बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के खिलाफ देशभर के छात्र संगठनों में गुस्सा है। NALSAR यूनिवर्सिटी के प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ BCI का सर्कुलर सामने आने के बाद हर कोई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा का इस्तीफा मांग कर रहा है। गलती इतनी बड़ी है कि अब वह खुद सामने आकर कह रहे हैं कि यह फैसला, BCI ने जल्दबाजी में लिया था, गलती हुई है।
बार काउसिल ऑफ इंडिया ने गुरुवार को अपना एक सर्कुलर वापस लिया था। सर्कुलर में नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) के हैदराबाद लॉ कॉलेज 2026 बैच को नामांकन से रोकने की बात कही गई थी। आदेश में था कि ये छात्र, वकील के तौर पर खुद को नामांकित नहीं कर सकते।
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BCI ने कौन सी आफत मोल ले ली है?
कुछ देर बाद ही BCI ने एक और आदेश जारी किया और राज्य के विधिक परिषदों को आदेश दिया कि इन छात्रों को नामांकन से रोका जाए। छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह में शामिल होने का बहिष्कार किया था और आंदोलन किया था।
BCI का बदलता रुख क्या है?
यह फैसला जल्दबाजी में हुआ था। परिषद ने चर्चा के बाद आदेश बदलने का फैसला किया। हम बार और छात्रों के बीच कोई तनाव नहीं चाहते हैं। परिषद को एहसास हुआ है कि यह फैसला छात्रों और बार के बीच विवाद की वजह बन सकता है। इस फैसले को 40 मिनट में ही वापस ले लिया गया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया इतनी ताकतवर संस्था है कि यह किसी लॉ ग्रेजुएट को नामांकन से रोक दे, क्या इस संस्था के अधिकार हैं, पहले इस कौन से विवाद सुर्खियों में रहे हैं, आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब-
बार काउंसिल ऑफ इंडिया क्या है?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भारतीय विधिक परिषद के नाम से भी जाना जाता है। यह संसदीय संस्था है, जिसका काम भारतीय बार का प्रतिनिधित्व करना है। यह वकीलों की सर्वोच्च संस्था है। यह संस्था, वकीलों के काम-काज का तरीका, विधिक आचरण और वकालत के तरीके तय करती है। BCI कानून के छात्रों को डिग्री के बाद अधिवक्ता के तौर पर नामांकित कराती है। अधिवक्ताओं के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए काम करती है, उनहें वित्तीय सहायता देती है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना, संसद की ओर से 'एडवोकेट एक्ट, 1961' के तहत हुई थी।
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BCI के अधिकार और काम क्या-क्या हैं?
'एडवोकेट एक्ट, 1961' की धारा 7 के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया को कुछ अधिकार मिले है। इन अधिकारों में क्या-क्या है, आइए जानते हैं-
- अधिवक्ताओं के लिए वकालत करने और व्यवहार से जुड़े नियम तय करना
- राज्य बार काउंसिल को अपने अनुशासनात्मक समितियों की ओर से तय प्रक्रिया मानने का आदेश देना
- अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा करना
- कानून सुधार को बढ़ावा देना और उन्हें बढ़ावा देना
- राज्य बार कांउसिल की ओर से संदर्भित किसी मामले से निपटना
- कानून की पढ़ाई को बढ़ावा देना, शिक्षा के नियम तय करना
- कानून की पढ़ाई कराने वाले विश्वविद्यालयों को मान्यता देना
- कानून पर सेमिनार और व्याख्यान आयोजित करना और रिसर्च प्रकाशित करना
- गरीबों को कानूनी सहायता देना
- भारत में अधिवक्ता के तौर पर प्रैक्टिस करने के लिए मान्यता देना
- बार काउंसिल का फंड प्रबंधन, निवेश और संचालन के लिए चुनाव कराना
- अगर बार काउंसिल को लगता है कि किसी वकील ने प्रोफेशनल मिसकंडक्ट किया है तो BCI उनका लाइसेंस रद्द कर सकती है
BCI के विवाद क्या रहे हैं?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़ा यह पहला विवाद नहीं है। पहले भी कई ऐसे फैसले रहे हैं जो सुर्खियों में रहे हैं।
NALSAR विवाद, मनन कुमार मिश्रा ने गलती कर दी है?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 के बैच के छात्रों को अधिवक्ता के तौर पर नामांकित होने रोकने का एक फैसला दिया। छात्रों का एक समूह CJP सूर्यकांत के चीफ गेस्ट बनकर दीक्षातं समारोह में आने का विरोध कर रहा था। CJI सूर्यकांत अपने 'कॉकरोच' वाले बयान की वजह से देशभर के छात्रों के निशाने पर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस फैसले पर नाराजगी जताई और CJI ने कहा कि यह छात्रों और उनकी बात थी, इसमें BCI को दखल देने की जरूरत क्या थी।
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जब वकालत की पढ़ाई पर उम्र को लेकर हुआ हंगामा
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने साल 2016 में कानून की पढ़ाई के लिए अधितकम आयु सीमा तय की थी। अदालत में विवाद चला तो यह नियम हटाना पड़ा। पहले BCI ने 3 साल की LLB के लिए 30 साल और 5 साल की BALLB के लिए 20 साल की सीमा तय की थी। विवाद के बाद इसे हटा लिया गया। लोगों का कहना था कि किसी की कानून की पढ़ाई से कैसे रोका जा सकता है।
विदेशी लॉ फर्मों को लेकर जब भड़का हंगामा
BCI ने विदेशी वकीलों और लॉ फर्मों को भारत में रजिस्ट्रेशन और काम करने की सीमित इजाजत दी, जिसे लेकर हंगामा हुआ। लोगों का कहना है कि विदशी वकीलों के लिए यहां काम करना मुश्किल हुआ है। यह भी कहा गया कि इससे एडवोकेट्स एक्ट के नियमों को ताक पर रखकर, बिना पक्षकारों के साथ परामर्श के तैयार किया गया।
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फीस को लेकर भी उठते रहे हैं सवाल
ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) की फीस BCI ने महंगी ही रखी है। 3000 से ज्यादा है। AIBE परीक्षा के लिए ली जाने वाली फीस को लेकर एक बड़े वर्ग का कहना है कि नए वकील, जो अभी खुद इंटर्न हैं, उनके लिए यह रकम जुटानी मुश्किल है।
हड़ताल को लेकर BCI के रुख पर उठते हैं सवाल
BCI वकीलों को अदालती कार्यवाही के दौरान हड़ताल करने से मना करती है। वकील, हड़ताल को अपनी बात मनवाने का अधिकार मानते हैं। अलग-अलग बार एसोसिशिएशन का दावा है कि इससे वकील कमजोर पड़ जाएंगे। वकील, हड़ताल को विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं।
