चिन्हित नहीं हुआ है।

 

सौर पैनल के कचरे से कैसे निपटेगी सरकार? 

सरकार ने बताया कि पुराने सौर पैनलों को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने (रीसाइक्लिंग) के लिए कई कदम उठाए गए हैं। सोलर सहित 11 क्षेत्रों में कचरे को दोबारा इस्तेमाल में लाने का तरीका तैयार करने के लिए कुछ समितियां बनाई गई हैं। इसके अलावा, सरकार ने 2022 में एक नियम बनाया, जिसके तहत सोलर पैनल से निकलने वाला कचरा भी ई-कचरे में गिना जाता है। इसके लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी बनाया गया है, जहां पैनल बनाने वाली और रीसाइकिल करने वाली सभी कंपनियों को रजिस्टर करना जरूरी है।

 

साथ ही सोलर पैनल और बैटरी को रीसाइकिल करने के नए तरीके खोजने के लिए एक इनोवेशन चैलेंज यानी रिसर्च प्रतियोगिता शुरू की गई। नई तकनीक बनाने का काम शुरू किया। कॉलेजों और कंपनियों को साथ लाकर पुराने सोलर पैनलों को सस्ते और आसान तरीके से रीसाइकिल करने की तकनीक बनाने का काम शुरू किया गया है। खान मंत्रालय ने ₹1,500 करोड़ की एक योजना शुरू की है, ताकि पुराने कचरे जैसे बैटरी और गाड़ियों के पुर्जों से जरूरी धातुएं (मिनरल्स) दोबारा निकाली जा सकें।

 

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कमाई का भी जरिया बन सकती है रीसाइक्लिंग

सोलर पैनल के कचरे की रीसाइक्लिंग का फायदा केवल नेचर को नहीं होगा, बल्कि इससे कंपनियां और सरकार अच्छा मुनाफा कमा सकती हैं। सोलर पैनलों में कांच, एल्युमीनियम, तांबा, सिलिकॉन और चांदी जैसी कीमती चीजें होती हैं। इन्हें रीसाइकिल कर दोबारा नए पैनल बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे न केवल कच्चे माल के आयात पर निर्भरता  कम होगी, बल्कि रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री में नए रोजगार भी पैदा होंगे। 

 

यही वजह है कि सरकार ने खान मंत्रालय के जरिए 1,500 करोड़ की योजना शुरू की है, ताकि कचरे से जरूरी खनिज दोबारा हासिल किए जा सकें और स्वच्छ-ऊर्जा सप्लाई चेन मजबूत हो। 

 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही तरीके से रीसाइक्लिंग करने पर पैनल की करीब 38% सामग्री को फिर से नए पैनल बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन भी घट सकता है।