तमिलनाडु में एक यात्री के बस टिकट को लेकर हुए विवाद इतना बढ़ गया कि अब इस मामले में राज्य परिवहन निगम के अधिकारियों को 60 हजार रुपये देने पड़ेंगे। राज्य परिवहन निगम को यह आदेश जिला उपभोक्ता आयोग ने दिया है। एक यात्री ने आरोप लगाया था कि तिरुवन्नामलाई में बस के रुकने के दौरान उसकी सीट पर दूसरी महिला बैठ गई। शिकायत करने पर कंडक्टर ने उससे टिकट लिया, उसे चबाकर फेंक दिया और बाद में यात्री को दूसरी बस में जाने के लिए कह दिया।
यह मामला 23 मार्च 2026 का बताया जा रहा है। आयोग के आदेश के मुताबिक, यात्री अपने बेटे के लिए दवा खरीदने वेल्लोर गया था। वहां से उसने पेरम्बलूर जाने के लिए बस पकड़ी थी। यात्री का कहना था कि उसने टिकट के लिए 500 रुपये दिए थे, लेकिन कंडक्टर ने उसे 200 रुपये का टिकट दिया और बाकी 300 रुपये पेरम्बलूर पहुंचने पर लौटाने की बात कही। इसके बाद बस तिरुवन्नामलाई में चाय के लिए रुकी और जब वह वापस आया तो सीट पर दूसरी महिला बैठी थी
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बस कंडक्टर पर लगाए आरोप
यात्री के मुताबिक, जब वह चाय के ब्रेक के बाद बस में लौटा तो उसकी सीट पर एक दूसरी महिला बैठी थी। उसने इस बारे में शिकायत की। आरोप है कि इसके बाद कंडक्टर ने यात्री से उसका टिकट मांगा था और यात्री ने टिकट दिखाया भी। इसके बाद कंडक्टर ने कथित तौर पर टिकट को चबाकर बाहर थूक दिया।
यात्री ने यह भी आरोप लगाया कि इसके बाद कंडक्टर और ड्राइवर बस लेकर चले गए और उसका बैग भी बस से बाहर फेंक दिया गया। जब उसका सामान बस से बाहर फेंक दिया और यात्री को भी बाहर निकात दिया तो उसे दूसरी बस से पेरम्बलूर जाना पड़ा। इसके लिए उसने 136 रुपये खर्च किए।
बाद में भेजा कानूनी नोटिस
यात्री ने 24 मार्च 2026 को तमिलनाडु स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के क्षेत्रीय और जोनल मैनेजर को कानूनी नोटिस भेजा। उसने अपने 300 रुपये वापस करने, 10 लाख रुपये मुआवजा देने, मुकदमे का खर्च देने और कंडक्टर-ड्राइवर के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसके बाद मामला पेरम्बलूर जिला उपभोक्ता आयोग पहुंचा।
मामले की सुनवाई के दौरान परिवहन निगम ने यात्री के आरोपों को गलत बताया। निगम ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक टिकटिंग मशीन के रिकॉर्ड के मुताबिक, बताए गए दिन वेल्लोर से पेरम्बलूर के बीच उस यात्री के लिए कोई टिकट जारी नहीं हुआ था। निगम ने यह भी कहा कि यात्रा का वास्तविक किराया 212 रुपये था, जबकि यात्री ने 200 रुपये के टिकट की बात कही थी। इसके अलावा निगम ने यह दलील दी कि बस की तस्वीर होना इस बात का सबूत नहीं है कि यात्री ने वास्तव में उसी बस में सफर किया था।
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क्या फैसला हुआ?
पेरम्बलूर जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष डी. जवाहर और सदस्य पी. थिलका व एम. मुथुकुमारन की बेंच ने यात्री के इस आरोप को स्वीकार नहीं किया कि उसे अवैध तरीके से बस से उतारा गया था। आयोग ने कहा कि संक्षिप्त कार्यवाही में केवल यात्री के बयान के आधार पर इस आरोप का फैसला नहीं किया जा सकता। लेकिन आयोग ने परिवहन निगम के अधिकारियों की ओर से शिकायत की उचित जांच नहीं किए जाने को गंभीरता से लिया। आयोग ने कहा कि यात्री ने स्पष्ट रूप से बताया था कि तिरुवन्नामलाई में टाइम-कीपर के सामने पूछताछ के दौरान उसका टिकट नष्ट किया गया था। ऐसे में निगम के अधिकारियों को टाइम-कीपर या बस स्टैंड के ब्रांच मैनेजर से रिपोर्ट लेकर इस आरोप की सच्चाई जांचनी चाहिए थी।
आयोग ने कहा कि क्षेत्रीय और जोनल मैनेजरों को यात्री का कानूनी नोटिस मिला था, लेकिन उन्होंने मामले की जांच नहीं की। आयोग ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत उपभोक्ताओं को अनुचित शोषण से सुरक्षा का अधिकार है और इस मामले में बिना जांच किए शिकायत को नजरअंदाज करना सेवा में कमी है। पेरम्बलूर जिला उपभोक्ता आयोग ने तमिलनाडु स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के अधिकारियों को यात्री को कुल 60 हजार रुपये देने का आदेश दिया है।
