चुनाव आयोग पर कथित वोट चोरी, स्पेशन इंटेंसिव रिवीजन (
SIR
) को रद्द करने के साथ में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने को लेकर
कॉकरोच जनता पार्टी
(CJP), इंडिया गठबंधन और छात्रों के साथ में सामाजिक संगठन दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। गांधी जयंती (2 अक्टूबर) से शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब रुकने का नाम नहीं ले रहा है। 10 अक्टूबर को सीजेपी और 12 अक्टूबर को कांग्रेस के नेतृत्व में समूचे विपक्ष ने दिल्ली के बाराखंभा रोड से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया। इस प्रदर्शन में इतने लोग इकट्ठा हुए कि सेंट्रल दिल्ली की सड़कें पट गईं।
इस प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों की मांगे अपनी जगह हैं। मगर, इसमें वह लोग भी शामिल हैं, जो प्रदर्शन के सहारे अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। इसमें सेंट्रल दिल्ली में गोलगप्पे, भेल, शिकंजी, मसाला-पापड़, राम लड्डू, आइसक्रीम बेचने वाले छोटा-मोटा काम करने वाले दुकानदार शामिल हैं। इस प्रदर्शन में उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले विनोद नाम का आदमी भी है, जो कूड़ा बीनकर जीविकोपार्जन करता है। विनोद ने 'खबरगांव' से बात करते हुए अपने जीवन और अपने काम के बारे में बताया।

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सुबह से शाम तक प्रदर्शनस्थल पर चक्कर
प्रदर्शन में शामिल होने के लिए आने वाले लोग पानी-कोल्ड ड्रिंक पीकर बोतलें सड़कों, डस्टबीन और झाड़ियों में फेंक देते हैं। विनोद इन्हीं प्लास्टिक की बोतलों को एक बड़ी सी बोरी में इकट्ठा करते हैं। जब बोरी भर जाती है तो उसे एक दूसरी जगह पर रख जाते हैं। ऐसे करके वह प्रदर्शनस्थल पर सुबह से लेकर शाम तक चक्कर लगाते हैं, जबतक कि प्रदर्शनकारी वहां से चले नहीं जाते। क्योंकि जबतक प्रदर्शनकारी वहां रहते हैं वह पानी और कोल्ड ड्रिंक पीते रहते हैं, लोग इन प्लास्टिक की बोतलों को अपने साथ ना ले जाकर वहीं फेंक देते हैं।
प्रदर्शन के साथ चलेगी रोजी-रोटी
विनोद हमें कनॉट प्लेट के आउटर सर्कल पर जनपथ रोड के पास एक बोरी में खाली बोलतों को क्रश करके भरते हुए मिले। उन्होंने बात करते हुए बताया, 'लोग पानी पीकर जो बोलतें सड़क किनारे फेंक देते हैं, मैं उन्हीं को इकट्ठा करके बोरी में भर रहा हूं। जबतक प्रदर्शन चलेगा हमारा इससे जुगाड़ बन जाएगा और मेरी रोजी-रोटी चलती रहेगी।' विनोद ने बताया कि वह पेशेवर कूड़ा बीनने वाले नही हैं बल्कि वह दिहाड़ी मजदूर हैं। राज मिस्त्री का काम भी जानतें हैं। वह लेबर चौक पर बैठकर रोजाना काम खोजते हैं और शाम को दिहाड़ी काम खत्म करके 600-700 रुपये लेकर घर लौटते हैं।

परिवार के खाने का जुगाड़
उन्होंने बताया कि वह हमेशा दिहाड़ी मजदूरी करते हैं लेकिन जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन होता है तो वह यहां फिर से कूड़ा बीनने आ जाते हैं। विनोद ने कहा, 'यहां प्रदर्शन में वोतलों के साथ कभी-कभी खाना भी मिल जाता है। मैं दो प्लेट यहीं खाना खाता हूं और चार प्लेट पत्नी और बच्चों के लिए भी लेकर चला जाता हूं। लोग और भी प्लेट देते हैं.. मैं कहता हूं और प्लेट खाने का क्या करना है सर.. इतने में हो जाएगा।' उन्होंने बताया कि वह इससे पहले जंतर-मंतर पर जुलाई में भी बोलत बेचकर अपना घर चलाते थे।
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बोतलों को बेचकर 500-600 रुपये की कामाई
उन्होंने कहा कि यहां जितने दिन प्रदर्शन चलेगा वह यहीं रहकर प्लास्टिक की बोतलें बीनेंगे और प्रदर्शन खत्म होने के बाद लेबर चौक लौट जाएंगे। विनोद ने बताया, 'इन प्लास्टिक की बोतलों को बेचकर 500 से 600 रुपये तक मिल जाते हैं। कभी-कभी इससे ज्यादा भी पैसे बन जाते हैं। कनॉट प्लेस में जाकर इन बोतलों को 30 रुपये किलो के भाव से बेचता हूं। इस बोरी में 5-6 किलो बोतलें भरी हैं। अभी तक तीन चक्कर लगा चुका हूं। शाम तक दो-तीन चक्कर और लगाऊंगा।'

हमसे इतनी बातें बताते हुए जल्दबाजी में विनोद आगे बढ़ जाते हैं और बोतलें बीनने का काम फिर से शूरू कर देते हैं। यह कहानी सिर्फ विनोद की नहीं है बल्कि उनके जैसे प्रदर्शनस्थल पर कई लोग हैं जो, जबतक प्रदर्शन चलेगा वह इसी से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करेंगे।