उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरे देश का सेंटर प्वाइंट रहती है। राजनीति में कहा जाता है कि जो भी यूपी की सत्ता पर काबिज होगा उसके लिए केंद्र की राहे आसान हो जाती है। यूपी में 2027 में चुनाव होने वाला है। पार्टियां सभी दावों का इस्तेमाल कर कुर्सी तक पहुंचना चाहती है। इसमें से सबसे जरूरी पार्टियों की रथ यात्रा जो सभी समीकरण साधने के लिए निकाली जाती है। इसमें कोई सफल होता है कोई नहीं। अभी फिर से रथ यात्रा चर्चा में है क्योंकि समाजवादी पार्टी (SP) अखिलेश यादव अपनी 'PDA रथ' की शुरुआत किए हैं।
PDA का मतलब पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक हैं। जिसके सहारे SP प्रमुख फिर से अपना दांव आजमा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) 2017 से राज्य की कमान संभाले हुए हैं। पिछले दो चुनावों से SP सत्ता तक पहुंचने के लिए प्रयास कर रही है। हम यह कह सकते हैं कि प्रदेश की राजनीति में 'रथ यात्रा' केवल एक राजनीतिक अभियान नहीं बल्कि समीकरण गढ़ने का एक असरदार प्रयोग रही है।
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रथ यात्रायों पर एक नजर
प्रदेश की राजनीति में रथ यात्रा केवल चुनावी प्रचार का जरिया नहीं रही है। बल्कि कई बार नेतृत्व स्थापित करने और सोशल इंजीनियरिंग को साधने का तरीका भी रही है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर बार रथ यात्रा की वजह से चुनावी जीत हुई है। आइए डालते हैं इन यात्रायों पर एक नजर-
मुलायम सिंह यादव की 'क्रांति रथ यात्रा'
1987 में पहली बार मुलायम सिंह यादव ने 'क्रांति रथ यात्रा' निकाली थी। इस यात्रा में उनके साथ कई घटनाएं हुई। इस यात्रा ने जमीन पर उन्हें एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया था। इसके दो साल बाद 1989 में वह पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने। इस यात्रा में ही गाजियाबाद में उनके समर्थकों ने उन्हें सिक्के से तौला था।
2011 का 'क्रांति रथ'
सितंबर 2011 में जब अखिलेश यादव ने 'समाजवादी क्रांति रथ' की कमान संभाली तो मकसद केवल मायावती सरकार का विरोध करना नहीं था। मकसद था, मुलायम सिंह यादव की पार्टी को 'युवा अखिलेश' के रूप में रिब्रांड करना। नतीजा रहा 2012 के चुनाव में SP 224 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत में आई। उसी समय अक्टूबर 2011 में BJP ने भी 'जन स्वाभिमान यात्रा' निकाली थी लेकिन वह फ्लॉप रही। पार्टी महज 47 सीटों पर सिमट गई।
2016 में 'विकास रथ' थमा, 'परिवर्तन' दौड़ा
2016 में जब अखिलेश यादव का 'विकास रथ' निकला तो उसमें उनके काम का रिपोर्ट कार्ड था। लेकिन उसी वक्त BJP ने राज्य में चार दिशाओं से लगभग 17,000 किलोमीटर की 'परिवर्तन यात्राएं' झोंक दीं। 2017 का नतीजा चौंकाने वाला था। BJP 312 सीटों के प्रचंड बहुमत से जीती और SP 47 पर सिमट गई।
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2021 का 'विजय रथ'
2022 के चुनाव से पहले निकला 'विजय रथ' SP को सत्ता में नहीं ला सका। लेकिन उसने पार्टी को 47 से उठाकर 111 सीटों पर पहुंचा दिया। रथ ने संजीवनी का काम किया। साथ ही विपक्ष को एक मजबूत धड़े के रूप में फिर से जिंदा कर दिया।
2026 का 'PDA रथ'
24 सितंबर 2026 को रायबरेली से रवाना हुआ 'PDA रथ' सिर्फ एक बस नहीं बल्कि पूरी तरह से सोशल इंजीनियरिंग को साधने का तरीका है। रायबरेली के हरचंदपुर से लोधी-पासी बहुल क्षेत्र से इसकी शुरुआत हुई है। जो दिखाता है कि इस बार मुद्दें जैसे महंगाई, बेरोजगारी से ज्यादा ध्यान 'जातीय व सामाजिक गोलबंदी' पर है। बस पर डॉ. आंबेडकर, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की फोटो के साथ लिखा हैं 'PDA ही परिवर्तन'। जो सीधे तौर पर दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों के गठबंधन का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है।
क्या रथ से चुनाव जितना आसान है?
आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की राजनीति में रथ यात्रा अपने आप में जीत की गारंटी कभी नहीं रही। यह केवल पहले से बने माहौल को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का एक लाउडस्पीकर है। 2012 में क्रांति रथ ने सत्ता विरोधी माहौल को भुनाया। 2017 में BJP की परिवर्तन यात्रा ने ब्रांड मोदी और जमीनी असंतोष को जोड़ा। अब देखना यह है कि 'PDA रथ' 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए केवल कैडर में जोश भरता है या फिर 2012 के इतिहास को दोहराने का जरिया बनता है।
