हम अक्सर अपने जीवन की खुशियां और सफलता के किस्से दूसरों को बताते हैं। कई लोगों का मानना है कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, जबकि इसके ठीक विपरीत धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि व्यक्ति को अपनी सफलता का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए। धार्मिक जानकारों के मुताबिक, अपनी खुशियों का अधिक प्रचार-प्रसार करने से व्यक्ति को नजर लग सकती है और नकारात्मक प्रभाव के कारण उसकी खुशियां कम हो सकती हैं। वहीं धर्म शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि सफलता का अधिक बखान करने से व्यक्ति में घमंड आ जाता है और यही घमंड आगे चलकर उसकी असफलता का कारण बन सकता है।
कोई भी व्यक्ति मेहनत और चुनौतियों को पार करके ही सफलता हासिल करता है। ऐसी परिस्थिति में वह अक्सर दूसरों को अपनी सफलता के बारे में बता देता है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि दूसरा व्यक्ति उसकी सफलता से खुश हो। इसी वजह से हिंदू धर्म के अलग- अलग ग्रंथों में श्लोकों के माध्यम से बताया गया है कि सफलता का बखान नहीं करना चाहिए। अब सवाल उठता है कि भगवद गीता और महाभारत में इसे लेकर क्या कहा गया है।
यह भी पढ़ें: मेष, मकर, मीन सावधान, सिंह के बदलेंगे दिन, कैसी रहेगी भाग्यदशा? पढ़ें राशिफल
भगवद गीता में क्या लिखा है?
भगवद गीता में बताया गया है कि जब व्यक्ति को मेहनत करने के बाद सफलता मिले, तब उसे अपनी सफलता का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हर बार मेहनत करने पर सफलता ही मिले, कई बार मेहनत के बावजूद भी असफलता मिल सकती है। इसलिए व्यक्ति को सफलता और असफलता, दोनों में समान भाव रखना चाहिए। साथ ही सफलता का बखान करने से भी बचना चाहिए। इसी सिलसिले में श्रीकृष्ण ने आदर्श व्यक्ति के गुण बताए हैं।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।
इस श्लोक का अर्थ है कि जो व्यक्ति कर्म करने के बाद फल के लालच से मुक्त रहता है, सफलता मिलने पर ज्यादा खुश नहीं होता और असफलता मिलने पर ज्यादा दुखी नहीं होता, वही आदर्श व्यक्ति माना जाता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि सफलता मिलने पर अत्यधिक उत्साहित होकर उसका ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए।
यह भी पढ़ें: 'द डिवाइन कॉमेडी' इटली की इस कविता में गरुड़ पुराण जैसी लिखी गई है नरक यात्रा
बखान करना एक दोष
महाभारत के एक श्लोक में बताया गया है कि अलग-अलग दोषों की वजह से व्यक्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। सफलता मिलने पर लोगों को अपनी उपलब्धियों पर घमंड हो जाता है, जिसे धर्म शास्त्रों में व्यक्ति का अवगुण माना गया है।
क्रोधं श्रिया हन्ति हिनस्त्यनार्यः क्षमां क्रोधः।
ह्रियं हन्त्यनार्यः कुलमिह हन्त्यनार्यः।।
इस श्लोक का अर्थ है कि जिस प्रकार अधिक क्रोध करने से व्यक्ति की संपत्ति नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार अपनी उपलब्धियों का घमंड करने से उसके ज्ञान और विवेक का नाश होने लगता है। इसलिए व्यक्ति को अपनी सफलता पर घमंड करने और उसका बखान करने से बचना चाहिए।
