मणिमहेश की ऊंची पहाड़ियों पर मौसम भले ही करवट बदल रहा हो लेकिन राधाष्टमी के शाही स्नान की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा अपने तय क्रम से आगे बढ़ रही है। 18 सितंबर को संचूई गांव के शिव चेले पवित्र डल झील पहुंचकर झील तोड़ने की रस्म निभाएंगे। इसके बाद ही शाही स्नान का शुभारंभ माना जाएगा। त्रिलोचन महादेव के वंशज माने जाने वाले संचूई के शिव चेले गुरुवार को भरमौर से मणिमहेश के लिए रवाना हुए। चौरासी मंदिर की परिक्रमा और मणिमहेश मंदिर में दर्शन के बाद उन्होंने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। इसके बाद दल डल झील की ओर रवाना हुआ। रास्ते में जगह-जगह स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ उनका स्वागत किया। 

 

शिव चेले शुक्रवार सुबह धनछो से आगे का सफर शुरू करेंगे और दोपहर करीब 12 बजे डल झील पहुंचकर परंपरागत रूप से झील तोड़ने की रस्म पूरी करेंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी रस्म के पूरा होने के बाद राधाष्टमी का पवित्र शाही स्नान शुरू होता है। इस धार्मिक यात्रा में संचूई के शिव चेलों के साथ दशनामी अखाड़े की छड़ी, कार्तिक स्वामी की छड़ी, चरपटनाथ की छड़ी और भादवाही की छड़ी भी डल झील की ओर बढ़ रही हैं।

 

हर साल पहुंचते हैं हजारों श्रद्धालु

सभी छड़ियां और शिव चेले धनछो में रात्रि विश्राम करेंगे। मणिमहेश क्षेत्र में इस समय मौसम चुनौती बना हुआ है। डल झील, गौरीकुंड और सुंदरासी क्षेत्र में बारिश के साथ बर्फबारी के चलते प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा के मद्देनजर यात्रा को अस्थायी रूप से रोक दिया है। मणिमहेश झील समुद्र तल से करीब 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है और कैलाश पर्वत की तलहटी में बसे इस पवित्र स्थल पर हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। 

 

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डल झील तोड़ने की रस्म केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मणिमहेश यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक मानी जाती है। शिव चेलों की इस रस्म के बाद ही शाही स्नान की धार्मिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है। पिछले वर्ष खराब मौसम के कारण यह परंपरा पूरी नहीं हो पाई थी, इसलिए इस बार श्रद्धालुओं की नजरें 18 सितंबर की इस रस्म पर टिकी हैं।