आपका बच्चा भी कंपटीशन में भाग लेने से डरता है, ये तरीके अपनाएं पेरेंट्स
कुछ बच्चे अक्सर नई चीजों को करने से पहले डर जाते हैं। ऐसे में बच्चों के मनोबल को बनाए रखना बहुत जरूरी है ताकि वे नई चीजें करने को प्रेरित रहे।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Freepik
अगर आपका बच्चा कभी स्कूल के खेल दिवस या दौड़ प्रतियोगिता वाले दिन सुबह अड़ियल रवैया अपनाने लगता है, या कक्षा के सामने बोलने से मना कर देता है। तो आप अकेले नहीं हैं जो इस तरह की चिंता से जूझ रहे हैं। कुछ बच्चों में ऐसे अवसर गहरी चिंता और घबराहट पैदा कर देते हैं। उनके मन में सवाल उठते हैं कि अगर मैं सबसे धीमा निकला तो? अगर सब मुझे ही देख रहे हों तो? अगर मुझसे गलती हो गई तो?
माता-पिता के लिए ऐसे समय में यह समझना मुश्किल हो सकता है कि क्या किया जाए? बहुत ज्यादा दबाव डालने पर सुबह का माहौल तनावपूर्ण हो सकता है, जबकि बच्चे को छूट देने पर यह चिंता सताती है कि कहीं उसे चुनौतियों से बच निकलना तो नहीं सिखा रहे। ऐसे में क्या कभी बच्चे की इच्छा के अनुसार चलना ठीक है? और अगली बार उसे कोशिश करने का बेहतर अवसर कैसे दिया जाए? डर का सामना करना क्यों जरूरी है?
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बच्चों को क्यों लगता है डर?
जब हम किसी ऐसी चीज से बचते हैं जिससे हमें डर लगता है, तो तुरंत राहत महसूस होती है। यह राहत बहुत असरदार होती है और हमारे मस्तिष्क को यह संदेश देती है कि बचना कारगर रहा। समय के साथ डर और बढ़ जाता है और उससे बचने की प्रवृत्ति भी मजबूत हो जाती है। यह केवल बच्चों के साथ नहीं, बल्कि हम सभी के साथ होता है इसीलिए सामान्य तौर पर बच्चों के लिए यह बेहतर होता है कि वे अपने डर का सामना जल्द करें, उससे पहले कि उससे बचने की आदत बन जाए लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बच्चे को उसकी घबराहट के बावजूद जबरन किसी स्थिति में धकेल दिया जाए। अत्यधिक दबाव उसके मन में यह धारणा और मजबूत कर सकता है कि स्थिति वास्तव में खतरनाक है। इसलिए बच्चे को डर का सामना करने में मदद करना जरूरी है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके डर की वजह क्या है?
बच्चे को समझाएं डर से कैसे करें मुकाबला?
सबसे पहले समझिए कि आखिर क्या है परेशानी। अगर आपको पहले से अंदेशा है कि कोई मुश्किल दिन आने वाला है, तो बच्चे से पहले ही उसकी भावनाओं के बारे में बात करें। धीरे-धीरे और सहज तरीके से यह समझने की कोशिश करें कि वह वास्तव में किस बात का विरोध कर रहा है। क्या पिछली बार कुछ बुरा हुआ था? क्या दोस्तों से जुड़ी कोई परेशानी है? क्या उसे असफल होने, दूसरों के फैसले का सामना करने या मजाक उड़ाए जाने का डर है? आप कह सकते हैं, ‘जब पापा ने खेल दिवस का जिक्र किया था, तब मैंने देखा कि तुम अचानक चुप हो गए थे।
क्या कोई बात तुम्हें परेशान कर रही है?’ बच्चे हमेशा तुरंत अपने मन की बात शब्दों में नहीं कह पाते, इसलिए उन्हें समय दें। अक्सर आमने-सामने बैठकर बात करने के बजाय सोने से पहले, टहलते समय या साथ गाड़ी में सफर करते हुए ऐसी बातचीत करना ज्यादा आसान होता है। आंखों में सीधा संपर्क न होने पर बच्चों को कठिन भावनाओं के बारे में सोचना और बताना अपेक्षाकृत आसान लगता है। कोशिश करें कि तुरंत यह न कहें, ‘सब ठीक हो जाएगा’ या ‘चिंता की कोई बात नहीं है’। बच्चे को यह लग सकता है कि उसकी भावनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। कई बार सिर्फ ध्यान से सुनना ही बच्चे को खुलकर बात करने में मदद करता है। उसकी भावना को स्वीकार करें।
जब आपको स्थिति की कुछ समझ हो जाए, तो समाधान सुझाने से पहले बच्चे को यह महसूस कराएं कि उसकी भावना स्वाभाविक है। जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात सुनी गई है, तब वे समाधान के बारे में सोचने के लिए ज्यादा तैयार होते हैं। आप कह सकते हैं, ‘मैं समझ सकता हूं कि यह बात अभी तुम्हें बहुत बड़ी लग रही है। ऐसे में चिंतित होना बिल्कुल स्वाभाविक है।’ इसके बाद कुछ क्षण चुप रहें। संभव है बच्चा रोने लगे। कई बार डर और चिंता को समझने तथा स्वीकार करने की प्रक्रिया का यह भी हिस्सा होता है। यही वह समय होता है जब माता-पिता का मन बच्चे को तुरंत बचाने या ढांढस बंधाने का करता है। लेकिन इसके बजाय उसके साथ बने रहने की कोशिश करें। आप उसे गले लगाकर बस इतना कह सकते हैं, ‘यह सचमुच मुश्किल लग रहा है।’ फिर मिलकर योजना बनाएं। अब बच्चे की मदद करें ताकि वह सोच सके कि किसी गतिविधि में शामिल होने का ऐसा कौन-सा तरीका हो सकता है जो उसे सुरक्षित और सहज महसूस कराए। आप पूछ सकते हैं, ‘तुम्हें क्या लगता है, वहां जाना थोड़ा आसान कैसे हो सकता है? ऐसा कौन-सा छोटा कदम है जिसे तुम संभाल सकते हो?' संभव है वह दौड़ने के बजाय क्रॉस-कंट्री में पैदल चलना चाहे, या पूरी कक्षा के सामने बोलने से पहले अपना भाषण किसी भरोसेमंद शिक्षक को सुनाना चाहे। कभी-कभी शुरुआत में केवल कार्यक्रम में उपस्थित रहना और दूसरों को देखना भी एक अच्छा कदम हो सकता है।
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बच्चों की मन की बात जानने की कोशिश करें
कुछ मामलों में शिक्षक से भी बात करना उपयोगी रहता है, ताकि स्कूल और घर दोनों जगह एक जैसी योजना पर काम हो सके। उद्देश्य यह नहीं है कि बच्चा शानदार प्रदर्शन करे, बल्कि यह है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार भागीदारी कर सके। जल्दबाजी या दबाव से बचें। अगर बच्चा कहे, ‘मुझे नहीं पता’, तो यह स्वीकार करें कि चिंता की स्थिति में सोचना मुश्किल होता है। कई बार थोड़ी देर का विराम लेकर बाद में विकल्पों पर चर्चा करना बेहतर रहता है। कार्यक्रम वाले दिन क्या करें? उस दिन शांत भाव से उसे पहले हुई बातचीत और योजना की याद दिलाएं। आप कह सकते हैं, ‘चलने का समय हो गया है। मुझे पता है कि यह आसान नहीं है और तुम्हारे मन में अब भी वहां जाने के लिए मना कर रहा है।’
अगर बच्चा परेशान हो जाए, तो उसके साथ बने रहें और उसकी भावनाओं को समझें। आपको हर समस्या का तुरंत समाधान ढूंढ़ने या उसे जल्दी संभालने की जरूरत नहीं है। पीठ पर हल्का हाथ रखना या सिर्फ इतना कहना, ‘मैं तुम्हारे साथ हूं’, अक्सर काफी होता है। बच्चों को कई बार अपने डर को महसूस करने की जरूरत होती है, तभी वे उससे आगे बढ़ पाते हैं। यहीं से साहस पैदा होता है। साहस का मतलब डर का न होना नहीं है, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ पाना है। जब बच्चे यह अनुभव करते हैं कि वे अपनी चिंताओं के साथ भी किसी गतिविधि में हिस्सा ले सकते हैं, तो चुनौतियों का सामना करने की उनकी क्षमता पर विश्वास बढ़ने लगता है। क्या कभी बच्चे की इच्छा के अनुसार चलना ठीक है? कुछ परिस्थितियों में हां। अगर बच्चा बहुत ज्यादा परेशान है, तो कभी-कभी एक कदम पीछे हटना उसे दोबारा नियंत्रण महसूस करने में मदद कर सकता है। किसी एक अवसर पर भाग न लेना कोई बड़ी समस्या नहीं है। बच्चों को कुछ चीजें पसंद न हों, यह भी स्वाभाविक है। चिंता तब होती है जब यह एक आदत बन जाए।
बच्चों की तुलना न करें
जब बच्चा बार-बार बचने लगे या उन गतिविधियों से भी दूर रहने लगे जिन्हें वह वास्तव में करना चाहता है। अगर वह परेशान किए जाने (बुलिंग) का डर महसूस कर रहा है तो हो सकता है उसके साथ कुछ बुरा अनुभव रहा हो, तो किसी मनोवैज्ञानिक से परामर्श लेना उपयोगी हो सकता है। उपलब्धि और भागीदारी को लेकर घर में कैसी सोच विकसित करें। बच्चे को किसी गतिविधि में भाग लेने के लिए प्रेरित करने वाली अधिकांश बातें कार्यक्रम वाले दिन नहीं, बल्कि घर की रोजमर्रा की बातचीत में होनी चाहिए। यह धीरे-धीरे ऐसी सोच विकसित करने का विषय है जिसमें बच्चा समझे कि हर बार जीतना, सबसे बेहतर होना या बिल्कुल सही करना जरूरी नहीं है। कुछ बातें बार-बार दोहराना उपयोगी होता है। पहली बात, हर व्यक्ति का शरीर और मस्तिष्क अलग होता है। कुछ काम किसी को आसानी से आते हैं, तो किसी को नहीं। अलग होना सामान्य बात है और इसकी तुलना करने के बजाय इसकी सराहना की जानी चाहिए। आप कह सकते हैं, ‘आज मैंने अपने सहकर्मी पेनी से बहुत कुछ सीखा। उन्हें पर्यावरण के बारे में बहुत जानकारी है।’
दूसरी बात, कौशल जन्मजात नहीं बल्कि अभ्यास का परिणाम होता है। बच्चे अक्सर सोचते हैं कि खेल, संगीत या मंच पर प्रदर्शन जैसी चीजें केवल प्रतिभा पर निर्भर हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि क्षमता अभ्यास से विकसित होती है। जो बच्चा रोज खेलता है, उसके लिए खेल दिवस पर दौड़ना आसान होगा, क्योंकि उसने उसके लिए मेहनत की है, केवल इसलिए नहीं कि वह जन्म से ही ऐसा था।तीसरी बात, बच्चों को दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने पुराने प्रदर्शन की तुलना खुद से करना सिखाएं।
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उदाहरण के लिए, ‘पिछले सप्ताह तुम 20 मीटर तैर पाए थे, और अब लगभग 30 मीटर तैर रहे हो।’ चौथी बात, कठिन काम पर डटे रहना ही वास्तविक उपलब्धि है। जो काम पहले से आता हो, उसे करना आसान होता है। लेकिन जो काम कठिन लगता है, उसमें लगे रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है और जब बच्चा ऐसा करे तो उसकी सराहना की जानी चाहिए। लक्ष्य निडर बच्चा बनाना नहीं है। वास्तविक लक्ष्य बच्चे में ऐसे गुण विकसित करना है जो धीरे-धीरे और छोटे-छोटे कदमों के माध्यम से यह सीख सके कि वह कठिन काम कर सकता है, और यह कि उसके बगल में खड़े बच्चे से अलग होना जीवन का एक सामान्य और स्वीकार्य हिस्सा है।
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