हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड समेत कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। शिमला जिले के रामपुर बुशहर की मशनू पंचायत में 20 सितंबर को 64 वर्षीय नरम लाल हस्टा पर बगीचे में भालू ने अचानक हमला कर दिया। वह भेड़-बकरियों के लिए घास लेने गए थे। हमले में उनके सिर, मुंह और टांगों पर गंभीर चोटें आईं। ऐसा ही एक मामला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से सामने आया है जहां घास काटने गई एक महिला पर भालू ने हमला कर दिया। हमले में भालू ने महिला का पैर चबा दिया। इन मामलों ने एक बार फिर जंगली जानवरों 

 

शिमला में हुई घटना के बाद ग्रामीणों ने भालू को पकड़ने, निगरानी बढ़ाने और घायल व्यक्ति को मुआवजा देने की मांग की। वन विभाग ने भी नियमानुसार राहत देने की बात कही है। हालांकि, यह कोई एक मामला नहीं है हिमाचल के पहाड़ी इलाकों में इस तरह के हमले काफी आम हो गए हैं। पालतू पशुओं को तो जंगली जानवर आसानी से शिकार बना लेते हैं जिससे लोगों को काफी ज्यादा आर्थिक नुकसान भी होता है। इन घटनाओं से सवाल उठता है कि अगर जंगली जानवर किसी व्यक्ति को घायल कर दे, मौत हो जाए या पशुधन को नुकसान पहुंचे तो पीड़ित परिवार को सरकार से कितनी आर्थिक सहायता मिल सकती है। 

 

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हिमाचल में कितना मुआवजा मिलता है?

हिमाचल प्रदेश वन विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जंगली जानवरों से मानव जीवन और घरेलू पशुधन को हुए नुकसान के लिए राहत दरें तय हैं। अगर किसी इंसान की मौत होती है तो 4 लाख रुपये, स्थायी अपंगता पर 2 लाख रुपये, गंभीर चोट या आंशिक अपंगता पर 75 हजार रुपये और साधारण चोट पर वास्तविक इलाज खर्च देने का प्रावधान है।

पशुधन के मामले में घोड़ा, खच्चर, भैंस, बैल, याक और ऊंट की मौत पर 30 हजार रुपये, जर्सी एवं क्रॉसब्रीड गाय पर 15 हजार रुपये, स्थानीय नस्ल की गाय, गधा और पश्मीना बकरी पर 6 हजार रुपये, जबकि भेड़, बकरी और सूअर पर 3 हजार रुपये तक राहत का प्रावधान है। छोटे पशु-बच्चों के लिए भी अलग दर निर्धारित है।

मुआवजा लेने की प्रक्रिया क्या है?

वन विभाग के अनुसार, पशुधन के नुकसान की स्थिति में पीड़ित को संबंधित डीएफओ यानी डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर के पास दावा करना होता है। आवेदन संबंधित बीट गार्ड या रेंज ऑफिसर के माध्यम से भी भेजा जा सकता है। नुकसान होने पर व्यक्ति विभाग की वेबसाइट पर मौजूद फॉर्म डाउनलोड कर उसे भरकर जमा करवा सकता है। इसमें घटना की तारीख, समय और स्थान, जंगली जानवर का विवरण, चोट की जानकारी, मृत व्यक्ति की स्थिति तथा पशुधन के नुकसान जैसी जानकारी मांगी जाती है। अगर किसी व्यक्ति की मौत का मामला है तो इस संबंध में पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चोट के मामले में मेडिकल सर्टिफिकेट जरूरी होता है। 

 

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किन राज्यों में मुआवजा मिलता है?

देश में वन्यजीवों से होने वाले नुकसान के लिए एक समान राष्ट्रीय मुआवजा दर नहीं है। केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रबंधन मुख्य रूप से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है और राज्यों में मानव जीवन, चोट, पशुधन और फसल नुकसान के लिए राहत के नियम अलग-अलग हो सकते हैं। ज्यादातर राज्यों में वन्यजीवों की वजह से होने वाले नुकसान के बदले मुआवजा देना राज्य सरकार की जिम्मेदारी होती है। इसके साथ ही केंद्र सरकार भी कई योजनाओं के तहत वन्यजीवों से होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश करती है या मुआवजा देती है।