एथेनॉल के ये 3 बादशाह देश कैसे बदल रहे हैं दुनिया की तेल नीतियां?
अमेरिका, ब्राजील और भारत दुनिया के ऐसे 3 देश हैं, जहां से 85 फीसदी एथेनॉल निकलता है। तीनों देशों की एथेनॉल नीतियां कितनी अलग हैं, आइए समझते हैं।

असम एथेनॉल प्लांट। Photo Credit: PTI
भारत में E20 एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर हंगामा बरपा है। एक बड़ा वर्ग यह दावा कर रहा है कि ईथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से उनकी गाड़ियां खराब हो रही हैं, इंजन घिस रहे हैं और कॉर्बोरेटर में कचरा फंस रहा है। यूट्यूबर मनीष कश्यप ने केंद्रीय परिवहन मंत्री
नितिन गडकरी
के खिलाफ एथेनॉल को लेकर मोर्चा खोल दिया है। एक दिग्गज कार कंपनी के अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि पहले अगर 100 पेट्रोल गाड़ियां बिकती थीं तो 10 या 11 इलेक्ट्रिक व्हीकल बिक पाता था, अब 40 गाड़ियां बिक जा रही हैं। उनका कहना है कि एथेनॉल को लेकर लोगों की आशंकाएं इतनी बढ़ गईं आते ही ग्राहक सवालों की बौछार कर रहे हैं। भारत, उन 3 बड़े देशों में शुमार हैं, जिनका एथेनॉल उत्पादन, दुनिया के उत्पादन का 85 फीसदी हिस्सा है।
भारत सरकार और दिग्गज ऑटो कंपनियों का साफ कहना है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा है। ऐसे कोई आंकड़े कंपनियों के पास नहीं हैं। भारत एथेनॉल को लेकर महत्वाकांक्षी है और ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस (GBA) का हिस्सा है। अमेरिका, ब्राजील और भारत तीन देश ऐसे हैं,जहां से 85 फीसदी एथेनॉल का उत्पादन होता है। ब्राजील ने एथेनॉल को 4 दशक पहले ही नीति तैयार की थी, अब भारत भी एथेनॉल की ओर तेजी से बढ़ा है, अमेरिका भी एथेनॉल में अपार संभवानाएं देख रहा है।
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जिन 3 देशों में सबसे ज्यादा उत्पादन है, वहां की नीतियां एथेनॉल को लेकर कैसी हैं, आइए समझते हैं-
अमेरिका की एथेनॉल नीति क्या है?
अमेरिका सरकार एथेनॉल ईंधन की पक्षधर है। अमेरिका रिन्यूएबल फ्यूल स्टैंडर्ड (RFS), E15 ब्लेंड की बिक्री और टैक्स क्रेडिट को सोचकर नीति तैयार करता है। अमेरिकी सरकार एथेनॉल उत्पादकों को टैक्स में बड़ी छूट देती है। उद्योग जगत कम कार्बन उत्सर्जन वाले एथेनॉल को और ज्यादा लाभ देने की मांग कर रहा है। अमेरिका रिन्यूएबल फ्यूल स्टैंडर्ड (RFS) कानून के हिसाब से ही एथेनॉल नीति तैयार करता है। अमेरिका में इसके लिए एनर्जी इंडिपेंडेंस एंड सिक्योरिटी एक्ट से बना कानूनी ढंचा है। अमेरका में एक तय मात्रा में रिन्यूएबल फ्यूल या कॉर्न एथेनॉल मिलाना अनिवार्य है। मार्च 2026 में EPA ने सेट-2 नाम से साल 2026 और 2027 के लिए ऐतिहासिक तौर पर सबसे ऊंचे रिन्यूएबल फ्यूल वॉल्यूम स्तर तय किए हैं।
अमेरिका ने क्या लक्ष्य तय किए हैं?
कॉर्न ग्रोवर्स और एथेनॉल उत्पादकों के लिए अमेरिकी सरकार ने पारंपरिक बायोफ्यूल का स्तर 15 अरब गैलन बनाए रखा जाएगा। 2026 में कुल रिन्यूएबल फ्यूल को 25.82 अरब गैलन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे कॉर्न किसानों और एथेनॉल कारखानों को मदद मिलेगी। गर्मी के दिनों में पहले अमेरिका E15 पेट्रोल को रोकता था, लेकिन मार्च 2026 में EPA ने पूरे देश में E15 बेचने की छूट दे दी। अब 1 मई 2026 से ज्यादातर राज्यों में साल भर E15 उपलब्ध है। संसद के निचले सदन ने भी इसे स्थायी बनाने के लिए बिल पास किया है। अमेरिकी सरकार का कहना है कि इन नीतियों से अमेरिका विदेशी तेल पर निर्भरता कम करेगा। रोजाना करीब 3 लाख बैरल तेल आयात घटेगा, ग्रामीण इलाकों को 10 अरब डॉलर से ज्यादा का फायदा होगा और एक लाख से अधिक नई नौकरियां पैदा होंगी।
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ब्राजील की एथेनॉल नीति क्या है?
ब्राजील दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक देश है। ब्राजील ने 1975 में ही वैकल्पिक ईंधन की नीति तैयार की थी। तब ब्राजील में तेल संकट की स्थिति पैदा हुई थी। ब्राजील की यह नीति पेट्रोल में एक तय प्रतिशत एथेनॉल मिलाना अनिवार्य करती है। साल 2015 में इसे 27 फीसदी तक बढ़ा दिया था। जून 2025 में सरकार ने घोषणा की कि 1 अगस्त 2025 से यह बढ़कर 30 फीसीदी हो जाएगा। ब्राजील, डीजल में भी बायोडीजल ब्लेंड की इजाजत देता है, जिसके तहत 14 से 15 फीसदी है। अप्रैल 2026 में, मध्य-पूर्व युद्ध की वजह से तेल की बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए माइंस एंड एनर्जी मंत्रालय ने ब्लेंड को 30 फीसदी से बढ़ाकर 32 फीसदी करने की योजना की घोषणा की। 'फ्यूल ऑफ द फ्युचर' नीति के तहत ब्राजील 35 फीसदी तक जा सकता है।
ब्राजील ने डीजल में बायोडीजल की मात्रा 14 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दी जाएगी, जिसे B15 कहते हैं। सरकार का मकसद है कि देश में पेट्रोल का आयात पूरी तरह बंद हो जाए। इससे प्रदूषण भी कम होगा, ईंधन की कीमतें घटेंगी और अपने देश के बायोफ्यूल बनाने वाले कंपनियों को फायदा होगा। इस नई नीति से ब्राजील में हर साल करीब 70 करोड़ लीटर पेट्रोल अतिरिक्त बच जाएगा, जिसे विदेश में निर्यात किया जा सकेगा।
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ब्राजील में E30 लागू करने से 10 अरब रियाल का निवेश आएगा और 50,000 से ज्यादा नई नौकरियां पैदा होंगी। B15 के कारण सोयाबीन मिलों और क्रशिंग यूनिट्स में 5 अरब रियाल का निवेश होगा और 4,000 से अधिक नौकरियां पैदा हो सकती हैं। सरकार ने पहले टेस्ट करवाए थे। E30 और B15 दोनों गाड़ियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं। इससे गाड़ियों या आम लोगों को कोई नुकसान नहीं होगा। ब्राजील एथनॉल को 35 तक बढ़ा सकता है।
भारत की एथेनॉल नीति क्या है?
भारत सरकार एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ा रही है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने नए हंगामों पर सफाई पेश की है। यह कार्यक्रम नया नहीं है, बल्कि करीब दो दशक पुरानी योजना का हिस्सा है। भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत 2001 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी। 2004 में इसे औपचारिक रूप दिया गया। 2006 में कुछ राज्यों में 5 प्रतिशत मिश्रण शुरू हुआ।
साल 2013 में नीति बनाई गई, लेकिन शुरू में सिर्फ गन्ने पर निर्भरता के कारण मिश्रण 1.5 फीसदी तक ही पहुंच पाया। 2018 में सरकार ने कच्चे माल का दायरा बढ़ाया और मक्का, अतिरिक्त अनाज को भी शामिल किया। 2021 में नीति आयोग ने रोडमैप जारी किया और तेल कंपनियों ने निवेश को बढ़ावा दिया। इसी तैयारी के बल पर भारत ने तेज प्रगति की।
2020-21 में मिश्रण 8.1 फीसीद था, जो 2021-22 में 10 फीसदी हो गया। 2024-25 में यह 19.2 फीसदी पहुंच गया और 2025-26 में 20 फीसदी का लक्ष्य हासिल हो रहा है। पहले 10 फीसदी मिश्रण के लिए 500-600 करोड़ लीटर एथेनॉल चाहिए था, अब उत्पादन क्षमता 1200 करोड़ लीटर सालाना हो गई है।
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भारत की गाड़ियों पर असर क्या हो रहा है?
मंत्रालय के अनुसार E20 एथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए वाहन कंपनियों से शुरुआत से सलाह ली गई। इंजन, ईंधन सिस्टम और अन्य पार्ट्स की पूरी जांच के बाद इसे लागू किया गया। कुछ पुराने वाहनों में 3-5 प्रतिशथ तक माइलेज कम हो सकता है, लेकिन ड्राइविंग स्टाइल, टायर प्रेशर और रखरखाव पर भी यह निर्भर करता है।
E20 के फायदे क्या हैं?
E20 की तारीफ में ऑटो एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये बेहतर ऑक्टेन नंबर, स्मूद एक्सेलरेशन, कम नॉकिंग, साफ इंजन और कम प्रदूषण फैलाते हैं। मारुति सुजुकी ने 2.84 करोड़ कारों की सर्विस में पाया कि E20 से पुराने वाहनों को कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ। सभी ईंधन BIS मानकों के अनुसार जांचे जाते हैं। जब कच्चा तेल सस्ता हो तो E20 महंगा पड़ सकता है, लेकिन जब तेल 120-130 डॉलर प्रति बैरल हो जाए तो यह सस्ता साबित होता है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि पेट्रोल का 20 फीसदी हिस्सा अब घरेलू एथेनॉल से आता है, जो विदेशी तेल की कीमतों और युद्ध से प्रभावित नहीं होता। इससे भारत में पेट्रोल की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर रहीं। 2022 से 2026 तक भारत में पेट्रोल की कीमत में सिर्फ 5.58% बढ़ोतरी हुई, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में 35-40% से ज्यादा बढ़ोतरी हुई।
किन देशों को एथेनॉल नीति न होने की कीमत चुकानी पड़ी?
केंद्र सरकार ने एथेनॉल पर कहा है कि भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की नीति ने पेट्रोल की कीमतों को काफी हद तक स्थिर रखा है। जून 2022 से जून 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पेट्रोल की कीमत करीब 5.58% बढ़ी है, जबकि पड़ोसी देशों और यूरोपीय देशों में इसकी तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 39.77%, बांग्लादेश में 42.69% और श्रीलंका में 36.66% बढ़ गई। नेपाल में भी 20.35% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे विकसित देशों में भी कीमतें 17% से 19% तक बढ़ीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से भारत में पेट्रोल की कीमतें अन्य देशों की तुलना में बहुत कम बढ़ीं, जिससे आम लोगों को राहत मिली। जून 2022 में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 96.72 रुपये प्रति लीटर थी, जो जून 2026 में बढ़कर सिर्फ 102.12 रुपये प्रति लीटर हो गई। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि भारत की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रित करने में सफल रही है।
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भारत को एथेनॉल से क्या मिला है?
केंद्र सरकार का दावा है कि 2014-15 से अब तक इस कार्यक्रम से से 1.97 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचत हुई है। भारत ने 316 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल कम आयात किया है। 952 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन में कमी आई है और 1.66 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा सीधा भुगतान किसानों को किया है। सरकार का कहना है कि किसान अब सिर्फ अन्नदाता नहीं, बल्कि ऊर्जादाता भी बन रहे हैं।
दुनिया में एथेनॉल को लेकर कवायद हो रही है?
अमेरिका में E10 और E15 पर जोर दिया जा रहा है। ब्राजील में E27 मिश्रण पर काम चल रहा है, इसे बढ़ाकर 35 फीसदी तक जाने की तैयारी है। जापान, कनाडा, थाईलैंड समेत कई देश एथेनॉल मिश्रण को मंजूरी दे चुके हैं। एनुअल वर्ल्ड फ्यूल एथेनॉल प्रोडक्शन के आंकड़े बताते हैं कि भारत, ब्राजील और अमेरिका मिलकर दुनिया के 85 फीसदी एथेनॉल बाजार पर काबिज हैं।
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कैसे इन नीतियों का दुनिया पर असर हो रहा है?
अमेरिका जहां अपने 'रिन्यूएबल फ्यूल स्टैंडर्ड' और मक्के से बने एथेनॉल (E15) के जरिए पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम कर रहा है। ब्राजील गन्ने से बने एथेनॉल में इतिहास रच रहा है, E27 से E35 प्रतिशत तक जाने की अनिवार्य ब्लेंडिंग नीति तैयार कर रहा है। भारत जोर दे रहा है, अब दुनिया में 'फ्लेक्स-फ्यूल' कारें सफल हो रहीं हैं। ये गाड़ियां ऐसी होती हैं, जिनका इंजन पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग मिश्रण पर चल सकता है।
सिंगापुर खुद बड़ा उत्पादक न होते हुए भी टैक्स छूट और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर एशिया का सबसे बड़ा बायोफ्यूल और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) ट्रेडिंग बन रहा है। दुनिया के कई देश अब कार्बन उत्सर्जन घटाने और तेल आयात कम करने के लिए इन्हीं देशों के ब्लेंडिंग और इंसेंटिव मॉडल को अपनी राष्ट्रीय नीतियों में अपनाने की इच्छा जता चुके हैं। भारत में अभी इस नीति को लेकर हंगामा बरपा है लेकिन दुनिया ब्राजील और अमेरिका के मॉडल से प्रभावित हो रही है।
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