राजस्थान में सड़कों को सुरक्षित बनाने और सड़क हादसों को रोकने के लिए दिए गए बजट को खर्च करने में प्रशासन की लापरवाही सामने आई है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक राज्य के रोड सेफ्टी फंड में कुल 716.37 करोड़ रुपये आए थे लेकिन सरकार इसमें से सिर्फ 343.36 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाई, जो कुल रकम का 47.93 प्रतिशत है। यानी आधे से ज्यादा करीब 52 प्रतिशत फंड खर्च ही नहीं हो सका।

 

CAG रिपोर्ट के मुताबकि, फंड का पूरा पैसा खर्च नहीं होने की वजह से सड़क सुरक्षा से जुड़े कई जरूरी प्रोजेक्ट जमीन पर नहीं उतर पाए। वहीं, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 343.36 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद सड़क हादसों में होने वाली मौतों में कोई खास कमी नहीं आई। मौतों का आंकड़ा लगभग पहले जैसा ही बना रहा।

 

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कब और कितना पैसा मिला और कितना खर्च हुआ?

CAG रिपोर्ट के मुताबिक, 2018-19 में करीब 99.39 करोड़ रुपये का फंड मिला था लेकिन इसमें से सिर्फ 9.12 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाया। 2019-20 में 100.45 करोड़ रुपये मिले लेकिन खर्च केवल 22.61 करोड़ रुपये हुआ। वहीं, 2020-21 में 104.66 करोड़ रुपये मिलने के बावजूद सिर्फ 26.36 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बाद 2021-22 में 100 करोड़ रुपये मिले और 75.10 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2022-23 में 93.49 करोड़ रुपये की प्राप्ति के मुकाबले 39.44 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2024-25 में फंड घटकर 33 करोड़ रुपये रह गया, जबकि इस साल 60.77 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

 

बिना फंड के इस्तेमाल के अटके ये 5 अहम प्रोजेक्ट

CAG रिपोर्ट के मुताबकि, फंड का पूरा इस्तेमाल नहीं होने की वजह से कई जरूरी सुरक्षा उपाय लागू नहीं हो पाए:

  • हाई-रिस्क वाले संवेदनशील इलाकों में इलेक्ट्रॉनिक एन्फोर्समेंट डिवाइस स्थापित नहीं हो सके।
  • स्पीड डिटेक्शन कैमरों के साथ ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) सिस्टम की स्थापना अटकी रही।
  • राज्य के 24 RTO/DTO कार्यालयों में ऑटोमैटिक ड्राइविंग टेस्टिंग ट्रैक नहीं बनाए जा सके।
  • सड़क हादसों में घायलों की जान बचाने वाले ट्रॉमा सेंटर्स के लिए जरूरी उपकरणों की व्यवस्था नहीं हुई।
  • ट्रैफिक पार्कों का विकास कार्य भी अधूरा रह गया।

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हादसों में सबसे बड़ा कारण ओवर-स्पीडिंग

CAG रिपोर्ट में 2019 से 2024 के बीच हुए सड़क हादसों की वजहों का भी जिक्र है। इस दौरान तेज रफ्तार की वजह से 1,11,429 हादसे हुए, जिनमें 53,028 लोगों की मौत हुई। वहीं, हिट एंड रन के 32,000 मामलों में 15,510 लोगों की जान गई। इन आंकड़ों से साफ है कि स्पीड डिटेक्शन जैसे आधुनिक उपकरण समय पर नहीं लगाए जाने का असर सड़क सुरक्षा पर पड़ा।