दोस्ती तगड़ी लेकिन तकनीक नहीं सौंपता फ्रांस, रूस ही भारत के लिए भरोसेमंद क्यों?
रूस के बाद फ्रांस भारत के सबसे बड़े रणनीतिक साझेदारों में से एक है। अच्छी दोस्ती है लेकिन दोनों के बीच तकनीक ट्रांसफर को लेकर बात उलझती है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। Photo Credit: PTI
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस दौरे पर हैं। फ्रांस में G-7 की बैठक हो रही है, जिसमें भारत को पर्यवेक्षक के तौर पर बुलाया गया है। 14 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात करेंगे। दोनों राष्ट्रों के प्रतिनिधि सामरिक साझेदारी पर वार्ता करेंगे। भारत के लिए यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि'भारत इनोवेट्स 2026' कार्यक्रम की शुरुआथ भी यहां हो रही है। दोनों देशों के निवेश और स्टार्टअप इसमें शामिल होंगे।
भारत और फ्रांस की दोस्ती नई नहीं है। साल 2018 से अब तक इमैनुएल मैक्रों 4 बार भारत दौरे पर आ चुके हैं। फरवरी 2026 में वह 4 दिन तक भारत में रहे, अलग-अलग लोगों से मुलाकात की लेकिन जिस की उम्मीद थी, उस पर उन्होंने मुहर ही नहीं लगाई। उम्मीद थी कि वह राफेल की तकनीक भी भारत को सौंपेंगे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
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तकनीक ट्रांसफर पर बात क्यों अटकती है?
भारत और फ्रांस के बीच 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों का बड़ा सौदा लगभग तय होने जा रहा है। भारत ने दसॉल्ट एविएशन से राफेल की तकनीक मांगी थी लेकिन फ्रांस ने देने से इनकार कर दिया था। फ्रांस, राफेल की तकनीक पर अपना एकाधिकार चाहता है, जबकि भारत की सामरिक जरूरतें, फ्रांस से कहीं ज्यादा अलग हैं।
भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल विमानों की खरीद में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बड़ा मुद्दा रहा है। भारत चाहता है कि मेक इन इंडिया ब्रोजेक्ट के तहत फ्रांस एयरफ्रेम, इंजन, एवियोनिक्स से जुड़ी तकनीकों को भारत को सौंपे। फ्रांस ने इन्हें लेकर आंशिक सहमति तो जताई है लेकिन बार-बार विमान का सोर्स कोड देने से इनकार करता रहा है।
भारत के लिए सोर्स कोड जरूरी क्यों है?
भारत की मांग है कि राफेल के कंप्युटर का सोर्स कोड और इलेक्ट्रॉनिक का सोर्स कोड भारत को मिल जाए। फ्रांस इसे लेकर बार-बार एतराज जताता रहा। सोर्स कोड से ही राफेल के डिजिटल आर्किटेक्चर तक भारत पहुंच सकता है। रडार, हथियार प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट को कंट्रोल करने वाला यह सिस्टम, भारत के लिए जरूरी है क्योंकि भारत इसे अपने तरीके से एडवांस करना चाहता है।
भारत के लिए सोर्स कोड इसलिए भी जरूरी है कि पड़ोसी देश चीन ने 6 और 7 जनरेशन फाइटर जेट पर काम कर रहा है। राफेल 4.5 जनरेशन का है। न तो चीन के साथ भारत के बेहतर संबंध हैं, न पाकिस्तान के साथ। पाकिस्तान के पास भी अब J-10C और अमेरिकी F-16 विमान हैं। अगर इनसे मुकाबला करना है तो भारत को एडवांस राफेल की जरूरत पड़ेगी। अगर सोर्स कोड नहीं मिलेगा तो इसे एडवांस नहीं किया जा सकता है।
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फ्रांस सोर्स कोड क्यों नहीं देता है?
डसॉल्ट एविएशन और थेल्स जैसी फ्रांसीसी कंपनियां इसे कूटनीतिक संपत्ति मानती हैं और तकनीक ट्रांसफर नहीं करती हैं। उनका कहना है कि अगर इन्हें ट्रांसफर कर दिया गया तो फिर दूसरे देश भी इसकी नकल से ऐसे ही एडवांस विमान विकसित कर सकते है। विमानन क्षेत्र में ये कंपनियां अपना एकाधिकार चाहती हैं।
फ्रांस के इनकार से भारत पर असर क्या?
भारत इन विमानों में स्वदेशी हथियारों को अपग्रेड नहीं कर पाता है। फ्रांसीसी इंजीनियरों पर छोटे बदलावों के लिए भी निर्भर होना पड़ता है। सॉफ्टरवेयर में थोड़े से बदलाव के लिए महीनों इंतजार कराती है। भारत को बार-बार फ्रांस की तकनीकी मंजूरी और मदद हासिल करनी पड़ती है। आपातकालीन स्थितियों में विमान के रडार या इलेक्रट्रॉनिक वायरफेयर को अपग्रेड करना मुश्किल हो जाएगा। भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से बदलाव नहीं कर सकता है, भारत के पास रणनीतिक आजादी ही नहीं होती है।
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अब फ्रांस ने क्या रास्ता निकाला है?
फ्रांस, बीच की राह निकाल रहा है। एप्लीकेशन प्रोग्राम इंटरफेस (API) और प्लग एंड प्ले समाधान तक तैयार हो रहा है। ऐसा हो सकता है कि कंपनी इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स देने पर तैया हो जाए। एक रास्ता यह भी है कि डिजिटल प्लग के जरिए भारत अपने हथियार, रडार, डेटा लिंक को राफेल के साथ इंटीग्रेट कर सकता है लेकिन तकनीक पूरी तरह से ट्रांसफर सौंपने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है।
अब क्या कवायद चल रही है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा से पहले फ्रांस ने कहा है कि वह टेक्नोलॉजी शेयर करने को तैयार है और भारतीय हथियारों को इन जेट्स में लगाना भी डील का हिस्सा होगा। फ्रांस इसे सामान्य ग्राहक-विक्रेता वाला रिश्ता नहीं मानता, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरे साझेदारी वाला संबंध देख रहा है। यह सौदा मेक इन इंडिया के तहत होगा। फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट किसी भारतीय कंपनी के साथ पार्टनरशिप करेगी।
क्या सौंपने के लिए तैयार हुआ है फ्रांस?
फ्रांस ने इस पर सहमति दी है कि भारत में जेट्स का निर्माण होगा, जिसमें इंजन, एयरफ्रेम और एवियोनिक्स की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जाएगी। भारतीय मिसाइलें, हथियार और गोला-बारूद भी इन विमानों में लगाए जाएंगे। फ्रांस सुरक्षित डेटा लिंक भी देगा, जिससे राफेल भारतीय रडार और सेंसर के साथ पूरी तरह जुड़ सकें। भारत ने फ्रांस को औपचारिक अनुरोध भेज दिया है। अब कुल 114 जेट्स में से कुछ तैयार विमान फ्रांस से आएंगे, कुछ भारत में बनेंगे।
फ्रांस से ज्यादा भरोसेमंद रूस क्यों है?
भारत के साथ रूस ने हर बुरे वक्त में दोस्ती निभाई है। अमेरिका ने बार-बार भारत को आंख दिखाई है लेकिन रूस ने हमेशा साथ दिया है। भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का श्रेय रूस को भी है। भारत ने और रूस के बीच रक्षा संबंध खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि तकनीक हस्तांतरण से आगे तक पहुंचे हैं। दोनों देश संयुक्त उत्पादन में भरोसा रखते हैं।
रूस ने भारत को रक्षा तकनीक सौंपने में कभी अनाकानी नहीं की है। भारत रूस के साथ Su-30MKI लड़ाकू विमान, T-90 टैंक, BrahMos सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, S-400 एयर डिफेंस सिस्टम, Ak-203 राइफल्स का उत्पादन, तलवार क्लास फ्रिगेट्स और Ka-226T हेलीकॉप्टरों का उत्पादन कर रहा है। भारत में इनका संयुक्त उत्पादन हो रहा है, इन्हें असेंबल किया जा रहा है।
रूस ने लाइसेंस्ड प्रोडक्शन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और को-डेवलपमेंट के जरिए भारत की हमेशा मदद की है। भारत ने सुखोई से लेकर MI सिरीज के विमानों को अपग्रेड किया है, आधुनिक हथियार प्रणाली से लैस किया है। सुखोई-57 की बात हो या S-400/S-500 सिस्टम्स की रूस ने हमेशा भारत के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया है।
साल 1960 के दशक से रूस और भारत सहयोगी रहे हैं। MiG-21 से लेकर आधुनिक रेंज के लड़ाकू विमानों तक, रूस ने भारतीय इंटिग्रेशन का कभी विरोध नहीं किया है। दूसरे देशों की तुलना में रूस भारत के लिए हमेशा भरोसेमंद रहा है।
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रूस के साथ रिश्ता खास क्यों है?
रूस, भारत पर न तो कोई राजनीतिक शर्त थोपता है, न ही प्रतिबंध। रूस के मित्र देशों में पाकिस्तान और चीन दोनों शुमार हैं लेकिन फिर भी इस देश ने तकनीक ट्रांसफर और सह उत्पादन पर कभी हिचक नहीं दिखाई। पश्चिमी देशों की एक कूटनीति रही है कि वे अक्सर निर्यात नियंत्रण, काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट (CAATSA) जैसे प्रतिबंध लगाते हैं लेकिन रूस ऐसा कभी नहीं करता है। रूस ने भारत के पक्ष में कई बार वीटो किया है। बांग्लादेश विभाजन के दौरान रूस भारत के लिए अमेरिका से लड़ने को तैयार हो गया था।
रूस ने भारत को क्या-क्या सौंपा है?
ब्रह्मोस मिसाइल के लिए रूस ने अपनी नुजोल मिसाइल तकनीक साझा की थी। भारत आज दुनिया का सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाता है। सुखोई 30 MKI की तकनीक रूस ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को ट्रांसफर की है। भारत इन विमानों का निर्माण और असेंबलिंग खुद करता है। रूस 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर Su-57 की तकनीक देने के लिए तैयार है। रूस परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रमों में भी भारत का साथ दिया है।
INS अरिहंत को विकसित करने में रूस ने भारत की मदद की है। रूस ने भारत को 'चक्र' श्रेणी की परमाणु संचालित पनडुब्बियां लीज पर भी दीं, जिनसे भारत ने सीखा। T-90 भीष्म और T-72 जैसे टैंकों को भारत में बनाने के लिए रूस ने हमेशा साथ दिया है। राइफल से लेकर नौसेना के युद्धपोत और मिसाइल सेक्टर में रूस ने भारत का हमेशा साथ दिया है। रूस ने इन संबंधों के बदले अमेरिका की तरह कभी भारत पर प्रतिबंधों का दबाव भी नहीं बनाया।
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