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क्या कतर और ओमान वाली चाल में फंस गया पाकिस्तान, कैसे झटका दे सकता है इजरायल?

अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम कराने पर अभी पाकिस्तान की खूब वाहवाही हो रही है। मगर पाकिस्तान के सामने आने वाले दिनों में इजरायल कई जोखिम खड़ सकता है। इसके संकेत बेंजामिन नेतन्याहू के बयान में मिलते हैं।

Shehbaz Sharif and Benjamin Netanyahu

शहबाज शरीफ और बेंजामिन नेतन्याहू। (AI Generated Image)

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पाकिस्तान की पहल पर अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम हुआ है। हालांकि कुछ घंटे बाद ही इजरायल ने लेबनान पर भीषण बमबारी करके इसकी धज्जियां उड़ा दी। वहीं ईरान के तेल केंद्र पर भी हमले की खबर है। इजरायली सेना ने कहा कि उसने यह हमला नहीं किया है। मगर ईरान की सेना ने सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात पर हमला करके अपना जवाब दिया है।

 

इजरायल की सेना बुधवार को लेबनान में 10 मिनट में 100 अधिक ठिकानों पर 160 से अधिक बमों से हमला किया। कुछ विशेषज्ञ इसे 1982 के बाद सबसे भीषण हमला बताया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन हमलों में कम से कम 254 लोगों की जान गई और 1165 से अधिक लोग घायल हुए हैं।  

 

उधर, ईरान के आईआरजीसी से जुड़ी फार्स न्यूज एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा  किया है कि लेबनान पर हमला करके इजरायल ने युद्धविराम का उल्लंघन किया है। आईआरजीसी इजरायल के खिलाफ निवारक अभियान चलाने पर विचार कर रहा है। मतलब साफ है कि ईरान हिजबुल्लाह पर हमले के बदले में किसी भी वक्त इजरायल पर अटैक कर सकता है। 

नई लड़ाई की असली जड़ क्या होगी?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मंगलवार को ऐलान किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम हो गया है। अमेरिका और ईरान व उनके सहयोगी लेबनान समेत अन्य जगहों पर तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं।

 

यह भी पढ़ें: 'ईरान को हथियार देने वाले देश पर लगाएंगे 50% टैरिफ', ट्रंप की दुनिया को नई धमकी

क्या घिरने लगा पाकिस्तान?

मगर शहबाज शरीफ के बयान का कुछ ही समय बाद इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खंडन किया। उन्होंने कहा, 'इजरायल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन प्रयासों का समर्थन करता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ईरान अब अमेरिका, इजरायल या अपने अरब पड़ोसियों और दुनिया के लिए परमाणु, मिसाइल और आतंकवादी खतरा नहीं है। दो सप्ताह का युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होता है।'

 

नेतन्याहू के बयान के बाद आईडीएफ के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर ने भी कहा कि हिजबुल्लाह के खिलाफ यह कोई आखिरी हमले नहीं हैं। आतंकी समूह के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। हर अवसर का लाभ उठाएंगे। हम उत्तरी क्षेत्र के निवासियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेंगे। हम बिना रुके हमले जारी रखेंगे।

 

बुधवार को एक टेलीफोन इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रप ने भी स्पष्ट किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते में लेबनान शामिल नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों तो उन्होंने जवाब दिया- हिजबुल्लाह की वजह से उन्हें समझौते में शामिल नहीं किया गया। उसका भी समाधान हो जाएगा। कोई बात नहीं।' हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की ताजा बमारी के सवाल पर ट्रंप ने कहा कि यह समझौते का हिस्सा है और यह एक अलग लड़ाई है।

क्या ईरान से शहबाज शरीफ ने झूठ बोला?

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बयान के बाद अब सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ झूठ बोल रहे हैं। क्या उन्होंने ईरान और बाकी दुनिया को गलत जानकारी दी, क्योंकि ईरान और शहबाज शरीफ दोनों ने अपने बयान में दावा किया कि युद्धविराम में लेबनान शामिल है।

 

यह भी पढ़ें: 1982 के बाद लेबनान पर इजरायल का सबसे भीषण हमला, कहां गया युद्धविराम?

 

नेतन्याहू की मीटिंग से पाकिस्तान पर उठे सवाल

5 अप्रैल को बेंजामिन नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात की थी। ट्रंप से अनुरोध किया था कि इस वक्त युद्धविराम करना ठीक नहीं होगा। इसके अपने जोखिम होंगे। दोनों नेताओं के बीच पाकिस्तान के 45 दिनों के अस्थायी युद्धविराम के ड्रॉफ्ट के चंद घंटे बाद बातचीत हुई थी। हालांकि ट्रंप युद्धविराम पर अड़े रहे।

 

 इसके बाद रविवार रात को ही नेतन्याहू ने कैबिनेट मीटिंग बुलाई। इसमें कहा कि अगर ईरान के साथ अमेरिका का युद्धविराम होता है तो इजरायल लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ अपने अभियान को नहीं रोकेगा। मतलब साफ है कि बुधवार को लेबनान में हुई बमबारी पहले से ही तय थी। अगर इजरायल ने हिजबुल्लाह पर हमले की तैयारी रविवार को ही कर ली थी तो शहबाज शरीफ ने मंगलवार को झूठ क्यों बोला?

नेतन्याहू के बयान के मायने क्या हैं?

युद्धविराम के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने पूरे देश को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने कहा, 'जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह का अस्थायी युद्धविराम इजरायल के पूर्ण समन्वय से कल रात से लागू हो गया है। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हमारे अब भी कुछ लक्ष्य हैं, जिन्हें पूरा करना है। हम उन्हें या तो समझौते के माध्यम से या फिर लड़ाई दोबारा शुरू करके हासिल करेंगे।'

ट्रिगर पर अंगुली... हमला करने को तैयार'

नेतन्याहू ने संकेत दिए कि इजरायल पूरी तरह से ईरान पर हमले को तैयार है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर किसी भी क्षण युद्ध में लौटने के लिए तैयार हैं। हमारी अंगुली ट्रिगर पर है। अब मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि यह अभियान का अंत नहीं है। यह हमारे सभी लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक मील का पत्थर है।

युद्धविराम पर ईरान को यकीन नहीं!

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडल के बीच युद्ध के बाद पहली बार प्रत्यक्ष वार्ता होगी। मगर लेबनान पर इजरायली हमले से ईरान संशय में है। बुधवार को ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से फोन पर बात की। दोनों ने लेबनान में इजरायल के कथित युद्धविराम पर बातचीत की। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शुक्रवार को बातचीत से पहले लेबनान पर इजरायली हमले वार्ता को बेपटरी कर सकते हैं।

पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि युद्धविराम अमेरिका और ईरान के बीच हुआ है। अमेरिका के कहने पर इजरायल ने हमलों को टाला है। पाकिस्तान और इजरायल के बीच कोई बातचीत नहीं होती है। दोनों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं है। ऐसे में अगर कोई समझौता अमेरिका के साथ हुआ है तो जरूरी नहीं है कि इजरायल भी उसका का पालन करे। इस स्थिति में पाकिस्तान के सामने ईरान को यह यकीन दिलाने की सबसे बड़ी चुनौती होगी कि इजरायल अब उस पर हमला नहीं करेगा।

 

यह भी पढ़ें: डोनाल्ड ट्रंप ईरान को उजाड़ने चले थे, पाकिस्तान ने बचा लिया, कैसे? इनसाइड स्टोरी

तो इजरायल फेर देगा उम्मीदों पर पानी

पाकिस्तान को भी इजरायल पर भरोसा नहीं है। मंगलवार को ट्रंप ने रात आठ बजे तक ईरान के लिए समय सीमा तय की थी। मगर इजरायल की सेना ने दिन में ही ईरान के रेलवे लाइन और पुलों पर बमबारी कर दी। इससे भड़के पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने इजरायल पर अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम बातचीत में मदद करने की इस्लामाबाद की पहल को बिगाड़ने का आरोप लगाया। डार ने कहा कि जब दोनों पक्ष बातचीत के लिए बैठने को तैयार हैं, तब इजरायल तेहरान पर हमला कर रहा है।

पाकिस्तान से पहले जिन्होंने मध्यस्थता की, उनके साथ क्या हुआ?

पिछले साल जून महीने में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों की जंग चली। अमेरिका के कहने पर कतर ने ईरान से बातचीत की और दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम करवाया। खास बात यह है कि इस मामले में भी कतर और इजरायल के बीच सीधे कोई बातचीत नहीं हुई थी। वार्ता अमेरिका के माध्यम से चल रही थी। तीन महीने बाद इजरायल ने 9 सितंबर को कतर की राजधानी दोहा पर ही मिसाइल से हमला कर दिया। यह हमला तब किया गया, जब गाजा युद्ध के वार्ताकार अमेरिका के कहने पर दोहा पहुंचे थे, ताकि युद्धविराम करवाया जा सके।


ओमान ने फरवरी महीने में अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की। कई दौर की मीटिंग चली। बातचीत अंतिम चरण में थी। दो मार्च तक ईरान को समय मिला था। मगर 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने हमला कर दिया। ओमान ने इस हमले को धोखे के तौर पर देखा। उसका कहना था कि इजरायल और अमेरिका ने जल्दबाजी में युद्ध शुरू कर दिया। ईरान और ओमान को गुमराह किया।

 

ईरान भी कह चुका है कि उसने दो बार बातचीत की पहल की। दोनों बार ही धोखा मिला। अब पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा जोखिम बातचीत को सफल बनाने की है। अगर इजरायल दोबारा हमला करता है तो पाकिस्तान की शांतिदूत वाली इमेज को बड़ा झटका लगेगा। ईरान भी इसे धोखे के तौर पर लेगा। 

 


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