उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आजाद, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की एक साथ मौजूदगी सबको खटक रही है।

 

चंद्रशेखर आजाद ने कुछ दिनों पहले ही राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य से मुलाकात ने तीसरे मोर्चे की अटकलों को नई हवा दे दी है। अभी किसी औपचारिक गठबंधन का ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन इन राजनीतिक गतिविधियों ने भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

क्या तीसरे मोर्चे की नींव रखी जा रही है?

दिल्ली के साझा मंच और उससे पहले हुई राजनीतिक मुलाकातों के बाद यह चर्चा तेज है कि क्या 2027 से पहले सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दल एक मंच पर आने की कोशिश कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर सीधा मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय बन सकता है।

इन वोटों पर है सबसे बड़ी नजर

संभावित समीकरण का सबसे बड़ा आधार दलित, मुस्लिम और गैर-यादव पिछड़ा वर्ग हो सकता है। उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत, मुस्लिम करीब 19 प्रतिशत और गैर-यादव ओबीसी एक बड़ा सामाजिक समूह माने जाते हैं। इसी वर्ग में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, निषाद, पाल, कश्यप, लोध और कई अन्य समुदाय आते हैं। 

चंद्रशेखर आजाद का प्रभाव दलित युवाओं, खासकर जाटव समाज में माना जाता है। स्वामी प्रसाद मौर्य लंबे समय से गैर-यादव पिछड़े वर्ग की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं, जबकि ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से में पहचान रखते हैं। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय चेहरा हैं।

 

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किन इलाकों में पड़ सकता है असर?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, अवध और पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर दलित, मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी मतदाता चुनावी परिणाम प्रभावित करने की स्थिति में हैं। यदि इन वर्गों का कुछ हिस्सा किसी नए राजनीतिक मंच की ओर जाता है तो कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बदल सकता है।

BJP और SP की चुनौती क्यों बढ़ सकती है?

भाजपा ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्ग में मजबूत आधार बनाया है। वहीं समाजवादी पार्टी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति के जरिए इन्हीं वर्गों को अपने साथ जोड़ने में लगी है। ऐसे में यदि तीसरा विकल्प इन्हीं सामाजिक समूहों में प्रभाव बनाता है तो दोनों दलों के लिए चुनावी रणनीति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। हालांकि इसका वास्तविक असर तभी सामने आएगा जब किसी औपचारिक गठबंधन और सीट बंटवारे की घोषणा होगी।

 

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फिलहाल संकेत ज्यादा, ऐलान नहीं

अभी तक आजाद समाज पार्टी (कांशीराम), एआईएमआईएम, राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच किसी चुनावी गठबंधन की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन लगातार बढ़ती राजनीतिक नजदीकियां, साझा मंच और मुलाकातें यह जरूर संकेत दे रही हैं कि 2027 से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावनाओं पर सभी दलों की नजर टिकी हुई है। यदि यह राजनीतिक केमिस्ट्री चुनावी गठबंधन में बदलती है तो उत्तर प्रदेश का चुनावी मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प हो सकता है।