उत्तर प्रदेश में यूपी विधानसभा 2027 के चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। बीजेपी के सामने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य है, लेकिन प्रदेश की कुछ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पार्टी के लिए जीत की राह आसान नहीं है। इन सीटों पर दशकों से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और स्थानीय राजनीतिक दिग्गजों का प्रभाव कायम है। कहीं एक ही परिवार का राजनीतिक दबदबा रहा है, तो कहीं किसी नेता की लगातार जीत ने सीट को उसका मजबूत गढ़ बना दिया है।

प्रदेश की 10 विधानसभा सीटें बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही हैं। इनमें प्रतापगढ़ की रामपुर खास, कुंडा और बाबागंज, इटावा की जसवंतनगर, जौनपुर की मल्हनी, बलिया की रसड़ा, रायबरेली की ऊंचाहार, कानपुर की सीसामऊ और आजमगढ़ की गोपालपुर व लालगंज शामिल हैं। इन सीटों पर चुनावी इतिहास बताता है कि बीजेपी को केवल प्रदेश स्तर की राजनीतिक रणनीति के भरोसे नहीं, बल्कि स्थानीय समीकरणों और मजबूत संगठन के दम पर मुकाबला करना होगा।

 

प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास, कुंडा और बाबागंज विधानसभा सीटें बीजेपी के लिए मुश्किल चुनावी मैदान रही हैं। तीनों सीटों पर अलग-अलग राजनीतिक ताकतों का प्रभाव देखने को मिलता है। रामपुर खास विधानसभा सीट पर 1980 से कांग्रेस का दबदबा कायम है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने 1980 से 2012 तक लगातार नौ विधानसभा चुनाव जीतकर इस सीट को अपना मजबूत राजनीतिक गढ़ बनाया।

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वर्ष 2014 में प्रमोद तिवारी के राज्यसभा जाने के बाद उनकी बेटी आराधना मिश्रा मोना ने उपचुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने जीत हासिल की।इस तरह रामपुर खास में प्रमोद तिवारी से लेकर आराधना मिश्रा मोना तक कांग्रेस की जीत का सिलसिला कायम रहा है। 2022 के चुनाव में आराधना मिश्रा ने बीजेपी प्रत्याशी नागेश प्रताप सिंह को पराजित किया था। इस सीट पर कांग्रेस के मजबूत संगठन और तिवारी परिवार के प्रभाव को चुनौती देना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा।

 

कुंडा: 1993 से राजा भैया की लगातार जीत

प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा सीट पर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का लंबे समय से राजनीतिक दबदबा है। वर्ष 1993 से लेकर 2022 तक हुए सभी सात विधानसभा चुनावों में राजा भैया ने जीत दर्ज की है। शुरुआती चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरने वाले राजा भैया ने 2018 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक का गठन किया।

2022 में इसी पार्टी के टिकट पर उन्होंने जीत हासिल की।2022 के चुनाव में राजा भैया को 99,612 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के गुलशन यादव को 69,297 वोट हासिल हुए। बीजेपी प्रत्याशी सिंधुजा मिश्रा सेनानी को 16,455 वोट मिले। राजा भैया ने 30,315 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। कुंडा में राजा भैया की व्यक्तिगत पकड़ और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

 

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बाबागंज: जनसत्ता दल का प्रभाव

प्रतापगढ़ की बाबागंज विधानसभा सीट भी बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण रही है। वर्ष 2012 में अस्तित्व में आई इस सीट पर पिछले तीन विधानसभा चुनावों में जनसत्ता दल या उससे जुड़े प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है। विनोद कुमार सरोज यहां के प्रमुख राजनीतिक चेहरे हैं। लगातार चुनावी सफलता के कारण बाबागंज में जनसत्ता दल का प्रभाव मजबूत बना हुआ है। 2027 में बीजेपी को इस सीट पर अपनी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी होगी।

जसवंतनगर में यादव परिवार का दबदबा

इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट पर मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार का लंबे समय से प्रभाव रहा है। वर्ष 1967 में मुलायम सिंह यादव पहली बार इस सीट से विधायक बने थे। इसके बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर उन्होंने यहां अपनी पकड़ बनाए रखी।1996 में शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर इस सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।

इसके बाद 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी शिवपाल सिंह यादव लगातार विजयी रहे।2022 के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने बीजेपी के विवेक शाक्य को 90,979 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। जसवंतनगर में सपा की मजबूत संगठनात्मक पकड़ और यादव परिवार की राजनीतिक विरासत बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती है।

मल्हनी में सपा की पकड़

जौनपुर की मल्हनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी का प्रभाव रहा है। वर्ष 2012 के चुनाव में पारसनाथ यादव ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। 2017 में भी पारसनाथ यादव विजयी रहे। उनके निधन के बाद 2020 के उपचुनाव में लकी यादव ने जीत हासिल की। 2022 में भी लकी यादव ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर सीट बरकरार रखी। लगातार चुनावी सफलता ने मल्हनी में समाजवादी पार्टी का आधार मजबूत किया है। बीजेपी को यहां स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी होगी।

रसड़ा में बीएसपी का मजबूत आधार

बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव लंबे समय से रहा है। वर्ष 1993 में पहली बार बीएसपी ने इस सीट पर जीत हासिल की। 1996 में बीजेपी ने यहां जीत दर्ज की, लेकिन इसके बाद 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी ने लगातार जीत हासिल की।

 

इस सीट पर बीजेपी की आखिरी जीत 1996 में हुई थी। इसके बाद पार्टी को लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। रसड़ा में बीएसपी के मजबूत आधार को देखते हुए बीजेपी को अपने सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक रणनीति पर विशेष ध्यान देना होगा।

ऊंचाहार में लगातार सपा की जीत

रायबरेली जिले की ऊंचाहार विधानसभा सीट वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी। यहां पहला विधानसभा चुनाव 2012 में हुआ। अब तक इस सीट पर 2012, 2017 और 2022 में तीन विधानसभा चुनाव हुए हैं और तीनों बार समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की है।मनोज कुमार पांडेय इस सीट से लगातार तीन चुनाव जीत चुके हैं। उनके बीजेपी में आने के बाद पार्टी को यहां नए राजनीतिक समीकरण बनने की उम्मीद है। हालांकि सीट पर समाजवादी पार्टी के प्रभाव को देखते हुए बीजेपी के सामने संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है।

सीसामऊ में बीजेपी को जीत का इंतजार

कानपुर की सीसामऊ विधानसभा सीट पर बीजेपी ने 1991, 1993 और 1996 के चुनावों में जीत दर्ज की थी। इसके बाद पार्टी को यहां जीत नहीं मिली। समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा।2022 में समाजवादी पार्टी के इरफान सोलंकी ने जीत दर्ज की थी। उनके बाद 2024 के उपचुनाव में उनकी पत्नी नसीम सोलंकी ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की। सीसामऊ में सपा की मजबूत पकड़ और स्थानीय राजनीतिक समीकरण बीजेपी के लिए चुनौती बने हुए हैं।

आजमगढ़ की गोपालपुर और लालगंज भी चुनौती

आजमगढ़ जिले की गोपालपुर और लालगंज विधानसभा सीटों पर बीजेपी को चुनावी सफलता हासिल करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। गोपालपुर सीट पर बीजेपी अब तक जीत का खाता नहीं खोल सकी है। वहीं लालगंज में बीजेपी को 1996 के बाद जीत नहीं मिली है।इन दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव रहा है। स्थानीय सामाजिक समीकरण, जातीय आधार और क्षेत्रीय नेतृत्व चुनावी परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं। 2027 में बीजेपी के सामने इन सीटों पर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की चुनौती होगी।

क्या होगी बीजेपी की रणनीति?

यूपी विधानसभा 2027 से पहले बीजेपी के सामने इन 10 सीटों पर संगठन मजबूत करने की बड़ी चुनौती है। पार्टी को उन क्षेत्रों में विशेष रणनीति तैयार करनी होगी, जहां पिछले कई चुनावों से विपक्षी दल लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं। बीजेपी की रणनीति में बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करना, स्थानीय नेताओं को जिम्मेदारी देना, मजबूत उम्मीदवारों का चयन और सामाजिक समीकरणों को साधना अहम भूमिका निभा सकते हैं।

पार्टी को मतदाताओं के बीच जनसंपर्क बढ़ाने और विपक्ष के मजबूत आधार वाले क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने पर जोर देना होगा। इन सीटों पर स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि और क्षेत्रीय नेतृत्व चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए केवल चुनावी प्रचार ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठनात्मक मजबूती भी जरूरी होगी।

 

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2027 में विपक्ष के किले भेदने की परीक्षा

यूपी विधानसभा 2027 का चुनाव बीजेपी के लिए सत्ता में वापसी के साथ-साथ उन सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की परीक्षा भी होगा, जहां विपक्ष का लंबे समय से प्रभाव कायम है। प्रतापगढ़ में रामपुर खास पर कांग्रेस और कुंडा-बाबागंज में जनसत्ता दल का प्रभाव, जसवंतनगर में शिवपाल यादव की लगातार जीत, रसड़ा में बीएसपी का मजबूत आधार और आजमगढ़ की सीटों पर विपक्षी समीकरण बीजेपी की रणनीति की परीक्षा लेंगे।

 

अब सवाल यही है कि बीजेपी इन सीटों पर संगठन और चुनावी रणनीति के दम पर विपक्ष के मजबूत किलों में सेंध लगा पाएगी या नहीं। 2027 के चुनाव में इन सीटों का मुकाबला प्रदेश की सियासत के सबसे दिलचस्प चुनावी संघर्षों में शामिल हो सकता है।