साल 2022 में उत्तर प्रदेश की कुंडा विधानसभा सीट का चुनाव बेहद रोमांचक हो गया था। समाजवादी पार्टी (एसपी) के मुखिया अखिलेश यादव ने विधायक राजा भैया का नाम लिए बिना ही कहा था कि कुंडा में कुंडी लग जाएगी। रोचक बात है कि यही राजा भैया तब मंत्री हुआ करते थे जब अखिलेश यादव सीएम रहे। अब पांच साल बाद अखिलेश यादव कुंडा के लिए विशेष किलेबंदी कर रहे हैं। इसका असर यह हुआ है कि अब राजा भैया ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से करीबी बढ़ा दी है। सोमवार को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी जब राजा भैया से मिलने उनके घर पहुंचे और सुगबुगाहट और तेज हो गई। अब चर्चा है कि राजा भैया की पार्टी यानी जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) का बीजेपी से गठबंधन भी हो सकता है। माना जा रहा है कि ये कोशिशें अखिलेश यादव की ओर से प्रतापगढ़ में किए गए खेल के बाद शुरू हुई हैं।
कुंडा में साल 1993 से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ही चुनाव जीतते आ रहे हैं। 2022 तक निर्दलीय विधायक रहे राजा भैया 2022 में अपने जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के टिकट पर चुनाव जीते। तीन चुनाव के बाद 2022 में ऐसा हुआ कि समाजवादी पार्टी ने भी राजा भैया के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा जबकि अब तक वह सपा के समर्थन से ही चुनाव लड़ते आ रहे थे। 2022 में काफी रोमांचक लड़ाई रही और पिछले चुनाव में 1 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीतने वाले राजा भैया सिर्फ 30,315 वोटों के अंतर से चुनाव जीते। तब से ही चर्चा शुरू हो गई थी कि अब राजा भैया को भी नए सिरे से सोचना होगा।
मजबूरी हो गया है गठबंधन?
बीजेपी 1991 के बाद से अभी तक कुंडा विधानसभा सीट पर चुनाव नहीं जीत पाई है। बाबागंज विधानसभा सीट पर उसे कभी जीत नहीं मिली है। दूसरी तरफ राजा भैया भी 10 साल से सत्ता से दूर हैं और अब उन्हें भी अपने गढ़ में चुनौती मिलने लगी है। ऐसे में माना जा रहा है कि यह गठबंधन जरूरत के साथ-साथ मजबूरी भी बन गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राजा भैया की मौन समर्थन से ही सपा ने प्रतापगढ़ और कौशांबी दोनों ही लोकसभी सीटें जीत लीं। ऐसे में अब बीजेपी रिस्क नहीं लेना चाहती और किसी भी तरह से राजा भैया को अपने पाले में करना चाहती है।
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इसका एक कारण 2022 में कुछ सीटों पर जनसत्ता दल का चुनाव लड़ना भी था। उदाहरण के लिए गौरीगंज विधानसभा सीट पर बीजेपी सिर्फ 6963 वोटों से चुनाव हारी थी और जनसत्ता दल के उम्मीदवार चौधरी नफीस अहमद को 7056 वोट मिले थे। कुछ अन्य सीटें भी ऐसी थीं जहां राजा भैया ने अपने उम्मीदवार उतारे थे और वहां बीजेपी की हार हुई थी।
अखिलेश यादव ने कर डाली किलेबंदी
हाल ही में तीन ऐसे नेता सपा में शामिल हुए हैं जो भले ही अब कमजोर हो गए हों लेकिन संदेश देने की राजनीति में इसे अहम माना जा रहा है। पहले नेता हैं योगेंद्र नाथ मिश्रा उर्फ मौला महाराज। वह साल 2002 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर तब राजा भैया के खिलाफ चुनाव लड़े थे जब सपा ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था। वह 2007 में प्रयागराज की फाफामऊ विधानसभा (तब नवाबगंज) सीट पर बीजेपी के टिकट पर भी चुनाव लड़ चुके हैं। माना जा रहा है कि उनके आने से कुछ न कुछ ब्राह्मण मतदाता जरूर सपा के साथ जुड़ेंगे। वह लंबे समय तक बीजेपी में रहे हैं जिला उपाध्यक्ष जैसे पद पर भी रहे। अब वह सपा में शामिल हो गए हैं।
दूसरे नेता हैं केशव पासी। बता दें कि 2022 के परिसीमन के बाद बाबागंज नाम से अस्तित्व में आई इस सीट पर लगातार तीन बार राजा भैया समर्थित विनोद सरोज चुनाव जीत रहे हैं। 2022 में जनसत्ता दल के टिकट पर जीते दूसरे विधायक वही थी। इससे पहले जब इसी विधानसभा क्षेत्र का नाम बिहार था तब भी विनोद सरोज एक बार चुनाव जीत चुके थे। विनोद सरोज के पिता रामनाथ सरोज भी बिहार विधानसभा सीट पर दो बार चुनाव जीते थे।
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बता दें कि केशव पासी इसी बाबागंज सीट पर साल 2022 में बीजेपी के प्रत्याशी थे। तब उन्हें 30,391 वोट मिले थे। रोचक बात है कि उस चुनाव में सपा दूसरे नंबर पर थी और सपा के गिरीश पासी को 51,515 वोट मिले थे। विनोद सरोज को 67,282 वोट मिले थे और वह 15,767 वोटों के अंतर से चुनाव जीते थे। 2017 में जब सपा साथ थी तब यही विनोद सरोज 37,160 वोटों के अंतर से चुनाव जीते थे।
शैलेंद्र कुमार ने भी बदला पाला
सपा के समर्थकों में रहे राजा भैया ने जब अपनी पार्टी बनाई और सपा से दूरी बनाई तब शैलेंद्र कुमार उनके साथ चले गए थे। अब वही शैलेंद्र कुमार सपा में शामिल हो गए हैं। इससे पहले यही शैलेंद्र कुमार 2009 में कौशांबी लोकसभा सीट पर सपा के सांसद चुने गए थे। 2004 और 1998 में वह चायल नाम की लोकसभा सीट से सपा के सांसद चुने गए थे। बाद में यही चायल लोकसभा सीट कौशांबी बन गई। रोचक बात है कि जहां राजा भैया और विनोद सरोज निर्दलीय चुने जाते थे वहीं शैलेंद्र कुमार सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीतते थे।
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जनसत्ता दल लोकतांत्रिक बनने के बाद राजा भैया ने शैलेंद्र कुमार को 2019 में लोकसभा का चुनाव लड़ाया। वह तीसरे नंबर पर रहे और बीजेपी के विनोद सोनकर लगातार दूसरी बार चुनाव जीत गए। 2014 में यही शैलेंद्र कुमार सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर दूसरे नंबर पर रहे थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में राजा भैया की पार्टी ने कौशांबी सीट पर प्रत्याशी ना उतारकर सपा के पुष्पेंद्र सरोज का समर्थन कर दिया था। तब पुष्पेंद्र सरोज चुनाव जीत गए और शैलेंद्र कुमार खाली हाथ रह गए। अब माना जा रहा है कि वह कौशांबी या प्रयागराज की किसी आरक्षित सीट पर सपा के उम्मीदवार हो सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि वह बाबागंज सीट पर अपने ही पुराने साथी विनोद सोनकर से दो-दो हाथ करते नजर आएं।
2022 में क्या हुआ था?
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार राजा भैया किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने उतरे थे। पार्टी उनकी खुद की बनाई हुई यानी जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) थी। पार्टी लगभग एक दर्जन उम्मीदवार उतारे थे लेकिन सबकी नजर कुंडा पर ही थी। अब तक नाम के विपक्ष से लड़ते आ रहे राजा भैया को इस बार उनका ही समर्थन करती आ रही सपा से मुकाबला करना था। सपा ने एक और दांव खेला और कभी राजा भैया के बेहद करीबियों में शामिल रहे गुलशन यादव को टिकट दिया। तमाम आरोपों में बार-बार जेल के अंदर बाहर होते रहे गुलशन यादव ने राजा भैया को जबरदस्त चुनौती दी।
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अखिलेश यादव के 'कुंडा में कुंडी लगा दो' वाले बयान ने आग में घी का काम किया। राजा भैया ने इस बयान का जबरदस्त विरोध जताया तो मामला हाई वोल्टेज हो गया। कुंडा में बहुत सारे लोगों ने चुपके से ही सही लेकिन सपा का समर्थन किया। इसका असर चुनाव नतीजों में दिखा। जब वोटों की गिनती हुई तब यह दिखा कि राजा भैया को 2017 की तुलना में कम वोट मिले। 2017 में 1.36 लाख वोट पाकर 1.03 लाख वोटों के अंतर से जीतने वाले राजा भैया को इस बार पूरे एक लाख वोट ही नहीं मिले। वह 99,612 वोट पाकर विजेता तो रहे लेकिन उनकी जीत का अंतर 30,315 पर आ गया। 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 यानी कि कुल पांच चुनाव में यह उनकी जीत का सबसे कम अंतर था। वहीं, गुलशन यादव ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और 69,297 वोट हासिल किए। गुलशन की तुलना में बीजेपी की उम्मीदवार सिंधुजा मिश्रा सेनानी को 16,455 वोट और बसपा के मोहम्मद फहीम को सिर्फ 3345 वोट ही मिले।
अब बीजेपी की जरूरत है कि वह कुछ सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए एक मजबूत साथी जोड़ ले और कुंडा-बाबागंज में बिना मुकाबले के ही दो सीटें बढ़ाने पर ध्यान दे। वहीं, राजा भैया की जरूरत है कि वह दोनों ही विधानसभा सीटों पर संभावित त्रिकोणीय चुनाव को खत्म करके सपा से सीधा मुकाबला करें और अपनी स्थिति मजबूत रखें। इसी क्रम में वह खुद अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं, उनके दोनों बेटे लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं और अगले महीने वह धीरेंद्र शास्त्री की कथा भी करवा रहे हैं ताकि लोगों को अपने साथ जोड़े रखें और चुनाव में भी इसका लाभ ले सकें।
