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नमक-चीनी तक में माइक्रोप्लास्टिक, खतरा सामने है, अब भारत क्या करेगा?

प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों पर पाबंदी और जागरूकता के बावजूद भारत में 'माइक्रोप्लास्टिक' का खतरा लगातार बढ़ रहा है। नदियों में तो यह बहुत पहले ही मौजूद थे अब हमारे खाने जैसे नमक और चीनी तक में घुल चुके हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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भारत ने बहुत पहले ही सिंगल-यूज प्लास्टिक पर बैन लगा दिया है। साथ ही कचरा प्रबंधन के नियम कड़े कर दिए हैं। इन सब के बावजूद प्लास्टिक हमारे लाइफस्टाइल में इतने अंदर तक घूस चुका है कि इन सब नियमों को पीछे छोड़ रहा है। इसे हम 'माइक्रोप्लास्टिक' के नाम से जानते हैं। नदी, झील और पीने के पानी और हवा तक में इसके मौजूदगी के सबूत है। इन सब से ऊपर हमारे रोजमर्रा के चीज जैसे नमक और चीनी तक में इसके कण मौजूद है। इसकी पुष्टि एक रिसर्च में की गई है।

 

हम सभी को पता है कि माइक्रोप्लास्टिक किसी एक चीज या कचरे से नहीं बनता। यह कई रास्तों से होकर हमारे पर्यावरण में पहुंचता है। प्लास्टिक कचरा बनने से पहले ही, इस्तेमाल के दौरान ही हवा और पानी में जहर घोलने लगता है। 

 

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रिसर्च में क्या मिला?

रिसर्च में नमक के 10 और चीनी के 5 ब्रांड की जांच की गई। हैरानी की बात है कि हर सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। खासकर आयोडिन-युक्त पैक्ड नमक में इनकी मात्रा सबसे ज्यादा पाई गई। नमक और चीनी में इसकी मौजूदगी हमारे लिए चिंता का विषय है। 

 

प्लास्टिक की बोतल को कंट्रोल करना काफी आसान है। इसे बैन किया जा सकता है। इसके लिए रीसाइक्लिंग का टारगेट तय किया जा सकता है। इन सभी में माइक्रोप्लास्टिक सबसे अलग है। ये कोई एक प्रोडक्ट या कचरे का एक ही तरह का स्रोत नहीं हैं। ये कई तरीकों से बनने वाले कणों की एक कैटेगरी हैं।

मौजूदा नियम क्यों पड़ रहे हैं कमजोर?

रीसाइक्लिंग और बैन जैसे कदम नया प्लास्टिक कचरा कम तो कर सकते हैं लेकिन कपड़े धोने या गाड़ी चलाने से निकलने वाले प्लास्टिक कणों को रोकना बहुत मुश्किल है। सभी के जांच करने का तरीका अलग-अलग है। 

 

हमें यह समझना होगा जब तक पूरे देश में माइक्रोप्लास्टिक पर तय पैमाना नहीं होगा तब तक कोई ठोस नियम नहीं बना सकता है। यह समस्या किसी एक मंत्रालय की नहीं है। पीने के पानी का मामला जल मंत्रालय का है, नमक-चीनी का मामला खाद्य सुरक्षा विभाग (FSSAI) का है। नदियों-हवा का मामला पर्यावरण मंत्रालय का है। इन सभी को मिलकर काम करना होगा तभी कोई परिणाम निकल सकता है। 

 

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बदलाव की शुरुआत

राहत की बात यह है कि देश में कुछ स्तरों पर नए कदम उठाए जा रहे हैं। FSSAI और CSIR जैसे संस्थान मिलकर खाने-पीने की चीजों में माइक्रोप्लास्टिक की जांच का सही तरीका खोज रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और मद्रास हाईकोर्ट जैसे न्यायालयों ने भी इस पर चिंता जताई है। कोर्ट ने जिम्मेदार संगठनों को चेतावनी लेबल लगाने जैसे सुझाव दिए हैं। 

 

राहत की बात है कि एक नई तकनीक सामने आई है जिसमें इमली के बीज के पाउडर का इस्तेमाल करके पानी से माइक्रोप्लास्टिक खींचा जा सकता है। इस तकनीक को 'प्लास-स्टिक' कहा जाता है।  सवाल यह है कि केवल पानी से इन कणों को निकाल देना काफी नहीं है। पानी साफ करने के बाद बचा हुआ प्लास्टिक कचरा कहां फेंका जाएगा, यह समझना भी बहुत जरूरी है।   

आगे का रास्ता क्या है?

हमें समझना होगा कि किसी काम को करने के लिए किसी कोर्ट ऑर्डर, फिल्टर या लेबल पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। देश को एक ऐसे नए और मजबूत ढांचे की जरूरत है जो माइक्रोप्लास्टिक की नाप-जोख का एक राष्ट्रीय पैमाना तय करे।

जैसे कपड़ों और टायरों जैसे स्रोतों से निकलने वाले छोटे कणों को शुरुआत में ही रोके। इसके साथ ही सभी सरकारी विभागों को एक साथ लाकर काम कराए।

 

नदियों और पानी में पहले से मौजूद कचरे को साफ करने के लिए कई मौजूदा स्किम कार्यरत हैं। सरकार और कई संगठनों की ओर से जागरूकता बढ़ाई जा रही है लेकिन असली परिणाम तब देखने को मिलेगा जब वास्तव में हम इसे जमीनी स्तर पर रोक पाएं। 

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