हरियाणा के राजकीय प्राथमिक स्कूलों में पीएम पोषण योजना के तहत मिलने वाले मिड-डे मील के लिए आने वाला बजट अटकने से स्कूल अध्यापकों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। पूरे हरियाणा में करीब 70 करोड़ रुपये का बजट अटकने से अध्यापकों को अपनी जेब में से पैसे खर्च कर मिड-डे मील का इंतजाम करना पड़ रहा है। लगातार कई महीने से जेब से खर्च करने के बाद अब अध्यापकों की आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगी है। बजट पास न होने की मुख्य वजह विभाग की तरफ से नए पोर्टल को बनाना बताया गया है।
राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ हरियाणा के प्रधान तरुण सुहाग व जनरल सेक्रेटरी राजेश शर्मा ने बताया कि मार्च से ये बजट पेंडिंग चल रहा है। हर महीने पूरे राज्य का करीब 10 करोड़ रुपये का बजट बन जाता है। प्राइमरी तक के हर विद्यार्थी पर 6 रुपये 78 पैसे खर्च किए जाते हैं। राज्य में करीब 9 हजार प्राइमरी स्कूल हैं। उन्होंने बताया कि बजट न आने से अध्यापकों को हर रोज 4 रुपये 24 पैसे के हिसाब से प्रति विद्यार्थी पर अपनी जेब से खर्च करना पड़ रहा है। जिसमें दूध, दही, सब्जियां, गुड़, चीनी व ऐसा मील जो लंबे समय तक स्टोर नहीं हो सकता, सिलेंडर खरीदने पड़ते हैं। इसके अलावा विभाग की तरफ से 2 रुपये के करीब हर महीने राशन स्कूलों में आता है, लेकिन वह भी हर महीने लेट हो रहा है। अक्टूबर का राशन भी अभी तक नहीं आया है।
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'वेंडर बनाने के लिए आया मैसेज'
उन्होंने बताया कि इस संबंध में दो से तीन बार विभाग को लिखा भी है। पिछले महीने शिक्षा विभाग के सचिव से भी मुलाकात की गई थी। विभाग ने बताया कि स्पर्श पोर्टल बनाया गया है, जिसके माध्यम से बजट स्कूलों को दिया जाना है। कुछ गाइडलाइन न होने व अन्य कारणों से उसमें पेमेंट नहीं डाली जा सकी। अब बुधवार यानी आज ही विभाग की तरफ से मैसेज आया है कि पेमेंट खातों में डलवाने के लिए वेंडर बनाए जाएं। स्कूल प्रिंसिपल के खाते में ये पेमेंट आएगी। प्रिंसिपल के खाते में से वेंडर के खाते में से पेमेंट जाएगी। पहले सीधे पे-आॅर्डर बनाकर ये पेमेंट स्कूल खाते में आती थी।
उन्होंने कहा कि अगर इसमें जीएसटी के बिल लगाने पड़े तो समस्या और ज्यादा बढ़ेगी, क्योंकि जिन वेंडर्स से सामान लिया जाता है, उनमें से अधिकतर के पास जीएसटी नंबर नहीं होता। क्योंकि दूध, दही, सब्जी बेचने वाले छोटे दुकानदार व रेहड़ी संचालक होते हैं। ऐसे में उनसे जीएसटी बिल मिल पाना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि अंबाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, जींद, हिसार, महेंद्रगढ़, फतेहाबाद, भिवानी, और पलवल में स्थिति ज्यादा गंभीर है। जिस स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या ज्यादा होती है, वहां अध्यापक को और ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
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'स्पर्श पोर्टल की प्रक्रिया को सरल बनाया जाए'
उन्होंने कहा कि विभाग लंबित पड़े मिड-डे मील के बजट को जल्द जारी करे और स्पर्श पोर्टल की प्रक्रिया को सरल बनाए, ताकि अध्यापकों को परेशानी न हो। स्पर्श पोर्टल की भुगतान व्यवस्था पूरी तरह सुचारु होने तक वैकल्पिक माध्यम से स्कूलों को समय पर धनराशि उपलब्ध करवाई जाए। शिक्षकों द्वारा अपनी जेब से खर्च की गई राशि का प्राथमिकता के आधार पर भुगतान किया जाए। साथ ही सभी प्राथमिक स्कूलों में राशन की नियमित और समयबद्ध आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
