भारतीय रेलवे में आउटसोर्सिंग के जरिए काम करवाने का चलन बढ़ता जा रहा है, यानी कि ठेके पर कर्माचारियों की भर्ती करके भारतीय रेलवे अपना काम चला रहा है। दिनों-दिन आउटसोर्सिंग के जरिए रेलवे में भर्ती करके उनसे काम लिया जा रहा है, जबकि पहले रेलवे इस काम के लिए बकायदा सरकारी भर्ती करके लोगों को नौकरी पर रखता था। आउटसोर्सिंग होने वाले कर्मचारियों में IRCTC से लेकर रेलवे की सुरक्षा से संबंधित लोग शामिल हैं। रेलवे मंत्रालय यह काम तब कर रहा है जब रेलवे के विभिन्न विभागों में लाखों की तादाद में नौकरियों के पद खाली पड़े हुए हैं।

 

भारतीय रेलवे द्वारा लगातार आउटसोर्सिंग करके रेलवे के काम लेना और रिक्त पदों को नहीं भरने को लेकर यूनियनों में भारी नाराजगी है। साथ ही रेलवे के रिक्त पदों को नहीं भरने की वजह से सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवा भी परेशान हैं। दरअसल, रेलवे में आउटसोर्सिंग के खिलाफ ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (AIRF) और उत्तर रेलवे मेंस यूनियन (NRMU) खुलकर विरोध कर रही हैं। मगर, सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं है।

'खबरगांव' से क्या बोले उत्तर रेलवे मेंस यूनियन अध्यक्ष?

रेलवे में आउटसोर्सिंग के बढ़ते चलन को लेकर 'खबरगांव' से उत्तर रेलवे मेंस यूनियन के अध्यक्ष एस. के. त्यागी ने बात की। उन्होंने आउटसोर्सिंग से यात्रियों की जान पर संभावित खतरे और रेलवे में घटती पक्की नौकरियों पर चिंता जताई। उनका कहना है कि रेलवे ट्रैक की लंबाई लगातार बढ़ रही है और नई-नई लाइनें बिछाई जा रही हैं, नए स्टेशन बनाए जा रहे हैं, देश की जरूरत को देखते हुए रेल गाड़ियों की संख्या भी बढ़ रही है, स्पीड बढ़ रही है। लोकोमोटिव बढ़ रहे हैं, ट्रेनों में डब्बे बढ़ रहे हैं, वैगन बढ़ रहे हैं साथ में रेलवे का मॉडर्नाइजेशन भी हो रहा है। मगर उस अनुपात में लोगों की पक्की भर्ती नहीं की जा रही है।

 

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रेलवे पर लगातार बढ़ता लोड

एस. के. त्यागी ने कहा कि जहां पहले एक जमाने में तकरीबन 16 लाख कर्मचारी रेलवे में काम करते थे। उस समय गाड़ियों की संख्या भी आज से बहुत कम थी और रेलवे का जो ट्रैक था, वह करीब-करीब 65–66 हजार किलोमीटर हुआ करता था। आज की तारीख में रेलवे ट्रैक 71 हजार किलोमीटर से ऊपर पहुंच गया है। रेल गाड़ियां बढ़ गई हैं, 13 हजार पेयर से ज्यादा गाड़ियां रोजाना चल रही हैं, जो करीब 2.5 करोड़ यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढो रही हैं। इसी तरीके से मालगाड़ियां भी काफी बढ़ गई हैं।

 

 

उन्होंने कहा कि अब रेल गाड़ियां भी हाई-स्पीड, सेमी हाई-स्पीड ट्रेन भी आ गई हैं। इसमें वंदे भारत, अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें शामिल हैं। कुछ को छोड़कर सारे रूटों का इलेक्ट्रिफिकेशन भी किया जा रहा है। करीब-करीब 99% रूट इलेक्ट्रिफाई कर दिया गया है। इन सब चीजों के मेंटेनेंस के लिए लोगों की आवश्यकता तो पड़ेगी ना?

रेलवे पर सवालिया निशान

एस. के. त्यागी ने रेलवे पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि इतना काम बढ़ने के बावजूद उस हिसाब से लोगों की व्यवस्था नहीं हुई है। रेलवे में हमारे पास जो पहले मैनपावर थी, और स्वीकृत स्ट्रेंथ थी वह घट गई है। हर साल उसमें कटौती की जाती रही है। 16 लाख रेल कर्मचारियों की स्ट्रेन्थ घटते-घटते 12–12.5 लाख पर आ गई है। इसमें गजटेड ऑफिस भी शामिल हैं। 

बढ़ रहा काम, घट रही लोगों की संख्या

यूनियन के नेता ने आगे कहा कि एक तरफ भीरतीय रेलवे का काम तो बढ़ रहा है लेकिन आदमियों की संख्या घट रही है। ऐसे समय में जब लोगों की रेलवे को जरूरत है तो उनकी संख्या को लगातार घटाया जा रहा है... ऐसे में उसके बिना काम नहीं हो सकता। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि रेलवे ने ऐसा कुछ काम तो कर नहीं दिया है कि आदमियों की आवश्यकता खत्म हो गई हो। रेलवे ने भले ही कुछ ऑटोमेशन किया है लेकिन इससे रेलवे में मैनपावर की जरूरत कम नहीं हुई है। यहां लोगों की जरूरत है। 

 

रेलवे ने कैसे शुरू की आउटसोर्सिंग?

उन्होंने कहा, 'पहले जो गैर-मुख्य गतिविधियां थीं, उनमें रेलवे ने सबसे पहले आउटसोर्सिंग शुरू की। जैसे ऑन-बोर्ड सर्विसेज, ट्रेनों में बिस्तर बांटने वाले, कैटरिंग सर्विसेज में काम करने के लिए भी लोगों को आउटसोर्स किया गया। जबकि पहले इस काम को रेलवे के कर्मचारी ही करते थे। साफ-सफाई करने वालों को भी धीरे-धीरे आउटसोर्स किया। इसके बाद रेलवे की मेंटेनेंस में लोगों को आउटसोर्स किया जा रहा है। मेंटेनेंस के लिए वही आदमी सबसे अव्वल होता है, जिसके अंदर टेक्निकल स्किल होती है। जैसे रेलवे में वेल्डिंग करने के लिए काफी स्किल चाहिए होती है। इसके लिए स्किल्ड मैनपावर की आवश्यकता है। इसी तरीके से बहुत सारे मेंटेनेंस काम हैं, जहां ट्रेंड और जानकार लोगों की जरूरत है।'

 

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एस के त्यागी ने कहा कि आज रेलवे लोगों की भर्ती उस पैमाने पर नहीं कर रहा है, जितनी रेलवे के पास पद खाली पड़े हैं। रेलवे में तकरीबन 2.5 लाख पद खाली हैं। सरकार इनको नहीं भर रही है। सरकार भले ही हर साल नई भर्तियां कर रही है लेकिन हर साल उतनी ही भर्ती कर रही है, जितने लोग रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में खाली पड़े पदों को नहीं भरा जा रहा है। हर साल रेलवे का मैनपावर कम हो रहा है।

हर जगह आउटसोर्सिंग को घुसा रहा रेलवे

उन्होंने कहा, 'रेलवे धीरे-धीरे हर जगह आउटसोर्सिंग को घुसा रही है। यह आउटसोर्सिंग दो तरह से खतरनाक है। पहला आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के हितों पर ध्यान नहीं दिया जाता... ना तो उनको न्यूनतम मजदूरी मिलती है और ही सुविधाएं मिलतीं हैं। उनकी नौकरी भी सुरक्षित नहीं रहती, उनको ठेकेदार जब चाहे रखे, जब चाहे हटा दे। दूसरा, आउटसोर्सिंग कर्मचारी उस लगन से रेलवे के लिए काम नहीं करता। जो कर्मचारी पक्की नौकरी में आता है वह सालों तक अपनी जवाबदेही के साथ में रेलवे के लिए काम करता रहता है।'

आउटसोर्सिंग कर्मचारियों से 50 फीसदी काम ले रहा रेलवे

रेलवे यूनियन के नेता ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि रेलवे इस समय कई जगहों पर 50 फीसदी आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के जरिए अपना काम करवा रहा है। यह चलन काफी गंभीर है। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि रेलवे मेंस यूनियन ने 8-10 अक्तूबर को लोगों को बुलाकर रेलवे में हो रही आउटसोर्सिंग के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि रेलवे में बेतहाशा आउटसोर्सिंग करना बहुत खतरनाक है। रेलवे 24 घंटे चलने वाली मशीन है, इतनी स्पीड पे गाड़ियां चल रही हैं, राउंड द क्लॉक चलती हैं, हर मौसम में चलती हैं। और अगर कहीं जरा सी गलती होती है तो भविष्य में बड़ी दुर्घटना हो सकती है। ऐसे में रेलवे की बदनामी होगी।

 

उन्होंने कहा कि इसलिए हम लोगों ने मांग की है कि रेलवे में पक्की सरकारी वाले लोगों को ही लाया जाए। आउटसोर्सिंग की बजाय पहली प्राथमिकता उनको दी जाए जिन लोगों ने रेलवे में अप्रेंटिसशिप की ट्रेनिंग की है। अप्रेंटिसशिप करने वाले लोग बाहर घूम रहे हैं।