असम में पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने पर अब सरकारी कर्मचारी की नौकरी चली जाएगी। हिमंता बिस्वा सरमा सरकार की कैबिनेट ने असम सेवा (अनुशासन और अपील) नियम, 1964 में बदलाव के लिए मंजूरी दे दी है। ऐसे में विभागीय जांच में दोषी पाए जाने पर कर्मचारी को बर्खास्त किया जाएगा और भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा। असम सरकार के इस फैसले के बाद अब फिर बहस तेज हो गई है।
अब अगर कोई भी सरकारी कर्मचारी बहुविवाह का दोषी पाया जाता है, तो उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जाएगा। ऐसे कर्मचारियों को न केवल वर्तमान पद से हटाया जाएगा, बल्कि उन्हें भविष्य में राज्य सरकार के किसी भी विभाग में नौकरी पाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। सरकार ने 20 अक्टूबर 2023 को ही आदेश जारी किया था कि पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने के लिए सरकारी अनुमति जरूरी है। यह पुरुष और महिला दोनों कर्मचारियों पर लागू है।
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नए नियम से क्या बदलेगा?
नए नियम के तहत बहुविवाह को सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी का आधार बनाया गया है। दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों की न केवल मौजूदा नौकरी जाएगी, बल्कि वे भविष्य में भी सरकारी नौकरी पाने के अयोग्य हो जाएंगे। इस फैसले की घोषणा करते हुए हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा, 'असम कैबिनेट ने तय किया है कि अगर असम सरकार का कोई कर्मचारी एक से अधिक विवाह (बहुविवाह) करता पाया जाता है, तो उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाएगा।'
मुख्यमंत्री ने इसे राज्य के सेवा नियमों में एक बड़ा बदलाव बताया और कहा कि इस नियम का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।मुख्यमंत्री ने कहा कि यह नियम समान नागरिक संहिता (UCC) के तहत सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होगा. यानी हिंदू, मुस्लिम और ईसान समेत सभी समुदायों के सरकारी कर्मचारियों पर यह नियम लागू होगा
क्यों छिड़ी है बहस?
अपने इस फैसले पर सरकार का तर्क है कि यह महिलाओं को बराबरी और सुरक्षा देने के लिए है। हालांकि, विपक्ष में कांग्रेस और AIUDF ने कानून पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि यह मुसलमानों को निशाना बनाता है और इसके पीछे सांप्रदायिक मकसद है। हालांकि मुख्यमंत्री का कहना है कि सेवा नियम का बदलाव सभी धर्मों के कर्मचारियों पर बराबर लागू होगा। मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना है कि सरकार उन्हें निशाना बना रही है।
बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब असम सरकार ने अपने कर्मचारियों को दूसरी शादी करने से रोका है। सरकार इससे पहले अक्टूबर 2023 में भी इस संबंध में आदेश जारी कर चुकी है। अब नए फैसले के जरिए पुराने नियम के उल्लंघन पर सजा को और सख्त कर दिया गया है।
2023 से दूसरी शादी के लिए सरकारी अनुमति अनिवार्य
असम सरकार ने 20 अक्टूबर 2023 को ही इस संबंध में आदेश जारी किया था। यह आदेश असम सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 26 के तहत जारी किया गया था। इसमें सरकारी कर्मचारियों को पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने से पहले सरकार की अनुमति लेने का निर्देश दिया गया था।
इस नियम में पुरुष और महिला दोनों कर्मचारियों को शामिल किया गया था। अगर किसी पुरुष कर्मचारी की पत्नी जीवित है, तो वह सरकार की अनुमति के बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता। यह शर्त तब भी लागू होगी, जब उसके व्यक्तिगत धर्म या कानून में दूसरी शादी की अनुमति हो।
वहीं कोई महिला सरकारी कर्मचारी ऐसे पुरुष से शादी नहीं कर सकती, जिसकी पहले से पत्नी जीवित है। इसके लिए भी सरकार की अनुमति जरूरी है। सरकार ने 2023 के आदेश में यह भी कहा था कि नियम का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। इसमें अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी बड़ी सजा शामिल थी। यानी दूसरी शादी के लिए सरकारी अनुमति की शर्त पहले से लागू थी।
3 नवंबर 2026 को कैबिनेट ने नियम 7 में नया क्लॉज 6 जोड़ने को मंजूरी दी, जिसके तहत दोषी कर्मचारियों को बर्खास्त करने और भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य घोषित करने का प्रावधान है।
आंकड़े क्या बताते हैं?
आंकड़ों पर नजर डालें तो पूरे भारत और यहां तक कि असम में भी बहुविवाह (एक से अधिक पत्निया रखने की प्रथा) में कमी आई है। मुंबई स्थित 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज' (IIPS) की 2022 की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, असम और राष्ट्रीय स्तर पर 2005-06 के बाद से बहुविवाह के मामलों में लगातार कमी आई है। इस रिपोर्ट में पिछले तीन 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे' (NFHS) के डेटा का इस्तेमाल किया गया है। इसमें 15 से 49 वर्ष की विवाहित महिलाओं के बीच 'पॉलीजिनी' के प्रचलन की जांच की गई है। भारत में बहुविवाह का सबसे आम रूप यही है, जिसमें एक पुरुष कई महिलाओं से विवाह करता है।
आंकड़ों के मुताबिक, 2005-06 में, जब तीसरा NFHS हुआ था, तब भारत में 15 से 49 वर्ष की विवाहित महिलाओं के बीच 'पॉलीजिनी' की दर 1.9% थी। 2015-16 में चौथे NFHS के दौरान यह आंकड़ा घटकर 1.6% हो गया, और फिर 2019-21 के पांचवें NFHS में यह और कम होकर 1.4% पर आ गया।
वहीं NFHS के आंकड़ों के अनुसार, असम में 'पॉलीजिनी' का प्रचलन 2005-06 में 3.3% से घटकर 2015-16 में 2.4% हो गया था, लेकिन 2019-21 में यह आंकड़ा स्थिर रहा (इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ)। 2005-06 में असम में 'पॉलीजिनी' की दर देश में छठी सबसे अधिक थी; 2015-16 में यह आठवें स्थान पर आ गई, और फिर 2019-21 में वापस छठे स्थान पर पहुंच गई।
2019-21 के आंकड़ों के अनुसार, असम के जिन जिलों में 'पॉलीजिनी' की दर सबसे अधिक है, उनमें विश्वनाथ और करीमगंज शामिल हैं, जहां यह दर 4.2% है। 2011 की जनगणना के अनुसार, बिस्वनाथ में अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी 15.21% है, जबकि करीमगंज में आधी से ज़्यादा आबादी मुस्लिम है।
असम में, मुसलमानों के बीच एक से ज़्यादा पत्नियां रखने की प्रथा 2005-06 के 6.9% से घटकर 2019-21 में 3.6% हो गई है। वहीं, हिंदुओं के बीच इसी अवधि में यह दर 2.1% से घटकर 1.8% रह गई है।
असम के नए कानून में आदिवासी समुदायों को छूट दी गई है, लेकिन बहुपत्नी प्रथा के लिए इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है। वैसे तो भारत में 1955 के 'हिंदू विवाह अधिनियम' के तहत बहुपत्नी प्रथा पर प्रतिबंध है, लेकिन कुछ हिंदू समुदायों और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इसकी अनुमति है।
