जन्म के समय बच्चे का वजन उसके भ्रूण विकास का एक महत्वपूर्ण संकेतक होता है। जन्म के समय 2500 ग्राम से कम वजन को कम जन्म वजन कहा जाता है, जो अक्सर मां के कुपोषण, बीमारियों और गर्भावस्था के दौरान सही स्वास्थ्य देखभाल की कमी से जुड़ा होता है। हर मां अपने बच्चे के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य चाहती है लेकिन हवा में मौजूद बेहद बारीक प्रदूषण कण बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण से जुड़ी समस्याएं जन्म से पहले ही शुरू हो जाती हैं और इसका असर जीवन भर बना रह सकता है।
कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का वायु प्रदूषण के संपर्क में आना न सिर्फ उनकी सेहत को प्रभावित करता है, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालता है। इसके परिणामस्वरूप जन्म के समय बच्चों में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं और विकृतियां देखने को मिल सकती हैं।
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रिसर्च में सामने आए तथ्य
जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, भारत में ओजोन प्रदूषण के संपर्क में आने से नवजात शिशुओं के जन्म वजन में गंभीर कमी देखी जा रही है। रिसर्च बताती है कि बीते कुछ वर्षों में गर्भावस्था के दौरान ओजोन के संपर्क में रहीं महिलाओं के बच्चों का वजन औसतन 54.6 ग्राम कम पाया गया। वहीं, 2008 में यह कमी 57.9 ग्राम दर्ज की गई थी।
निम्न और मध्यम आय वाले देशों में किए गए इस अध्ययन से यह भी सामने आया है कि ओजोन प्रदूषण के संपर्क में रहने वाली महिलाएं, साफ हवा में सांस लेने वाली महिलाओं की तुलना में कम वजन वाले बच्चों को जन्म देती हैं। यदि किसी नवजात का वजन जन्म के समय 2.5 किलोग्राम से कम होता है, तो इसे गर्भावस्था के दौरान मां के खराब स्वास्थ्य या पोषण की कमी से जोड़कर देखा जाता है।
इस अध्ययन में कुल 123 देशों को शामिल किया गया था। इन देशों में जन्म के समय शिशुओं के वजन में औसतन 43.8 ग्राम की कमी दर्ज की गई। सबसे अधिक असर दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में देखा गया, जिसमें भारत की स्थिति सबसे खराब रही, जहां बच्चों का औसतन 54.6 ग्राम वजन रहा।
बच्चों को इससे होने वाले नुकसान
जुलाई 2025 में यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा की प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया कि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में ओजोन के संपर्क में आने से बच्चे में बौद्धिक विकलांगता का खतरा 55.3% तक बढ़ जाता है। इसका कारण यह है कि इस चरण में शिशु का मस्तिष्क प्रति मिनट लगभग 2.5 लाख न्यूरॉन्स बनाता है और ओजोन प्रदूषण इस संवेदनशील प्रक्रिया में बाधा डालता है।
नवंबर 2025 में PMC (PubMed Central) पर प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, ओजोन के संपर्क में रहने वाली महिलाओं में समय से पहले प्रसव का खतरा 24% और बच्चों के कम वजन के साथ जन्म लेने का जोखिम 29% तक बढ़ जाता है। ओजोन मां के शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करता है, जिससे सूजन होती है और भ्रूण के विकास पर असर पड़ता है।
ओजोन परत के पतले होने से हानिकारक UV-B किरणें सीधे पृथ्वी तक पहुंचती हैं। MDPI की चीन में 2024-25 के दौरान किए गए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के शुरुआती दौर में अधिक ओजोन के संपर्क से जन्मजात हृदय रोग का खतरा 26% तक बढ़ जाता है। UV-B किरणें डीएनए को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे भ्रूण में विकृतियों की आशंका बढ़ जाती है।
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द लैंसेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते तापमान और रेडिएशन के कारण गर्भवती महिलाओं में हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है, जिससे समय से पहले डिलीवरी की संभावना 10 से 15% तक बढ़ जाती है।
रिसर्च में यह भी बताया गया है कि यदि कोई महिला पूरी गर्भावस्था के दौरान लगातार ओजोन के संपर्क में रहती है, तो ओजोन के हर 10 पार्ट्स प्रति बिलियन बढ़ने पर बच्चे का वजन 4.6 से 27.3 ग्राम तक कम हो सकता है। ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नीतियां बनाई जाएं तो इससे नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
बचाव के उपाय
- दोपहर 12 से 4 बजे के बीच सीधी धूप में निकलने से बचें।
- धूप में निकलते समय UV-प्रोटेक्टिव कपड़े और छाते का प्रयोग करें।
- फोलेट और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर आहार लें ताकि रेडिएशन के प्रभाव को कम किया जा सके।