एक तरफ विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर गया है। वहीं, दूसरी तरफ SIR के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने वोटर लिस्ट में नए वोटरों के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के बीच चल रही बहस में यह टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने नए फॉर्म-6 की वैधता पर न तो कोई फैसला दिया है और न ही इसे मंजूरी या नामंजूरी दी है। 

 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच इस मामले की सुनावाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, 'अदालत की टिप्पणियों को संवैधानिक न्यायिक निर्णय नहीं माना जा सकता। नए फॉर्म-6 पर कोई फैसला नहीं हुआ है। हमारे मुंह में शब्द न डालें।' इस बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। इस मामले में अब 27 अक्टूबर को सुनवाई होगी।

 

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क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह विवाद चुनाव आयोग की ओर से 26 सितंबर को जारी एक प्रेस नोट के बाद तेज हुआ था। आयोग ने कहा था कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणा-पत्र को बरकरार रखा था। इसके बाद फॉर्म में किए गए बदलावों की वैधता पर सवाल उठने लगे। 

 

5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि उसने फॉर्म-6 में किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है और यह पता लगाने के लिए रिकॉर्ड मांगे थे कि बदलाव किसने और किस आधार पर किए। 12 अक्टूबर को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी पिछली टिप्पणी का अर्थ सिर्फ इतना था कि बिहार SIR पर फैसला सुनाते समय नया फॉर्म-6 अस्तित्व में ही नहीं था। इसलिए उस फैसले को नए फॉर्म की मंजूरी या ना मंजूरी नहीं माना जा सकता।

फॉर्म-6 को लेकर विवाद समझिए

फॉर्म-6 वह फॉर्म है जिसके जरिए वोटर लिस्ट में नए मतदाताओं को जोड़ा जाता है। विवाद की जड़ इसी फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया एक घोषणा पत्र है। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इसी घोषणा पत्र को लेकर एक टिप्पणी की थी। इस फॉर्म में नए वोटर को रजिस्ट्रेश कराने के समय से यह बताने को कहा गया कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। इस अतिरिक्त फॉर्म को लेकर ही पूरा विवाद हो रहा है और चुनाव आयोग पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने बिना निर्धारित नियमों का पालन किए यह बदलाव किया है। 

 

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चुनाव आयोग में मतभेद

एक तरफ विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने संसद की मंजूरी के बिना ही फॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ दिया। वहीं, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुद्दे पर चुनाव आयोग के अंदर भी मतभेद थे। बताया गया है कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि फॉर्म-6 के नियम पहले से तय हैं, इसलिए उसमें बदलाव करने के लिए तय कानूनी प्रक्रिया अपनानी जरूरी है। सिर्फ ऑनलाइन फॉर्म में नई शर्त जोड़कर नियम नहीं बदले जा सकते। 

 

दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि उसने मूल फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया, बल्कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा था। अब सुप्रीम कोर्ट यह जांच करेगा कि चुनाव आयोग को ऐसा करने का कानूनी अधिकार था या नहीं। इस मामले पर अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।