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'पत्नी घर का काम नहीं करती,' पति ने तलाक मांगा, HC ने कहा, 'हर महीने दो 20 हजार'

पति का कहना था कि पत्नी घर के काम नहीं करती है और मां-बाप की सेवा नहीं करती है, इसलिए क्रूरता के आधार पर तलाक मिले। कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया।

AI Representation of Bombay High Court  Hearing ChatGPT

प्रतीकात्मक तस्वीर। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पत्नी की कथित क्रूरता से जुड़ी एक याचिका में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। एक शख्स ने हाई कोर्ट में पत्नी से तलाक के लिए अर्जी दी थी। तलाक में कहा गया था कि पत्नी घर के काम नहीं करती है, मां-बाप की सेवा नहीं करती है, इसलिए क्रूरता के आधार पर तलाक दिया जाए। हाई कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, वह फैसला, एक बड़े तबके को रास नहीं आ सकता है।

बॉम्बे बाई कोर्ट ने पति को ही सबक सिखा दिया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पति हर महीने अब पत्नी को 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देगा, 10 हजार रुपये, घर के किराए के तौर पर देना होगा। यह फैसला लोगों को चौका रहा है लेकिन इस फैसले के पीछे की वजह बेहद दिलचस्प है। 

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पति, पत्नी के खिलाफ अदालत क्यों गया?

यह मामला, साल 2004 का है। पति ने अदालत में याचिका दायर की। पति ने अपनी याचिका में कहा, 'पत्नी घर के काम नहीं करती है, खाना नहीं बनाती है, वह मां-बाप की इज्जत नहीं करती है, उसका व्यवहार तीखा है, वह अभिभावकों का आदर नहीं करती है, उसे खाना बनाने नहीं आता है, इन सब की वजह से मानसिक तनाव हो रहा है, यह क्रूरता है।'

कोर्ट ने कहा, 'घर के काम न करना क्रूरता नहीं'

बॉम्बे हाई कोर्ट:-
'अगर पत्नी, घर के काम नहीं कर पाती है, खाना नहीं बना पाती है, साफ सफाई नहीं कर पाती है तो यह क्रूरता नहीं है। शादी बराबरी का रिश्ता है, कोई सर्विस कॉन्ट्रेक्ट नहीं है। पत्नियां नौकर नहीं हैं।'

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी का घर के काम करने से इनकार करना क्रूरता नहीं है, न ही इसे मानसिक क्रूरता करार दिया जा सकता है। 8 मई 2026 को जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की बेंच ने यह फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने साल 2010 में बांद्रा फैमिली कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें तलाक को इजाजत दे दी गई थी और पति को गुजारा भत्ता देने से छूट मिला था। 

क्यों कोर्ट ने यह फैसला सुनाया?

साल 2004 में जब पति ने तलाक की तहरीर दी थी, तभी पत्नी ने गुजारा भत्ता मांग लिया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि साल 2010 में फैमिली कोर्ट का गुजारा भत्ता देने से इनकार करना एक 'आर्ट और क्राफ्ट क्लास' के विज्ञापन के आधार पर था। इसका कोई सबूत नहीं था कि इससे होने वाली आय, जीवन यापन के लिए पर्याप्त थी। 

हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी के 'आर्ट और क्राफ्ट' क्लास के विज्ञापन के आधार पर कहा कि कौशल का होना, कभी कभार उससे कमाई करना, नियमित आय का साधन नहीं माना जा सकता है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है यह नियमित आधार का स्रोत हो।' 

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इसलिए पति को देना होगा हर महीने 20 हजार

हाई कोर्ट ने कहा कि पति चार्टर्ड अकाउंटेंट है, उसके पास स्थिर आय का साधन है, वह गुजारा भत्ता देने में सक्षम है, इसलिए हर महीने पत्नी को 10 हजार रुपये का गुजारा भत्ता दे और कम से कम 10 हजार महीने पत्नी के आवासीय खर्चे का भत्ता दे। 

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