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एक क्लिक के पीछे कितना बड़ा है डेटा सेंटर का नेटवर्क? समझिए भारत की तैयारी

भारत की डेटा सेंटर क्षमता पिछले छह वर्षों में 375 मेगावाट से 4 गुना उछलकर 1.57 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। इसका असर कहां दिख रहा है, पढ़ें रिपोर्ट।

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प्रतीकात्मक तस्वीर। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT

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इंटरनेट की दुनिया में जो चीजें हमें मौजूद दिखती हैं, वे किसी न किसी सर्वर पर अपलोड होती हैं। सर्वर आप तक 24 घंटे बिना बंद हुए इंटरनेट के जरिए आपकी पसंदीदा वेबसाइट्स, ऐप्स और वीडियो की जानकारी आप तक पहुंचाता है। इन सर्वरों को संभालने का काम डेटा सेंटर करते हैं। आपके हर एक 'क्लिक' को संभालने के पीछे इतनी मजबूत नींव होती है, जिस पर हजारों करोड़ बहाए जा रहे होते हैं। 

UPI पेमेंट से लेकर नेटफ्लिक्स पर 4K वीडियो स्ट्रीमिंग तक, हमारे हर 'क्लिक' को 1-2 सेकंड में प्रोसेस करने के लिए डेटा सेंटर 24 घंटे रीढ़ की हड्डी की तरह काम करते हैं। भारत भी बढ़ती डिजिटल मांग को संभालने के लिए डेटा सेंटर से जुड़ी अपनी क्षमताएं बढ़ा रहा है। 

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डेटा सेंटर के क्षेत्र में कितना मजबूत है भारत?

भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2020 में सिर्फ 375 मेगावाट थी। अगस्त 2026 तक यह क्षमता बढ़कर 1.57 गीगावाट हो चुकी है। करीब चार गुना उछाल देखने को मिला है। 2030 तक यह क्षमता करीब 8 गीगावाट तक पहुंच सकती है।

डेटा सेंटर जरूरी क्यों है?

जब भी आप UPI से पेमेंट करते हैं, नेटफ्लिक्स पर कोई शो चलाते हैं या बैंक बैलेंस चेक करते हैं तो इस एक क्लिक के पीछे डेटा सेंटर काम कर रहा होता है। एक गायब सा लगने वाला अनजान इंजन, जो बिना रुके अपना काम करता है। ये डेटा सेंटर वे सुरक्षित इमारतें हैं, जहां कंप्यूटिंग, स्टोरेज और नेटवर्किंग के उपकरण लगे होते हैं। ये डिजिटल जानकारी को स्टोर करने, प्रोसेस करने और भेजने का काम करते हैं। यही इंफ्रास्ट्रक्चर ऑनलाइन बैंकिंग, ई-गवर्नेंस, डिजिटल पेमेंट और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी सेवाओं की नींव है।

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भारत कैसे बढ़ रहा है आगे?

भारत का डिजिटल इकोसिस्टम जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा स्टोरेज और हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। इस मांग को पूरा करने के लिए ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए जो लगातार, सुरक्षित और बड़े पैमाने पर काम कर सके। डेटा सेंटर यही जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

एक 'क्लिक' से कैसे बन जाता है आपका काम?

जब कोई यूजर कोई ऐप खोलता है या कोई डिजिटल रिक्वेस्ट भेजता है तो सबसे पहले सिक्योरिटी लेयर उस रिक्वेस्ट की जांच करके साइबर खतरों से सिस्टम की रक्षा करती है। इसके बाद लोड बैलेंसर रिक्वेस्ट को किसी उपलब्ध सर्वर तक पहुंचाता है। एप्लिकेशन सर्वर फिर यह तय करता है कि किस जानकारी या सर्विस की जरूरत है। 

जरूरत पड़ने पर यह API के जरिए दूसरी एप्लिकेशन से जुड़ता है। इसके बाद डेटाबेस सर्वर जरूरी जानकारी निकालकर वापस भेजता है। यह पूरी जानकारी नेटवर्क के जरिए यूजर की डिवाइस तक पहुंच जाती है। खास बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया महज 1 से 2 सेकंड में पूरी हो जाती है। डेटा सेंटर पूरी प्रक्रिया का सोर्स है।

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भारत डेटा सेंटर के लिए कैसे हो रहा है तैयार?

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2020 में सिर्फ 375 मेगावाट थी। अगस्त 2026 तक यह बढ़कर 1.57 गीगावाट हो चुकी है। अनुमान है कि 2030 तक यह क्षमता करीब 8 गीगावाट तक पहुंच जाएगी। इस सेक्टर में करीब 70 अरब डॉलर का निवेश पहले से जारी है। सरकार का दावा है कि 90 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट भविष्य में आएंगे। 

कहां-कहां हैं नेशनल डेटा सेंटर?

नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) ने दिल्ली, पुणे, हैदराबाद और भुवनेश्वर में अत्याधुनिक नेशनल डेटा सेंटर स्थापित किए हैं। देश के अलग-अलग राज्यो में 37 छोटे डेटा सेंटर भी बनाए गए हैं। ये सरकारी संस्थानों को चौबीसों घंटे डिजिटल सेवाएं देते हैं।

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सरकार डेटा सेंटर के लिए क्या कर रही है?

सरकार ने डेटा सेंटर इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय बजट 2022-23 में डेटा सेंटरों को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया गया। अब उन्हें डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आसानी से कर्ज मिलने लगा। बजट 2026-27 में विदेशी क्लाउड सेवा कंपनियों को 2047 तक टैक्स छूट देने का ऐलान किया गया है। यह टैक्स ईयर 2026-27 से 2046-47 तक नोटिफाइड विदेशी कंपनियों पर लागू होगी।

डेटा सेंटर की चुनौतियां क्या हैं?

MeitY ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि जैसे-जैसे डेटा सेंटर की क्षमता बढ़ रही है, ऊर्जा और संसाधनों की जरूरत भी उतनी ही अहम होती जा रही है। बिजली मंत्रालय की सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के मुताबिक 2031-32 तक डेटा सेंटरों की बिजली मांग 17 गीगावाट तक पहुंच सकती है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस रूल्स, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर स्कीम और नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसी योजनाओं के जरिए स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है। सरकार SHANTI एक्ट के जरिए AI और डेटा सेंटर जैसे उभरते सेक्टरों के लिए भरोसेमंद न्यूक्लियर पावर की व्यवस्था करने जा रही है, जिसके तहत भविष्य में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और माइक्रो न्यूक्लियर रिएक्टर भी लगाए जा सकते हैं।

पानी को लेकर सरकार का प्लान क्या है?

पानी के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार सतर्क है। डेटा सेंटरों में इस्तेमाल होने वाला भूजल जल शक्ति मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के दायरे में आता है। AI इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, एडियाबेटिक कूलिंग और इमर्शन कूलिंग जैसी एडवांस कूलिंग तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है।

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किसकी निगरानी में हो रहा है काम?

ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने डेटा सेंटर की दक्षता के लिए कई मानक तैयार किए हैं। यह पावर यूसेज इफेक्टिवनेस, कार्बन यूसेज इफेक्टिवनेस, कूलिंग इफिशिएंसी रेशियो और वॉटर यूसेज इफेक्टिवनेस जैसे पहलुओं को कवर करते हैं। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) ने भी एनर्जी कंजर्वेशन बिल्डिंग कोड 2017 और एनर्जी कंजर्वेशन एंड सस्टेनेबल बिल्डिंग कोड 2024 को नोटिफाई किया है। डेटा सेंटर से जुड़े ऊर्जा और जल संरक्षण के प्रावधान को भी शामिल किया गया है। 

भारत कामयाबी से कितनी दूर है?

MeitY का कहना है कि भारत का डेटा सेंटर सेक्टर एक मजबूत और आत्मनिर्भर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दे रहा है। यह भारत की डेटा संप्रभुता के लिए जरूरी है। अभी भारत की निर्भरता विदेशी सर्वर और डेटा सेंटर पर ज्यादा है। भारत डेटा सेंटर के जरिए डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ाने पर जोर दे रहा है। 


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