देश के करोड़ों छोटे और मध्यम कारोबारियों (MSME यानी माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज) के करीब 8.1 लाख करोड़ रुपये का भुगतान अटका हुआ है। इसकी वजह से कई कारोबारियों की रोजमर्रा के कामकाज के लिए जरूरी पूंजी फंस जाती है और उन्हें कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। कारोबारियों की इसी तरह की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 लेकर आई है। यह बिल संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा से पास भी हो चुका है।
इस बिल का मकसद है कि खरीदार कंपनियां समय पर कारोबारियों का भुगतान करें और अगर देरी हो तो उसकी जवाबदेही तय हो, ताकि एमएसएमई के पास पैसों की तंगी न रहे और उनका कामकाज सुचारू रूप से चलता रहे। इस विधेयक में एमएसएमई कारोबारियों की मदद के लिए कई प्रावधान रखे गए हैं। पुराने कानून में समय पर भुगतान सुनिश्चित कराने की व्यवस्था काफी कमजोर थी।
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देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है MSME
एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम कारोबार देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। आंकड़ों की मानें तो देश की कुल कमाई (जीडीपी) में इसका हिस्सा करीब 31.1 प्रतिशत है, विनिर्माण उत्पादन (मशीनों या हाथों की मदद से कच्चे माल को उपयोगी और नई चीजों में बदलना) में इसका हिस्सा 35.4 प्रतिशत है। इसके अलावा, देश से बाहर भेजे जाने वाले सामान (निर्यात) में इसका हिस्सा 48.58 प्रतिशत है। इस सेक्टर से करीब 40 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है, और पोर्टल पर रजिस्टर्ड MSME की संख्या 1 अप्रैल 2023 को 1.65 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 9.16 करोड़ हो चुकी है।
समय पर पैसा नहीं चुकाती कंपनियां
इस सेक्टर में सबसे बड़ी दिक्कत जो सामने आती है वो है है भुगतान में देरी। कई बार बड़ी कंपनियां एमएसएमई से सामान या सेवा तो ले लेती हैं, पर समय पर पैसा नहीं चुकाती हैं। इसकी वजह से छोटे कारोबारियों की वर्किंग कैपिटल फंस जाती है और उन्हें कर्ज पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार ने एमएसएमई डेवलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 लाकर इस समस्या को दूर करने की कोशिश की है, ताकि भुगतान समय पर मिले, विवाद जल्दी सुलझें और छोटे कारोबारियों को अपने कामकाज के लिए बार-बार कर्ज न लेना पड़े।
₹8.1 लाख करोड़ के भुगतान हैं अटके
PIB की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के MSME यानी छोटे और मध्यम कारोबारियों के करीब ₹8.1 लाख करोड़ के भुगतान अटके हुए हैं। इसे MSME के सामने मौजूद बड़ी समस्याओं में से एक बताया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, MSME समाधान पोर्टल पर अब तक 2,56,892 आवेदन दर्ज हुए हैं। इनमें करीब ₹55,244.31 करोड़ के भुगतान से जुड़े मामले हैं। इसके अलावा, ऑनलाइन विवाद निवारण (ODR) पोर्टल 15 अक्टूबर 2025 को शुरू किया गया था लेकिन आठ महीने में इसके जरिए केवल 17 मामलों का निपटारा हुआ। इससे साफ पता चलता है भुगतान से जुड़े विवादों को सुलझाने की मौजूदा व्यवस्था बहुत धीमी है।
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नए बिल से क्या बदलेगा?
सरकार ने MSME कारोबारियों की इन्हीं समस्याओं से निपटने के लिए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 लाई है। यह विधेयक MSMED एक्ट, 2006 में संशोधन करता है, जिसे बने हुए करीब 20 साल पूरे हो चुके हैं। नए नियम के तहत अब सरकारी कंपनियों (CPSE) को TReDS प्लेटफॉर्म के जरिए ही MSME को भुगतान करना होगा, ताकि पैसा जल्दी मिल सके। वहीं अगर भुगतान से जुड़ा कोई केस 6 महीने से ज्यादा समय तक कोर्ट में अटका रहता है, तो अब कम से कम 50% पैसा पहले ही जारी करना होगा। मध्यस्थता को 90 दिन में और आर्बिट्रेशन के फैसले को भी 90 दिन में पूरा करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि विवाद जल्दी सुलझें।
इसके अलावा, बकाया राशि अब भू-राजस्व की तरह वसूली जाएगी, जिससे वसूलना आसान होगा। उद्यम रजिस्ट्रेशन पोर्टल को हमेशा के लिए मुफ्त और स्वैच्छिक बनाए रखा गया है। राज्य सरकारें अब एक से ज्यादा फैसिलिटेशन काउंसिल बना सकेंगी, ताकि विवाद जल्दी निपटें। इसके अलावा, गलती होने पर अब सीधे सज़ा नहीं दी जाएगी। इसके तहत पहली बार सिर्फ चेतावनी मिलेगी, बार-बार गलती दोहराने पर ही जुर्माना लगेगा।